
Education Loan for Youth in India: भारत में माता-पिता अक्सर बच्चों से कहते हैं, 'पढ़ाई पूरी कर लो, फिर नौकरी लग जाएगी।' लेकिन बदलती शिक्षा व्यवस्था में इस वाक्य के साथ एक नया सवाल जुड़ गया है, 'अगर पढ़ाई के लिए कर्ज लिया है तो, नौकरी लगने तक उस कर्ज का क्या होगा?' यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि, उच्च शिक्षा अब सिर्फ पढ़ाई का विषय नहीं रही। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, चिकित्सा, कानून और दूसरे पेशेवर पाठ्यक्रमों की फीस, हॉस्टल, किताबें और रहने का खर्च कई परिवारों के लिए बड़ा आर्थिक निर्णय बन चुके हैं। ऐसे में शिक्षा ऋण युवाओं के लिए अवसर का रास्ता भी है और भविष्य की वित्तीय जिम्मेदारी भी। लेकिन हाल के सरकारी आंकड़े इस तस्वीर का एक ऐसा पहलू दिखाते हैं जिस पर युवाओं की शिक्षा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम बात होती है।
शिक्षा ऋण को लेकर दिसंबर 2025 में संसद की शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल मामलों की स्थायी समिति ने विस्तृत समीक्षा की। समिति के अनुसार 2014 में देश में सक्रिय शिक्षा ऋण खातों की संख्या करीब 23 लाख थी। 2025 में यह संख्या घटकर करीब 21 लाख रह गई। पहली नजर में यह गिरावट बहुत बड़ी नहीं लगती। लेकिन इसी अवधि में इन शिक्षा ऋणों की कुल रकम 52,327 करोड़ रुपए से बढ़कर 1.37 लाख करोड़ रुपए हो गई। यानी सक्रिय ऋण खातों की संख्या कम हुई, लेकिन कुल उधारी बहुत बढ़ गई। समिति ने इसे शिक्षा की बढ़ती लागत और प्रति विद्यार्थी अधिक ऋण की ओर संकेत माना।
यह वह स्थिति है जब युवा भारत के सामने एक नयी चुनौती सामने आ खड़ी हुई है। क्या आज का विद्यार्थी डिग्री खरीदने के लिए पहले कर्ज ले रहा है और नौकरी मिलने के बाद उस डिग्री की कीमत चुका रहा है?
एजुकेशन लोन को केवल समस्या की तरह देखना सही नहीं होगा। किसी ऐसे विद्यार्थी के लिए जिसके परिवार के पास महंगी उच्च शिक्षा का खर्च उठाने की क्षमता नहीं है, एजुकेशन लोन पढ़ाई का रास्ता खोल सकता है। अगर वह विद्यार्थी अच्छी शिक्षा हासिल करके रोजगार पा लेता है तो, ऋण उसके लिए निवेश साबित हो सकता है। समस्या तब शुरू होती है जब, पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी मिलने में समय लगे, अपेक्षित वेतन न मिले या विद्यार्थी अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार हासिल न कर पाए।
युवा के लिए उस समय कर्ज सिर्फ बैंक की फाइल में दर्ज रकम नहीं रहता। वह नौकरी चुनने, शहर बदलने, आगे की पढ़ाई करने और यहां तक कि अपना कारोबार शुरू करने के फैसले को भी प्रभावित कर सकता है। यानी करियर शुरू होने से पहले ही आर्थिक जिम्मेदारी शुरू हो जाती है।
इसी चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार ने पीएम-विद्यालक्ष्मी योजना शुरू की है। इसका उद्देश्य पात्र स्टूडेंट्स को उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश मिलने पर शिक्षा ऋण तक आसान पहुंच देना है। योजना के तहत पात्र विद्यार्थियों को बिना संपार्श्विक यानी गिरवी और बिना गारंटर शिक्षा ऋण की सुविधा देने का प्रावधान है। सरकार सात लाख रुपए तक के ऋण पर 75 प्रतिशत क्रेडिट गारंटी भी देती है।
इसके अलावा आठ लाख रुपए तक वार्षिक पारिवारिक आय वाले पात्र विद्यार्थियों के लिए 10 लाख रुपए तक के ऋण पर तीन प्रतिशत ब्याज सहायता का प्रावधान है। लेकिन यहां भी एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है। संसद की स्थायी समिति ने पाया कि योजना के लाभार्थियों की संख्या अभी कम है। फरवरी से अगस्त 2025 के बीच योजना के तहत 55,887 आवेदन आए। इनमें 30,442 आवेदन स्वीकृत हुए और 21,967 मामलों में लोन वितरित किया गया। समिति ने योजना का दायरा बढ़ाने और अधिक विद्यार्थियों तक पहुंचाने की जरूरत बताई। यानी सरकार ने रास्ता बनाया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या जरूरतमंद विद्यार्थी उस रास्ते तक पहुंच पा रहा है?
