
आज के दौर में जब स्टाइल और ट्रेंड पलक झपकते ही बदल जाते हैं, तब फैशन इंडस्ट्री हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। इस चमक-धमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। कम कीमत में ट्रेंडी कपड़े उपलब्ध कराने वाला 'फास्ट फैशन' (Fast Fashion) आज दुनिया भर में पर्यावरण के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक बनता जा रहा है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अब भारत समेत दुनियाभर में 'सस्टेनेबल फैशन' (Sustainable Fashion) और 'सर्कुलर इकोनॉमी' (Circular Economy) का कॉन्सेप्ट तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
फास्ट फैशन का मतलब है कि सस्ते दामों में ट्रेंडी कपड़े खरीदना, उन्हें कुछ ही बार पहनकर फेंक देना और नया ट्रेंड आने पर दोबारा खरीद लेना। विभिन्न वैश्विक पर्यावरण रिपोर्ट्स के अनुसार, फैशन इंडस्ट्री दुनिया भर में होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 8 से 10 प्रतिशत हिस्सा पैदा करती है, जो कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और समुद्री जहाजों के कुल उत्सर्जन से भी ज्यादा है। इसके अलावा, कपड़ा उद्योग जल प्रदूषण का भी एक बहुत बड़ा जरिया है।
एक साधारण सूती टी-शर्ट को बनाने में करीब 2,700 लीटर पानी खर्च हो जाता है, जो एक इंसान के कई हफ्तों के पीने के पानी के बराबर है। इसके साथ ही सिंथेटिक कपड़ों (जैसे पॉलिएस्टर और नायलॉन) से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक महासागरों को जहरीला बना रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां कपड़ा उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है, वहां कचरे के ढेरों में इन कपड़ों का सड़ना नामुमकिन सा होता है, जिससे लैंडफिल की समस्या विकराल रूप ले रही है।
इस पर्यावरण-विरोधी संस्कृति से पार पाने के लिए कपड़ा उद्योग में 'सर्कुलर इकोनॉमी' (वृत्ताकार अर्थव्यवस्था) का मॉडल अपनाया जा रहा है। इसका मूल सिद्धांत है- बनाओ, इस्तेमाल करो, फेंको के पुराने रास्ते को छोड़कर कम करो, पुनर्चक्रण (Recycle) करो और दोबारा उपयोग (Reuse) करो।
आज के दौर में रीसाइक्ल्ड कपड़ों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। फैशन डिजाइनर और बड़े ब्रांड्स अब प्लास्टिक की बोतलों, कृषि कचरे और पुराने कपड़ों को गलाकर नया धागा बना रहे हैं। भारत के कई घरेलू स्टार्टअप्स और बड़े सस्टेनेबल ब्रांड्स ने ऐसे कपड़े तैयार करना शुरू कर दिया है जो पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल या रीसाइक्ल्ड होते हैं। लोग अब पुराने कपड़ों को रीसायकल कर नए फैशन ट्रेंड में ढालने लगे हैं।
शहरी क्षेत्रों में विशेषकर Gen-Z और मिलेनियल्स (युवा पीढ़ी) के बीच इको-फ्रेंडली लाइफस्टाइल को लेकर गजब की जागरूकता आई है। लोग अब सिंथेटिक और पॉलिएस्टर कपड़ों के बजाय ऑर्गेनिक कॉटन, बांस के रेशे (Bamboo Fabric), खादी और भांग (Hemp) से बने कपड़ों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके अलावा, 'थ्रिफ्ट शॉपिंग' (Thrift Shopping) और पुराने कपड़ों के आदान-प्रदान (Clothing Swaps) का कल्चर भी तेजी से पैर पसार रहा है। लोग सेकेंड-हैंड या विंटेज कपड़े खरीदने में गर्व महसूस कर रहे हैं, जिससे नए कपड़ों के उत्पादन का दबाव पर्यावरण पर कम हो रहा है।
भारत के बड़े फैशन डिजाइनर और परिधान ब्रांड्स भी अब 'लैक्मे फैशन वीक' जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर सस्टेनेबल फैशन को बढ़ावा दे रहे हैं। कई कंपनियां अपने ग्राहकों को पुराने कपड़े वापस लाने पर डिस्काउंट कूपन देती हैं, ताकि उन कपड़ों को सही तरीके से रीसायकल किया जा सके। सरकार स्तर पर भी पर्यावरण अनुकूल विनिर्माण (Eco-friendly manufacturing) और कपड़ा कचरा प्रबंधन के लिए कड़े नियम बनाए जा रहे हैं।
भले ही सस्टेनेबल फैशन और सर्कुलर इकोनॉमी को लेकर सकारात्मक बदलाव दिख रहा है, लेकिन इसके सामने अभी कुछ बड़ी बाधाएं हैं। ऑर्गेनिक और रीसाइक्ल्ड कपड़े आम तौर पर फास्ट फैशन के कपड़ों की तुलना में काफी महंगे होते हैं, जिससे मध्यम वर्ग के लिए इन्हें अपनाना हर बार संभव नहीं हो पाता। इसके अलावा, रीसाइक्लिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।
फास्ट फैशन के इस दौर में पर्यावरण को बचाने के लिए अब केवल सरकार या कंपनियों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता, बल्कि ग्राहकों को भी जागरूक होना होगा। 'कम खरीदें, बेहतर खरीदें और लंबे समय तक इस्तेमाल करें' का मंत्र अपनाना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है। सस्टेनेबल फैशन और सर्कुलर इकोनॉमी केवल एक अस्थायी ट्रेंड नहीं, बल्कि आने वाले समय में धरती को बचाने और एक स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित करने का एकमात्र मार्ग है।