
Micro Forest in India: भारत में बढ़ता माइक्रो फॉरेस्ट का ट्रेंड। (AI Creative)
Micro Forest: भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर… देश के लगभग हर बड़े शहर में गर्मी का नया रिकॉर्ड बन रहा है। सड़कें तप रही हैं, पार्क सिकुड़ रहे हैं और कंक्रीट का फैलाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में दुनिया भर के वैज्ञानिक और शहर नियोजक एक छोटे लेकिन प्रभावी समाधान की ओर देख रहे हैं और वो है माइक्रो फॉरेस्ट (Tiny Forest)।
सिर्फ 100 या 200 वर्गमीटर की खाली जमीन पर स्थानीय प्रजातियों के सैकड़ों पौधे घने रूप में लगाकर ऐसा जंगल तैयार किया जा सकता है, जो कुछ वर्षों में आसपास का सूक्ष्म जलवायु (Microclimate) बदलने की क्षमता रखता है। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि शहरी क्षेत्रों में घने वृक्ष समूह तापमान कम करने, जैव विविधता बढ़ाने और हीट आइलैंड प्रभाव घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
माइक्रो फॉरेस्ट कोई सजावटी पार्क नहीं होता। इसमें स्थानीय (Native) पेड़ों, झाड़ियों और जमीन पर उगने वाली वनस्पतियों को बहुत अधिक घनत्व के साथ लगाया जाता है ताकि कम जगह में प्राकृतिक जंगल जैसी बहुस्तरीय संरचना विकसित हो सके। यह अवधारणा जापानी वनस्पति वैज्ञानिक Akira Miyawaki की पद्धति से प्रेरित है, जिसे दुनिया के कई देशों ने अपने स्थानीय पेड़-पौधों के अनुसार अपनाया है।
सामान्य पार्क में खुली घास, सजावटी पौधे और कम घनत्व वाले पेड़ होते हैं। इसके विपरीत माइक्रो फॉरेस्ट में पेड़ इतने घने लगाए जाते हैं कि कुछ वर्षों बाद जमीन तक सीधी धूप कम पहुंचती है। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है, तापमान घटता है और पक्षियों, तितलियों तथा कीटों के लिए बेहतर आवास बनता है।
वैज्ञानिक बताते हैं कि शहरों में कंक्रीट, डामर और कम हरियाली के कारण Urban Heat Island प्रभाव बढ़ता है। दिन में जमा हुई गर्मी रात तक बनी रहती है। हालिया शोधों के अनुसार, घने वृक्षों वाले क्षेत्र आसपास की तुलना में अधिक ठंडे सूक्ष्म वातावरण तैयार कर सकते हैं और ऊर्जा की मांग भी कम करने में मदद कर सकते हैं।
इटली, ब्रिटेन, अमेरिका और कई अन्य देशों में छोटे-छोटे शहरी जंगल विकसित किए जा रहे हैं। इटली पर प्रकाशित एक अध्ययन में 100–200 वर्गमीटर के माइक्रो फॉरेस्ट को जलवायु अनुकूलन, पर्यावरण शिक्षा और शहरी जैव विविधता के लिए उपयोगी बताया गया।
भारत में भी कई नगर निकाय इस दिशा में काम शुरू कर चुके हैं। हाल के महीनों में मैसूर नगर निगम ने कई वार्डों में माइक्रो फॉरेस्ट विकसित करने की योजना बनाई, जबकि उत्तर प्रदेश में भी शहरी हीट आइलैंड प्रभाव कम करने के लिए मिनी फॉरेस्ट विकसित करने की पहल की गई है।
शहरों में छोटे-छोटे देशी जंगल केवल हरियाली नहीं बढ़ाते, बल्कि वे जैव विविधता, स्थानीय जलवायु और लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी दीर्घकालिक निवेश हैं।''प्रो. अकीरा मियावाकी, जापानी वनस्पति वैज्ञानिक एवं मियावाकी पद्धति के प्रवर्तकभारत आज दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां मियावाकी पद्धति को सबसे तेजी से अपनाया गया है। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, पुणे, हैदराबाद, भुवनेश्वर समेत कई शहर छोटे-छोटे शहरी जंगलों को जलवायु परिवर्तन और हीट आइलैंड प्रभाव से निपटने के एक समाधान के रूप में विकसित कर रहे हैं।
Updated on:
01 Aug 2026 04:03 pm
Published on:
01 Aug 2026 04:02 pm
