
Gen Z Protests History : दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले करीब डेढ़ महीने से एक अनोखा प्रदर्शन चल रहा था। "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) नाम के एक युवा संगठन के बैनर तले हजारों छात्र इकट्ठा हुए थे - सबसे बड़ी मांग एक थी: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। वजह थी NEET-UG समेत कई बड़ी परीक्षाओं में पेपर लीक और गड़बड़ियों का सिलसिला, जिसने लाखों छात्रों का भविष्य अधर में लटका दिया था।
आज शनिवार 25 जुलाई को आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान ने अपना इस्तीफा सौंपा, यह कहते हुए कि छात्रों का भविष्य किसी भी विवाद से ऊपर है।
लेकिन असल कहानी यह है कि भारत का यह पहला बड़ा "Gen Z-स्टाइल" आंदोलन था - संगठित, सोशल मीडिया पर तेजी से फैला और बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण रहा जिसने एक केंद्रीय मंत्री को इस्तीफे पर मजबूर कर दिया।
पर जेनजी आंदोलन की आग आखिर किस देश से फैली थी...
अगर पीछे मुड़कर देखें, तो भारत की यह घटना अकेली नहीं है। इस पूरी लहर की शुरुआत मानी जाती है 2022 के श्रीलंका से, जहां आर्थिक तबाही के खिलाफ जनआक्रोश ने राष्ट्रपति को इस्तीफा देने पर मजबूर किया।
इसके बाद 2024 में बांग्लादेश और केन्या में भी युवाओं का गुस्सा सड़कों पर फूटा। 2025 आते-आते यह लहर एक साथ कई महाद्वीपों में फैल गई- नेपाल, मेडागास्कर, मोरक्को, फिलीपींस, पेरू, तंज़ानिया- हर जगह कहानी लगभग एक जैसी रही: भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और शासन-व्यवस्था से मोहभंग झेल रहे युवा, सोशल मीडिया के ज़रिए बिना किसी बड़े नेता के संगठित हुए, और सरकारों को झुकने पर मजबूर किया। और अब 2026 में भारत भी इस सूची में जुड़ गया है।
भारत का आंदोलन इन सबसे अलग भी है और मिलता-जुलता भी। अलग इसलिए कि यहां मांग किसी सरकार गिराने की नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही की थी। मिलता-जुलता इसलिए कि यहां भी वही पैटर्न दिखा - लीडरलेस मूवमेंट, जंतर-मंतर जैसा प्रतीकात्मक स्थान, सोशल मीडिया पर तेज़ मोबिलाइज़ेशन, और आखिरकार सत्ता प्रतिष्ठान का झुकना।
| देश (साल) | नतीजा |
|---|---|
| श्रीलंका (2022) | राष्ट्रपति का इस्तीफा, स्थिरता लौटी |
| बांग्लादेश (2024) | PM शेख हसीना देश छोड़कर निकलीं |
| केन्या (2024) | विवादित टैक्स बिल वापस |
| नेपाल (2025) | PM ओली का इस्तीफा, नई अंतरिम सरकार |
| मेडागास्कर (2025) | राष्ट्रपति निर्वासन में, सेना का कब्ज़ा |
| मोरक्को (2025) | स्वास्थ्य-शिक्षा खर्च बढ़ाने का वादा |
| फिलीपींस (2025) | जांच आयोग, स्पीकर का इस्तीफा |
| पेरू (2025) | राष्ट्रपति बोलुआर्ते हटाईं, नए के खिलाफ भी विरोध जारी |
| तंज़ानिया (2025) | हिंसक दमन, सैकड़ों मौतें |
| भारत (2026) | शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा |
नोट- इस तरह GenZ ने महज चार सालों में कुछ देशों की सरकारों को गिराया। कई देशों में सरकारों को तानाशाही फैसलें बदलने पड़ें।
शोध भी इस ट्रेंड की तस्दीक करते हैं। हार्वर्ड की राजनीतिक वैज्ञानिक एरिका शेनोवेथ के अध्ययन के मुताबिक, 1990 से 2020 के बीच सत्ता परिवर्तन लाने वाले 80% अहिंसक आंदोलनों में युवाओं की बड़ी भागीदारी रही, और जिन आंदोलनों में फ्रंटलाइन पर आधे से अधिक युवा होते हैं, उनके सफल होने की संभावना उन आंदोलनों से दोगुनी होती है जिनमें युवा भागीदारी 10% से कम हो।
भारत में भी यही देखने को मिला। छात्रों ने बिना किसी पारंपरिक राजनीतिक दल के सहारे, सिर्फ सोशल मीडिया और जंतर-मंतर की मौजूदगी के दम पर तीन हफ्तों के भीतर एक केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया - ठीक उसी तरह जैसे नेपाल के युवाओं ने डिस्कॉर्ड पोल से अपनी अंतरिम प्रधानमंत्री चुनी थी।
एक बात साफ है - दुनिया भर के ये आंदोलन बताते हैं कि सत्ता बदलना आसान है, लेकिन बुनियादी समस्याएं (बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, संस्थागत विश्वास की कमी) दूर करना उतना ही मुश्किल। बांग्लादेश और पेरू जैसे देशों में सरकार बदलने के बाद भी असंतोष कम नहीं हुआ। भारत के लिए भी असली सवाल अब यही है - क्या शिक्षा मंत्री का इस्तीफा परीक्षा प्रणाली में भरोसा लौटाने के लिए काफी होगा, या यह सिर्फ एक शुरुआत है?
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