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समुद्र के नीचे 5 किलोमीटर… कैसे बनता है तेल का कुआं, समझिए सरकार के ‘समुद्र मंथन’ मिशन का पूरा विज्ञान

Samudra Manthan Mission Bharat Sarkar: भारत सरकार की समुद्र मंथन मिशन योजना क्या है? क्या आप जानते हैं समुद्र में कैसे खोजा जाता है तेल और गैस? जानिए भारत के प्रमुख ऑफशोर ऑयल-गैस बेसिन, नई तकनीक और इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ने वाले संभावित असर क्या हो सकते हैं?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 03, 2026

Samudra Manthan Mission Bharat Offshore Oil Exploration

Samudra Manthan Mission Bharat Offshore Oil Exploration: जानिए समुद्र मंथन का पूरा विज्ञान। (AI Creative)

Samudra Manthan Mission Government of India: समुद्र की सतह पर दूर खड़ा विशाल ड्रिलशिप देखने में भले ही किसी सामान्य जहाज जैसा लगे, लेकिन इसके नीचे हजारों करोड़ रुपए की तकनीक काम कर रही होती है। समुद्र की लहरों के नीचे कई किलोमीटर गहराई में छिपे तेल और प्राकृतिक गैस तक पहुंचना आज दुनिया की सबसे जटिल इंजीनियरिंग चुनौतियों में से एक माना जाता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने 'समुद्र मंथन' योजना के तहत करीब 84 हजार करोड़ रुपए खर्च कर देश के अपतटीय (Offshore) क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज तेज करने का फैसला किया है।

एक बात तो साफ है कि, तेल समुद्र के पानी में नहीं तैरता। करोड़ों वर्ष पहले समुद्री जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के अवशेष समुद्र की तलहटी में दबते गए। समय के साथ उन पर अत्यधिक दबाव और तापमान पड़ा, जिससे वे तेल और प्राकृतिक गैस में बदल गए। बाद में ये चट्टानों की परतों के बीच फंस गए। इन्हीं भंडारों तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक आधुनिक तकनीकों का सहारा लेते हैं।

इस योजना का मकसद सिर्फ नए तेल भंडार ढूंढना नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना भी है।

समुद्र के नीचे तेल मिलता कहां है?

सबसे पहले होती है समुद्र के नीचे की 'एक्स-रे' जांच

तेल खोजने का पहला चरण सीस्मिक सर्वे (Seismic Survey) होता है। विशेष जहाज समुद्र में ध्वनि तरंगें छोड़ते हैं। ये तरंगें समुद्र तल के नीचे मौजूद विभिन्न चट्टानी परतों से टकराकर वापस लौटती हैं। कंप्यूटर इन संकेतों का विश्लेषण कर समुद्र के नीचे की त्रि-आयामी (3D) तस्वीर तैयार करते हैं। इसी से वैज्ञानिक तय करते हैं कि कहां ड्रिलिंग की संभावना सबसे अधिक है।

फिर शुरू होती है असली चुनौती

संभावित स्थान मिलने के बाद वहां अत्याधुनिक ड्रिलशिप या ऑफशोर रिग पहुंचता है। समुद्र की सतह से पहले पानी की गहराई पार की जाती है और उसके बाद समुद्र तल के नीचे कई हजार मीटर तक ड्रिलिंग होती है। कई परियोजनाओं में कुल गहराई 4 से 5 किलोमीटर या उससे भी अधिक हो सकती है।

ड्रिलिंग के दौरान विशेष ड्रिलिंग फ्लूइड (मड) का उपयोग किया जाता है, जो ड्रिल को ठंडा रखता है, चट्टानों के टुकड़ों को बाहर निकालता है और अत्यधिक दबाव को नियंत्रित करने में मदद करता है।

एक छोटी गलती और बड़ा हादसा

समुद्र में ड्रिलिंग बेहद जोखिम भरा काम है। यदि भूमिगत दबाव अचानक बढ़ जाए तो तेल और गैस तेजी से बाहर निकल सकते हैं। इसे रोकने के लिए ब्लोआउट प्रिवेंटर (Blowout Preventer) जैसी सुरक्षा प्रणाली लगाई जाती है, जो आपात स्थिति में कुएं को तुरंत सील कर देती है। इसी कारण ऑफशोर ड्रिलिंग में सुरक्षा मानकों का विशेष महत्व होता है।

तेल मिलने के बाद क्या होता है?

