
CJP Protest at Jantar Mantar: राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध प्रदर्शन जारी है। छात्रों और युवाओं के इस आंदोलन का मुख्य मुद्दा NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग है। प्रदर्शनकारी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Education Minister Dharmendra Pradhan) के इस्तीफे पर अड़े थे। कॉकरोच जनता पार्टी (Cockroach Janata Party) के प्रदर्शन में शामिल लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) ने 26 दिन बाद अनशन को समाप्त कर दिया है। अनशन के दौरान तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk Hunger Strike) ने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में अपना उपवास तोड़ा। दिल्ली में जारी यह आंदोलन न केवल NEET जैसे मुद्दों को उजागर कर रहा है, बल्कि विदेशी फंडिंग, NGO नियमन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे व्यापक विषयों पर भी बहस छेड़ रहा है।
सोनम वांगचुक 28 जून से जंतर मंतर पर अनशन कर रहे थे। वांगचुक NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने, छात्रों की समस्याओं के समाधान और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। 26 दिनों के उपवास में वांगचुक का 11 किलो वजन कम हुआ और उनका शरीर काफी कमजोर हो गया।
अनशन समाप्त करने के बाद वांगचुक ने कहा कि केंद्र सरकार से कुछ आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने यह फैसला लिया है। इन आश्वासनों में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कोई कानूनी कार्रवाई न करने, पेपर लीक से प्रभावित छात्रों के परिवारों को मुआवजा और शिक्षा सुधार पर संसदीय बहस जैसे मुद्दे शामिल हैं। CJP प्रदर्शनकर्ताओं ने इस कदम का स्वागत किया है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की उनकी मूल मांगें बरकरार हैं।
दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी धरना के दौरान विधेयक नई विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम-2010 (Foreign Contribution Regulation Act) पर नई बहस छिड़ गई है। दावा किया है कि दिल्ली में जारी विरोध के पीछे FCA अधिनियम बड़ी वजह हो सकती है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने वर्तमान सत्र में FCA कानून में संशोधन करने का फैसला किया है। अगर संशोधन पारित हो जाता है, तो बहुत सारे NGO के लिए विदेशी फंडिंग प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।
FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) का हिंदी अर्थ विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम है। यह विधेयक साल 2010 में UPA सरकार के समय बना था और 2011 में लागू हुआ। यह कानून तय करता है कि भारतीय व्यक्ति, संगठन, NGO, ट्रस्ट या कंपनियां विदेश से पैसे, सामग्री या अन्य योगदान कैसे प्राप्त कर सकते हैं और उनका इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। इस कानून का संचालन गृह मंत्रालय करता है। कानून का उद्देश्य विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग को रोकना और राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता तथा सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा करना है।
मोदी सरकार FCRA में कुछ प्रस्तावित संशोधन करना चाहती है। सरकार का कहना है कि 2026 का संशोधन कानूनी खामियों को दूर करने, जवाबदेही बढ़ाने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए है। संशोधन के मुख्य प्रावधानों में FCRA पंजीकरण की शर्तें पूरी न करने वाले संगठनों की संपत्तियों को जब्त करने की स्पष्ट प्रक्रिया। डिजाइंड अथॉरिटी का गठन, जो विदेशी फंड से जुड़ी संपत्तियों का प्रबंधन और निपटान कर सके। इसके अलावा प्रशासनिक खर्च की सीमा पहले ही 20% कर दी गई है। फंडिंग के स्रोत, उपयोग और रिपोर्टिंग में सख्ती, न्यायिक समीक्षा, अपील व्यवस्था और दंड के प्रावधानों को तर्कसंगत बनाना है।
सरकार का पक्ष है कि यह संशोधन किसी विशिष्ट समुदाय या संगठन को लक्षित नहीं करते, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और फंड के दुरुपयोग को रोकने के लिए हैं। कई बार फंडिंग कई लेयर्स से गुजरती है, जिससे असली उपयोग का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। साल 2020 के संशोधन में विदेशी योगदान को भारतीय स्टेट बैंक के FCRA खाते के माध्यम से प्राप्त करना अनिवार्य किया गया था। सरकार ने FATF (Financial Action Task Force) के अंतरराष्ट्रीय मानकों का भी हवाला दिया है। FATF उल्लंघन के आरोप में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, ऑक्सफैम इंडिया और एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया जैसी संस्थाओं पर पहले भी कार्रवाई हो चुकी है।