1 अगस्त 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

भूटान में भारत का बड़ा दांव, 4000 करोड़ की ऊर्जा साझेदारी, 12 नए प्रोजेक्ट्स, जानिए क्या-क्या खास?

India Bhutan Energy Partnership: भारत-भूटान के बीच 4 हजार करोड़ की रियायती Line of Credit को आगे बढ़ाया गया है। 12 नई विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इसके साथ ही अब ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और रणनीतिक सहयोग की नई मजबूती मिलने की उम्मीद बढ़ी है।
5 min read
Google source verification

भारत

image

Sanjana Kumar

Aug 01, 2026

India Bhutan Energy Partnership

India Bhutan Energy Partnership: भारत-भूटान के राजनीतिक, रणनीतिक मजबूती की नई उम्मीद। (AI Creative)

India Bhutan Energy Partnership: भारत और भूटान के बीच रणनीतिक और ऊर्जा सहयोग को नई मजबूती मिली है। दोनों देशों ने विकास साझेदारी की समीक्षा के दौरान भूटान के लिए 4,000 करोड़ रुपए की रियायती लाइन ऑफ क्रेडिट (LoC) को आगे बढ़ाने और 12 नए Project Tied Assistance (PTA) परियोजनाओं को मंजूरी दी है। जलविद्युत के साथ अब स्वच्छ ऊर्जा, बुनियादी ढांचा और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग का दायरा बढ़ रहा है। यह पहल न केवल भूटान की अर्थव्यवस्था को गति देगी, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और पड़ोसी देशों के साथ रणनीतिक संबंधों को भी नई मजबूती देगी।

भारत-भूटान विकास साझेदारी को नई रफ्तार

भारत और भूटान के रिश्ते हमेशा से भरोसे, मित्रता और साझा विकास पर आधारित रहे हैं। हाल ही में दोनों देशों के बीच हुई विकास साझेदारी समीक्षा बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। भारत ने भूटान के लिए 4,000 करोड़ की रियायती लाइन ऑफ क्रेडिट (LoC) को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। इसके साथ ही 12 नए Project Tied Assistance (PTA) प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई, जिनका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को गति देना है। इन परियोजनाओं में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामुदायिक विकास और बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्य शामिल हैं। इनका मकसद केवल निर्माण कार्य करना नहीं, बल्कि भूटान के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना भी है।

ऊर्जा सहयोग क्यों है सबसे अहम?

भारत और भूटान की साझेदारी का सबसे मजबूत आधार जलविद्युत (हाइड्रोपावर) है। भूटान की पहाड़ी नदियां स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की बड़ी क्षमता रखती हैं, जबकि भारत ऊर्जा का बड़ा उपभोक्ता है। यही कारण है कि दोनों देशों ने दशकों से जलविद्युत परियोजनाओं को मिलकर विकसित किया है।

भारत की तकनीकी और वित्तीय सहायता से तैयार परियोजनाओं से बनने वाली बिजली का बड़ा हिस्सा भारत को निर्यात किया जाता है। इससे भूटान को विदेशी मुद्रा और स्थिर आय मिलती है, जबकि भारत को स्वच्छ ऊर्जा का भरोसेमंद स्रोत प्राप्त होता है।

केवल हाइड्रो नहीं, अब ग्रीन एनर्जी पर भी जोर

नई साझेदारी केवल जलविद्युत तक सीमित नहीं है। दोनों देश अब सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, आधुनिक ट्रांसमिशन नेटवर्क, क्षमता निर्माण और भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य बदलती वैश्विक ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप दीर्घकालिक और टिकाऊ ऊर्जा व्यवस्था तैयार करना है।

4,000 करोड़ रुपए की LoC का क्या उपयोग?

यह रियायती ऋण सुविधा ऊर्जा और विकास परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देने के लिए है। इससे नई परियोजनाओं को गति मिलेगी, ट्रांसमिशन नेटवर्क मजबूत होगा, आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ेगा और स्थानीय रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। कम ब्याज और आसान पुनर्भुगतान व्यवस्था के कारण भूटान पर वित्तीय बोझ भी सीमित रहेगा।

12 नए विकास प्रोजेक्ट्स से क्या बदलने वाला है?

स्वीकृत परियोजनाओं का उद्देश्य केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि लोगों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना है। इन परियोजनाओं में शिक्षा संस्थानों का विकास, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, सड़क संपर्क, सामुदायिक अवसंरचना, डिजिटल सेवाएं और स्थानीय विकास कार्यक्रम शामिल हैं। इससे दूरदराज के क्षेत्रों में भी विकास की गति तेज होने की उम्मीद है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह साझेदारी?

भारत के लिए यह केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। भूटान हिमालयी क्षेत्र में भारत का विश्वसनीय पड़ोसी है। मजबूत ऊर्जा सहयोग से भारत की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ती है, पूर्वोत्तर क्षेत्र को स्वच्छ बिजली मिलती है और क्षेत्रीय स्थिरता मजबूत होती है। साथ ही 'पड़ोसी प्रथम' नीति को भी मजबूती मिलती है।

भूटान को क्या मिलेगा?

