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सीमेंट के जंगल में उग रहा नया जंगल… क्या 100 वर्गमीटर का माइक्रो फॉरेस्ट कम कर सकता है शहर की गर्मी?

Micro Forest: लगातार बढ़ती गर्मी और कंक्रीट के फैलाव के बीच माइक्रो फॉरेस्ट देशभर के शहरों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरे हैं। जानिए कैसे 100-200 वर्गमीटर का छोटा सा जंगल तापमान कम करने, जैव विविधता बढ़ाने और कार्बन अवशोषित कर शहरी पर्यावरण को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 01, 2026

Micro Forest in India

Micro Forest in India: भारत में बढ़ता माइक्रो फॉरेस्ट का ट्रेंड। (AI Creative)

Micro Forest: भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर… देश के लगभग हर बड़े शहर में गर्मी का नया रिकॉर्ड बन रहा है। सड़कें तप रही हैं, पार्क सिकुड़ रहे हैं और कंक्रीट का फैलाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में दुनिया भर के वैज्ञानिक और शहर नियोजक एक छोटे लेकिन प्रभावी समाधान की ओर देख रहे हैं और वो है माइक्रो फॉरेस्ट (Tiny Forest)।

सिर्फ 100 या 200 वर्गमीटर की खाली जमीन पर स्थानीय प्रजातियों के सैकड़ों पौधे घने रूप में लगाकर ऐसा जंगल तैयार किया जा सकता है, जो कुछ वर्षों में आसपास का सूक्ष्म जलवायु (Microclimate) बदलने की क्षमता रखता है। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि शहरी क्षेत्रों में घने वृक्ष समूह तापमान कम करने, जैव विविधता बढ़ाने और हीट आइलैंड प्रभाव घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

आखिर माइक्रो फॉरेस्ट है क्या?

माइक्रो फॉरेस्ट कोई सजावटी पार्क नहीं होता। इसमें स्थानीय (Native) पेड़ों, झाड़ियों और जमीन पर उगने वाली वनस्पतियों को बहुत अधिक घनत्व के साथ लगाया जाता है ताकि कम जगह में प्राकृतिक जंगल जैसी बहुस्तरीय संरचना विकसित हो सके। यह अवधारणा जापानी वनस्पति वैज्ञानिक Akira Miyawaki की पद्धति से प्रेरित है, जिसे दुनिया के कई देशों ने अपने स्थानीय पेड़-पौधों के अनुसार अपनाया है।

पार्क और माइक्रो फॉरेस्ट में क्या अंतर?

सामान्य पार्क में खुली घास, सजावटी पौधे और कम घनत्व वाले पेड़ होते हैं। इसके विपरीत माइक्रो फॉरेस्ट में पेड़ इतने घने लगाए जाते हैं कि कुछ वर्षों बाद जमीन तक सीधी धूप कम पहुंचती है। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है, तापमान घटता है और पक्षियों, तितलियों तथा कीटों के लिए बेहतर आवास बनता है।

शहरों को इसकी जरूरत क्यों?

वैज्ञानिक बताते हैं कि शहरों में कंक्रीट, डामर और कम हरियाली के कारण Urban Heat Island प्रभाव बढ़ता है। दिन में जमा हुई गर्मी रात तक बनी रहती है। हालिया शोधों के अनुसार, घने वृक्षों वाले क्षेत्र आसपास की तुलना में अधिक ठंडे सूक्ष्म वातावरण तैयार कर सकते हैं और ऊर्जा की मांग भी कम करने में मदद कर सकते हैं।

दुनिया में क्या हो रहा है?

इटली, ब्रिटेन, अमेरिका और कई अन्य देशों में छोटे-छोटे शहरी जंगल विकसित किए जा रहे हैं। इटली पर प्रकाशित एक अध्ययन में 100–200 वर्गमीटर के माइक्रो फॉरेस्ट को जलवायु अनुकूलन, पर्यावरण शिक्षा और शहरी जैव विविधता के लिए उपयोगी बताया गया।

भारत में भी कई नगर निकाय इस दिशा में काम शुरू कर चुके हैं। हाल के महीनों में मैसूर नगर निगम ने कई वार्डों में माइक्रो फॉरेस्ट विकसित करने की योजना बनाई, जबकि उत्तर प्रदेश में भी शहरी हीट आइलैंड प्रभाव कम करने के लिए मिनी फॉरेस्ट विकसित करने की पहल की गई है।

भारत में जहां उग रहे हैं माइक्रो फॉरेस्ट

  1. दिल्ली: दिल्ली में कई स्थानों पर मियावाकी तकनीक से छोटे शहरी जंगल विकसित किए गए हैं। इनमें देशी प्रजातियों के पेड़ लगाकर हरित क्षेत्र बढ़ाने और शहरी जैव विविधता सुधारने पर जोर दिया गया।
  2. पुणे (महाराष्ट्र): पुणे के NIBM क्षेत्र में वन विभाग और स्थानीय नागरिकों ने करीब 30,000 देशी पौधों का मियावाकी जंगल विकसित करना शुरू किया है, जिसे शहर का नया "ग्रीन लंग" बनाने का लक्ष्य है।
  3. मैसूर (कर्नाटक): मैसूर नगर निगम 10 वार्डों में 50,000 देशी पेड़ों के साथ माइक्रो फॉरेस्ट विकसित कर रहा है। इससे पहले बने मियावाकी जंगलों में दो वर्षों में पेड़ लगभग 10 फीट तक बढ़ गए।
  4. चेन्नई (तमिलनाडु): चेन्नई में कई मियावाकी वन विकसित किए गए हैं। हाल में बकिंघम नहर पुनर्विकास परियोजना में भी घने माइक्रो फॉरेस्ट को जलवायु अनुकूलन और शहरी जैव विविधता बढ़ाने के उपाय के रूप में शामिल किया गया है।
  5. वडोदरा, उदयपुर और सिलीगुड़ी: ICLEI South Asia के सहयोग से इन शहरों में पायलट मियावाकी शहरी वन विकसित किए गए, जिन्हें बाद में अन्य स्थानों तक भी विस्तार दिया गया।

''शहरों में छोटे-छोटे देशी जंगल केवल हरियाली नहीं बढ़ाते, बल्कि वे जैव विविधता, स्थानीय जलवायु और लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी दीर्घकालिक निवेश हैं।''
-प्रो. अकीरा मियावाकी, जापानी वनस्पति वैज्ञानिक एवं मियावाकी पद्धति के प्रवर्तक

भारत आज दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां मियावाकी पद्धति को सबसे तेजी से अपनाया गया है। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, पुणे, हैदराबाद, भुवनेश्वर समेत कई शहर छोटे-छोटे शहरी जंगलों को जलवायु परिवर्तन और हीट आइलैंड प्रभाव से निपटने के एक समाधान के रूप में विकसित कर रहे हैं।