यदि परीक्षण सफल रहता है, तो कुएं को उत्पादन के लिए तैयार किया जाता है। पाइपलाइन या समुद्री प्लेटफॉर्म के जरिए तेल और गैस को तट तक पहुंचाया जाता है। वहां उनका शोधन (रिफाइनिंग) कर पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, एटीएफ और अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पाद बनाए जाते हैं।

भारत के लिए क्यों अहम है यह मिशन?

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने या भू-राजनीतिक तनाव होने पर इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता पर पड़ता है। यदि देश के समुद्री क्षेत्रों में नए भंडार मिलते हैं और उनका व्यावसायिक उत्पादन शुरू होता है, तो लंबे समय में ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल घरेलू उत्पादन बढ़ने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत कम नहीं होंगी, क्योंकि इन पर अंतरराष्ट्रीय बाजार, कर संरचना और विनिमय दर का भी प्रभाव पड़ता है।

किन क्षेत्रों पर टिकी हैं उम्मीदें?

भारत के पश्चिमी और पूर्वी समुद्री तट पर कई अपतटीय बेसिन पहले से ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मुंबई हाई, कृष्णा-गोदावरी बेसिन, कावेरी बेसिन, महानदी बेसिन और अंडमान क्षेत्र भविष्य की खोज के प्रमुख केंद्र हैं। नई तकनीकों के कारण अब उन गहरे समुद्री क्षेत्रों में भी खोज संभव हो रही है, जहां पहले पहुंचना कठिन था।

पर्यावरण भी बड़ी चुनौती

गहरे समुद्र में ऊर्जा खोज के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियां भी जुड़ी हैं। सीस्मिक सर्वे, ड्रिलिंग और संभावित ऑयल स्पिल का असर समुद्री जैव विविधता पर पड़ सकता है। इसलिए आधुनिक परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA), रिसाव रोकने की तकनीक और सतत निगरानी को अनिवार्य माना जा रहा है।

आगे का रास्ता

'समुद्र मंथन' केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई खोजों को कितनी तेजी से व्यावसायिक उत्पादन में बदला जा सके, पर्यावरणीय सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए और आधुनिक तकनीक का कितना प्रभावी उपयोग हो। यदि यह मिशन सफल रहा, तो आने वाले वर्षों में भारत के ऊर्जा मानचित्र में समुद्र की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

एक नजर में… समुद्र के नीचे ऐसे खोजा जाता है तेल

  1. संभावित क्षेत्र की पहचान : भूवैज्ञानिक पुराने डेटा और चट्टानों की संरचना का अध्ययन करते हैं।
  2. सीस्मिक सर्वे : विशेष जहाज ध्वनि तरंगों की मदद से समुद्र तल के नीचे की 3D तस्वीर तैयार करते हैं।
  3. परीक्षण ड्रिलिंग : जहां तेल मिलने की संभावना दिखती है, वहां ड्रिलशिप या ऑफशोर रिग से परीक्षण कुआं खोदा जाता है।
  4. भंडार का आकलन : तेल और गैस की मात्रा, गुणवत्ता और व्यावसायिक उपयोगिता की जांच होती है।
  5. उत्पादन की तैयारी : सफल परीक्षण के बाद स्थायी कुएं, प्लेटफॉर्म और पाइपलाइन बनाई जाती हैं।
  6. तेल-गैस की आपूर्ति : समुद्र से निकला कच्चा तेल रिफाइनरी तक पहुंचता है, जहां से पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और अन्य उत्पाद तैयार किए जाते।

क्या नए तेल भंडार मिलने से पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसा नहीं है कि भारत में नए तेल भंडार मिलने से पेट्रोल डीजल सस्ता होगा।

जानिए क्यों?

  • भारत अब भी अपनी अधिकांश कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है।
  • पेट्रोल-डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव से प्रभावित होती हैं।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स भी कीमत तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
  • घरेलू उत्पादन बढ़ने का फायदा मुख्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत और आयात पर निर्भरता घटाने के रूप में मिलता है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आने वाले वर्षों में बड़े भंडार मिलते हैं और उनका व्यावसायिक उत्पादन बढ़ता है, तो भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।

कहना होगा की भारत सरकार का समुद्र मंथन मिशन केवल तेल-गैस खोजने की योजना नहीं है, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति है। गहरे समुद्र के लिए अत्याधुनिक तकनीक, भारी निवेश और कड़े सुरक्षा मानकों की जरूरत होती है। यदि इस अभियान का उद्देश्य पूरा होता है और ऊर्जा भंडार मिलते हैं, तो भविष्य में आयातीत कच्चे तेल पर निर्भरता कम होने, विदेशी मुद्रा बचाने और ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। लेकिन यह सफलता ऊर्जा भंडार मिलने, उस पर तेजी से काम होने पर निर्भर करेगी।