
मुंबई के इतिहास में 19 मार्च 1987 का दिन एक ऐसे केस के लिए दर्ज है, जिसे आज भी पुलिस अपने सबसे शातिर और अनसुलझे मामलों में गिनती है। इसी दिन ऑपेरा हाउस स्थित त्रिभुवनदास भीमजी जवेरी एंड संस (TBZ) ज्वैलर्स की दुकान में बड़ी लूट हुई। TBZ ज्वैलर्स पर नकली CBI अधिकारियों की एक पूरी टीम ने छापा मारकर करीब 30 लाख रुपए के गहने और नकदी लूट ली। लूट के बाद इस घटना का मास्टरमाइंड गायब हो गया।
17 मार्च 1987 को टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में एक वर्गीकृत विज्ञापन छपा, जिसमें इंटेलिजेंस ऑफिसर और सिक्योरिटी ऑफिसर के पदों के लिए डायनामिक ग्रेजुएट्स मांगे गए थे। उम्मीदवारों को अगले दिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे के बीच ताज इंटरकॉन्टिनेंटल होटल पहुंचने को कहा गया।
खुद को मोहन सिंह उर्फ मान सिंह बताने वाले शख्स ने नरीमन पॉइंट के मित्तल टावर्स में एक ऑफिस किराए पर लेकर इंटरव्यू लिए और कम से कम 26 उम्मीदवारों को चुन लिया। इसके बाद चयनित किए गए उम्मीदवारों को अगले दिन फिर ताज होटल बुलाया गया, जहां उन्हें एक मॉक रेड (नकली छापे) की ट्रेनिंग और ब्रीफिंग दी गई। इस दौरान उम्मीदवारों को यह नहीं बताया गया कि वे डकैती डालने जा रहे हैं।
19 मार्च को करीब 26 से 28 प्रशिक्षु एक किराए की बस में सवार होकर ऑपेरा हाउस की TBZ शाखा पहुंचे। दोपहर करीब 2:15 बजे मोहन सिंह ने दुकान के मालिक प्रताप जवेरी से मुलाकात की और खुद को CBI अधिकारी बताते हुए एक फर्जी सर्च वारंट दिखाया। उसने CCTV कैमरे बंद कराए, दुकान में मौजूद लाइसेंसी रिवॉल्वर जब्त की और स्टाफ को किसी को फोन करने से मना कर दिया। नकली CBI अफसरों ने सोने की गुणवत्ता जांचने के बहाने गहनों के सैंपल उठाए और उन्हें सरकारी मुहर लगे पॉलीबैग में सील किया। इस दौरान फर्जी अफसरों ने दुकान में रखी नकदी भी इकट्ठा कर ली। करीब 45 मिनट बाद मोहन सिंह ने दो लोगों को ब्रीफकेस, बस में रखने को कहा। मोहन सिंह ने बाकी फर्जी अफसरों को दुकान पर पहरा देने का आदेश दिया और दूसरे छापे की निगरानी करने का बहाना बनाकर वहां से निकल गया। मोहन सिंह दुकान से जाने के बाद फिर कभी नहीं लौटा। करीब 1 घंटे बाद, जब फर्जी अफसरों पर शक हुआ तो दुकान मालिक ने डी.बी. मार्ग पुलिस को फोन किया।
पुलिस मौके पर पहुंची तो लूट का खुलासा हुआ। मामले की जांच में सामने आया कि मोहन सिंह ने 17 मार्च को ताज होटल में कमरा नंबर 415 बुक कराया था। दुकान से निकलकर वह पहले बस से वापस ताज होटल गया। वहां से टैक्सी ली और वह टैक्सी उसे विले पार्ले ले गई। वहां से मोहन सिंह ने एक ऑटो-रिक्शा लिया और उसके बाद उसका कोई सुराग नहीं मिला।
लूट के बाद पूरे देश में खोजबीन हुई, लेकिन शातिर का कोई सुराग नहीं मिला। होटल के रिकॉर्ड में मोहन सिंह ने खुद को तिरुवनंतपुरम (त्रिवेंद्रम) का निवासी बताया था और उसका उच्चारण भी दक्षिण भारतीय था। इसलिए एक जांट टीम केरल भेजी गई। वहां जॉर्ज ऑगस्टीन फर्नांडीस नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया, लेकिन जांच में वह एक असंबंधित छोटा-मोटा चोर निकला और उसे बरी कर दिया गया।
मुंबई में लूट की जांच करने के लिए पुलिस ने एक टीम दुबई भी भेजी, लूट का सामान और शातिर का कोई सुराग नहीं मिला। तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस एस.एम. मुशरिफ ने इस डकैती को एक बेहद सुनियोजित ऑपरेशन बताया था। पुलिस ने यह भी जांचा कि कहीं कोई असली CBI अधिकारी तो इसमें शामिल नहीं था, लेकिन रिकॉर्ड्स की गहन जांच में यह आशंका खारिज हो गई।
मोहन सिंह की असली पहचान, उसका ठिकाना और लूटे गए गहनों का क्या हुआ? इन सभी सवालों का जवाब आज तक नहीं मिला है। यह मामला मुंबई पुलिस के इतिहास में सबसे चर्चित अनसुलझे केस में गिना जाता है।
मुंबई की इस डकैती की योजना इतनी दिलचस्प थी कि इस पर 2013 में निर्देशक नीरज पांडे ने बॉलीवुड फिल्म 'स्पेशल 26' बनाई, जिसमें अक्षय कुमार, अनुपम खेर और मनोज बाजपेयी जैसे कलाकारों ने काम किया। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की और असली घटना के कई अहम पहलू उजागर किए।