शिक्षा ऋण की चर्चा में अक्सर यह मान लिया जाता है कि समस्या केवल बैंक से पैसा मिलने की है। लेकिन संसद की समिति ने कई दूसरी दिक्कतों की ओर भी ध्यान दिलाया। रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ विद्यार्थियों को क्रेडिट हिस्ट्री नहीं होने के कारण ऋण हासिल करने में समस्या आती है। ग्रामीण क्षेत्रों में योजना की जानकारी का अभाव भी एक चुनौती है। समिति ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों, खासकर ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए ऋण व्यवस्था को ज्यादा सुलभ बनाने की सिफारिश की। यह समस्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि, पहली बार कॉलेज जाने वाला युवा आम तौर पर स्वयं बैंकिंग और ऋण प्रक्रिया का विशेषज्ञ नहीं होता।
उसके लिए सवाल सिर्फ इतना नहीं होता कि 'मुझे कितना ऋण मिलेगा?' सवाल यह भी होता है कहां आवेदन करना है? कौन-से दस्तावेज चाहिएं? गारंटी लगेगी या नहीं? ब्याज कितना होगा? पढ़ाई खत्म होने के कितने समय बाद किस्त शुरू होगी? अगर नौकरी देर से मिली तो क्या होगा? इन सवालों के जवाब जितने कठिन होंगे, योजना का लाभ उतना ही सीमित रह सकता है।
शिक्षा ऋण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ऋण लेना नहीं बल्कि, उसकी वापसी है। अगर विद्यार्थी को पढ़ाई पूरी होते ही अच्छी नौकरी मिल जाती है तो, कर्ज चुकाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन रोजगार बाजार में प्रवेश करने में देरी हुई तो तस्वीर बदल जाती है।
संसदीय समिति ने इसी समस्या को देखते हुए शिक्षा ऋण की अदायगी के लिए मौजूदा स्थगन अवधि बढ़ाने की सिफारिश की। समिति ने कुछ योजनाओं में इसे एक साल से बढ़ाकर दो साल करने का सुझाव दिया, ताकि नौकरी पाने में कठिनाई झेल रहे विद्यार्थियों को राहत मिल सके। समिति ने आय के आधार पर किस्त तय करने जैसे विकल्पों पर विचार करने की भी सिफारिश की। यानी सरकार के सामने भी यह सवाल मौजूद है कि नौकरी मिलने से पहले शुरू हो जाने वाला ऋण भुगतान युवा पर अनावश्यक दबाव न बना दे।
यहां कहानी सिर्फ उन युवाओं की नहीं है जो, आईआईटी या महंगे निजी कॉलेज में पढ़ते हैं। देश में उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ है और करोड़ों विद्यार्थी कॉलेज तथा विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं। लेकिन शिक्षा संस्थानों की फीस, शहर में रहने का खर्च और पेशेवर पाठ्यक्रमों की लागत परिवारों के लिए अलग-अलग स्तर की आर्थिक चुनौती पैदा करती है। ऐसे में एक युवा के सामने तीन रास्ते हो सकते हैं-
एक तो ये कि परिवार खर्च उठाए, दूसरा उसे छात्रवृत्ति मिले या फिर तीसरा और अंतिम रास्ता है एजुकेशन लोन लिया जाए। पहले दो रास्ते हर परिवार के लिए उपलब्ध नहीं होते। इसलिए तीसरा रास्ता तेजी से महत्वपूर्ण हो जाता है। लेकिन शिक्षा ऋण को सिर्फ 'सस्ता पैसा' समझना भी खतरनाक हो सकता है। यह भविष्य की आय के भरोसे लिया गया कर्ज है। युवा आज पढ़ाई करता है और उम्मीद करता है कि कल उसकी नौकरी उस कर्ज को चुका देगी। यानी उसकी वर्तमान शिक्षा और भविष्य की कमाई के बीच एक आर्थिक रिश्ता बन जाता है।
यह इस स्टोरी का सबसे दिलचस्प और आगे जांचे जाने योग्य पहलू है। मान लीजिए किसी विद्यार्थी ने पढ़ाई के लिए बड़ा शिक्षा ऋण लिया। पढ़ाई पूरी होने के बाद उसे दो नौकरी के विकल्प मिलते हैं, एक कम वेतन लेकिन अपने पसंद के क्षेत्र में, दूसरा ज्यादा वेतन लेकिन बिल्कुल अलग क्षेत्र में।
संभव है कि उसकी ईएमआई उसके फैसले को प्रभावित करे। यही सवाल उद्यमिता पर भी लागू होता है। जिस युवा पर शिक्षा ऋण की जिम्मेदारी है, क्या वह नौकरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू करने का जोखिम आसानी से उठा पाएगा? इस सवाल पर देश में अलग से व्यापक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इसे तथ्य के रूप में नहीं बल्कि आगे की जांच के सवाल के रूप में देख जाना चाहिए।
भारत के सामने शिक्षा की चुनौती, अब सिर्फ कॉलेजों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। एक तरफ सरकार उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के लिए छात्रवृत्ति, फीस सहायता और शिक्षा ऋण जैसी व्यवस्थाएं बना रही है। दूसरी तरफ बढ़ती लागत के बीच विद्यार्थियों की उधारी का आकार भी बढ़ रहा है। इसलिए अगली बहस शायद यह नहीं होनी चाहिए कि 'युवा शिक्षा के लिए कर्ज लें या नहीं?' बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि, 'ऐसी शिक्षा व्यवस्था कैसे बने जिसमें, किसी प्रतिभाशाली युवा को पढ़ाई के लिए कर्ज लेना पड़े तो, उसकी पहली नौकरी उसकी पहली EMI से पहले आ जाए?' क्योंकि उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं है।
और शिक्षा ऋण का उद्देश्य केवल फीस भरना नहीं। असली सफलता तब होगी जब, एक युवा डिग्री लेकर निकले, उसके हाथ में कौशल हो, सामने रोजगार का अवसर हो और उसके भविष्य पर कर्ज का बोझ उसकी संभावनाओं से बड़ा न हो। भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। ऐसे में युवाओं की शिक्षा पर लिया गया हर आर्थिक फैसला केवल एक परिवार का फैसला नहीं है, यह आने वाले वर्षों के भारत की आर्थिक दिशा से जुड़ा सवाल भी है।