
गांव में पंचायत की दुकान का किराया कौन लेता है? तालाब की मछली पालन पट्टा राशि कहां जमा होती है? चारागाह, हाट-बाजार, पंचायत भवन और ग्राम समाज की जमीन का असली मालिक कौन है? ये सवाल अक्सर ग्रामीण इलाकों में उठते हैं, खासकर तब जब पंचायत की संपत्तियों पर कब्जे, पट्टे या आय-व्यय को लेकर विवाद सामने आते हैं। दिलचस्प बात यह है कि कई गांवों में पंचायत की संपत्तियों की कीमत लाखों-करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों को यह नहीं पता कि इन संपत्तियों का कानूनी मालिक कौन है और इनसे होने वाली आय का इस्तेमाल कहां होता है।
ग्राम पंचायत की संपत्ति सिर्फ पंचायत भवन तक सीमित नहीं होती। गांव के कई सार्वजनिक संसाधन इसके दायरे में आते हैं। ग्राम समाज की भूमि, तालाब-पोखर, चारागाह, सामुदायिक शौचालय, बारातघर, पंचायत की दुकानें, साप्ताहिक हाट-बाजार, खेल मैदान, सार्वजनिक रास्ते-नालियां और खाली पंचायत भूमि। इनमें से कई संपत्तियां दशकों पुरानी हैं और आज इनकी बाजार कीमत काफी बड़ी हो चुकी है, इसलिए इन पर कब्जे और विवाद की घटनाएं भी लगातार सामने आती रहती हैं।
यही सबसे बड़ा भ्रम है। कानूनी रूप से पंचायत की संपत्ति किसी प्रधान, सचिव, पंचायत सदस्य या किसी सरकारी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं होती। इसका स्वामित्व सार्वजनिक प्रकृति का होता है, और ग्राम पंचायत केवल इसके प्रबंधन, संरक्षण और उपयोग की जिम्मेदार संस्था होती है। सीधे शब्दों में कहें तो ग्राम पंचायत मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक (custodian) होती है।
तालाब, चारागाह या पंचायत की दुकानें पूरे गांव के सामूहिक हित के लिए होती हैं, और इनका इस्तेमाल भी सार्वजनिक हित में ही किया जाना चाहिए। यही वजह है कि प्रधान अपनी मर्जी से इन्हें बेच नहीं सकता, स्थायी रूप से किसी को दे नहीं सकता या मनमाने ढंग से पट्टे पर नहीं चढ़ा सकता। किसी भी हस्तांतरण, बिक्री या दीर्घकालीन पट्टे के लिए राज्य सरकार के निर्धारित नियमों और ऊपर के प्रशासनिक अधिकारी (जैसे संबंधित राज्य में जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी या समकक्ष पद) की पूर्व मंजूरी जरूरी होती है। बिना इस मंजूरी के किया गया कोई भी हस्तांतरण कानूनन अवैध माना जाता है, और प्रशासन ऐसे मामलों में कार्रवाई कर सकता है।
बहुत से लोग मानते हैं कि पंचायत सिर्फ सरकारी फंड पर चलती है, जबकि हकीकत में पंचायत अपनी संपत्तियों से खुद भी आय कमाती है। इसके प्रमुख स्रोत हैं:
पंचायत की आय किसी व्यक्ति के निजी बैंक खाते में नहीं जाती। यह गलतफहमी अक्सर विवाद की जड़ बनती है। पूरी राशि पंचायत की आधिकारिक निधि में जमा होती है, जिसे अधिकतर राज्यों में 'ग्राम पंचायत निधि' कहा जाता है (कुछ राज्यों में इसका नाम अलग भी हो सकता है, जैसे महाराष्ट्र में 'ग्रामनिधि')।
इस निधि से गांव की सड़कों की मरम्मत, खड़ंजा और इंटरलॉकिंग कार्य, नालियों का निर्माण, पेयजल व्यवस्था, हैंडपंप-ट्यूबवेल मरम्मत, स्ट्रीट लाइट, सफाई-कूड़ा प्रबंधन, पंचायत भवन का रखरखाव और सार्वजनिक शौचालयों का संचालन जैसे काम किए जाते हैं। यानी पंचायत की कमाई अंततः गांव के विकास में ही वापस लगनी चाहिए। कई राज्यों के पंचायती राज अधिनियमों के तहत इस खर्च के लिए सचिव और प्रधान संयुक्त रूप से जिम्मेदार होते हैं, ताकि जवाबदेही किसी एक व्यक्ति पर टिकी न रहे।
पंचायत का पैसा बिना निगरानी के खर्च नहीं होता। इस पर कई स्तरों पर नजर रखी जाती है। गांव की सबसे बड़ी निगरानी संस्था ग्राम सभा होती है, जो सीधे पंचायत से हिसाब मांग सकती है। पंचायत सचिव रिकॉर्ड और लेखा-जोखा बनाए रखता है, जबकि खंड विकास अधिकारी (BDO) विकास कार्यों और वित्तीय गतिविधियों की निगरानी करता है।
इसके ऊपर जिला स्तर की पंचायती राज मशीनरी (कुछ राज्यों में इसे जिला पंचायत राज अधिकारी या समकक्ष पद कहा जाता है) प्रशासनिक नियंत्रण रखती है, और समय-समय पर पंचायत के खातों का ऑडिट भी होता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि पंचायती राज एक राज्य विषय है, इसलिए पदनाम और सटीक निगरानी प्रक्रिया राज्य-दर-राज्य थोड़ी अलग हो सकती है, लेकिन मूल ढांचा ग्राम सभा से लेकर ऑडिट तक लगभग हर जगह मिलता-जुलता है।
गांवों में सबसे ज्यादा विवाद ग्राम समाज की भूमि, तालाब और चारागाह को लेकर ही होते हैं। तालाब जल संरक्षण और भूजल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत होते हैं, और सिंचाई-पशुपालन में भी काम आते हैं। वहीं चारागाह पशुओं की चराई भूमि होने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी आधार है। इन पर कब्जा होते ही पूरे गांव के सामूहिक अधिकार प्रभावित होते हैं, इसलिए प्रशासन समय-समय पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करता रहता है।
बिल्कुल। ग्राम सभा के सदस्य पंचायत की आय, खर्च, विकास कार्यों और संपत्तियों से जुड़ी पूरी जानकारी मांग सकते हैं। इसके अलावा, कोई भी नागरिक सूचना का अधिकार (RTI) के तहत भी यह जानकारी हासिल कर सकता है। यानी पंचायत की संपत्ति और उससे होने वाली कमाई पर गांव के हर नागरिक का वैध हित और निगरानी का अधिकार होता है। यह किसी एक प्रधान, सचिव या अधिकारी की मर्जी पर निर्भर नहीं करता।