भूटान को इस साझेदारी से स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने, बिजली निर्यात से राजस्व अर्जित करने, रोजगार सृजन, आधुनिक बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास को गति देने का अवसर मिलेगा। ऊर्जा क्षेत्र में निवेश से देश की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता भी मजबूत होगी।

भारत और भूटान दोनों को क्या मिलेगा?

भारत और भूटान की यह साझेदारी केवल वित्तीय सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों देशों के दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक हितों से भी जुड़ी है। भूटान के लिए सबसे बड़ा लाभ यह है कि ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार से बिजली उत्पादन बढ़ेगा और भारत को बिजली निर्यात से उसकी आय में वृद्धि होगी।

ऊर्जा क्षेत्र में निवेश से नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे, स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और दूरदराज के क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार होगा। इससे भूटान की अर्थव्यवस्था को स्थायी आधार मिलने की उम्मीद है।

भारत के लिए यह साझेदारी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने का अवसर है। बढ़ती बिजली मांग के बीच भूटान से मिलने वाली स्वच्छ जलविद्युत भारत के ऊर्जा मिश्रण को संतुलित करेगी। इससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को भी बल मिलेगा।

इसके अलावा हिमालयी क्षेत्र में मजबूत सहयोग भारत की 'पड़ोसी प्रथम' नीति को भी नई मजबूती देता है।

रणनीतिक नजरिए से क्यों अहम है यह समझौता?

भारत और भूटान के संबंध केवल व्यापार या ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर भी गहरा सहयोग है। भूटान की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

हिमालयी क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। यही कारण है कि भारत लगातार भूटान के बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करता रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक विकास जितना मजबूत होगा, द्विपक्षीय संबंध भी उतने ही मजबूत होंगे।

अब केवल जलविद्युत नहीं, भविष्य की ऊर्जा पर नजर

दोनों देश अब ऊर्जा सहयोग को नई दिशा देने की तैयारी में हैं। जलविद्युत के अलावा सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, आधुनिक ट्रांसमिशन नेटवर्क और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों पर भी सहयोग बढ़ाया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी स्टोरेज और स्मार्ट ग्रिड जैसी तकनीकों में भी दोनों देशों के बीच साझेदारी बढ़ सकती है। इससे ऊर्जा क्षेत्र अधिक आधुनिक, टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनेगा।

परियोजनाओं की सफलता के लिए क्या चुनौतियां हैं?

हालांकि दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार मजबूत हुआ है, लेकिन कई बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, भूस्खलन, निर्माण लागत में वृद्धि और समय सीमा बढ़ने जैसी चुनौतियों का सामना करती रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजनाओं की नियमित समीक्षा, आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीक, पर्यावरणीय संतुलन और समयबद्ध क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाना भी आवश्यक होगा, ताकि विकास का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचे।

अब आगे क्या?

आने वाले वर्षों में भारत और भूटान ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग को और व्यापक बनाने की दिशा में काम करेंगे। पुनात्सांगछू-I जैसी परियोजनाओं को समय पर पूरा करना, बिजली व्यापार का विस्तार, ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करना और नवीकरणीय ऊर्जा में संयुक्त निवेश दोनों देशों की प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा।

इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल कनेक्टिविटी और कौशल विकास जैसी परियोजनाओं पर भी सहयोग बढ़ने की संभावना है। नियमित समीक्षा तंत्र से परियोजनाओं की गुणवत्ता और समयबद्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत-भूटान ऊर्जा साझेदारी दक्षिण एशिया मे क्षेत्रीय सहयोग का सफल मॉडल है। इससे दोनो देशों को आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना है।

कुल मिलाकर कहना होगा कि भारत और भूटान के बीच ऊर्जा और विकास सहयोग का यह नया चरण केवल 4,000 करोड़ रुपए की रियायती लाइन ऑफ क्रेडिट या 12 नई परियोजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के दशकों पुराने भरोसे, साझी प्रगति और रणनीतिक साझेदारी का विस्तार है। जलविद्युत से आगे बढ़कर अब स्वच्छ ऊर्जा, बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग का दायरा लगातार बढ़ रहा है। इससे एक ओर भूटान को आर्थिक मजबूती, रोजगार और विकास की नई गति मिलेगी, वहीं दूसरी ओर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, 'पड़ोसी प्रथम' नीति और क्षेत्रीय स्थिरता को भी बल मिलेगा। आने वाले वर्षों में यदि परियोजनाएं समयबद्ध तरीके से पूरी होती हैं और दोनों देश नवीकरणीय ऊर्जा के नए क्षेत्रों में मिलकर आगे बढ़ते हैं, तो यह साझेदारी दक्षिण एशिया में भरोसे, सतत विकास और पारस्परिक हितों पर आधारित सहयोग का एक सफल मॉडल बनकर उभर सकती है।