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भारत में कितने शहर भूजल खत्म होने के खतरे में? दिल्ली से बेंगलुरु और जयपुर तक गहराता संकट

Groundwater Crisis in India : दिल्ली, बेंगलुरु और जयपुर समेत भारत के प्रमुख शहरों में गहराता भूजल संकट। जानिए केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के ताजा आंकड़े, अत्यधिक दोहन के कारण और समाधान के उपाय।
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Aug 11, 2026
Water recharge
Water recharge : किन शहरों में खत्म होने वाला है भू-जल।

भारत के शहर तेजी से फैल रहे हैं। नई इमारतें, कॉलोनियां, सड़कें और औद्योगिक क्षेत्र बढ़ रहे हैं। आबादी बढ़ने के साथ पानी की मांग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में शहरों के लिए पानी का एक बड़ा सहारा जमीन के नीचे मौजूद भूजल है। लेकिन जिस रफ्तार से भूजल निकाला जा रहा है, उस रफ्तार से उसकी भरपाई नहीं हो पा रही। यही वजह है कि देश के कई शहरों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है।

दिल्ली, बेंगलुरु और जयपुर जैसे बड़े शहर इस संकट के प्रमुख उदाहरण हैं। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि देश के इतने शहरों का भूजल पूरी तरह खत्म हो चुका है। केंद्रीय भूजल बोर्ड अलग-अलग क्षेत्रों को सुरक्षित, अर्ध-संकटग्रस्त, संकटग्रस्त और अत्यधिक दोहन वाली श्रेणियों में बांटकर स्थिति का आकलन करता है।

21 शहरों को लेकर NITI Aayog ने दी थी चेतावनी

भूजल संकट को लेकर नीति आयोग की एक रिपोर्ट ने कुछ साल पहले बड़ी चिंता जताई थी। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 2020 तक दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद समेत 21 बड़े भारतीय शहरों में भूजल खत्म होने की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे करीब 10 करोड़ लोगों के प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी।

हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह पुराना अनुमान था, मौजूदा स्थिति का आंकड़ा नहीं। आज देश में भूजल की स्थिति जानने के लिए केंद्रीय भूजल बोर्ड के ताजा आकलन ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़े क्या कहते हैं?

केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2024 के आकलन में देश की 6,746 भूजल आकलन इकाइयों की स्थिति का अध्ययन किया गया। इनमें करीब 73 फीसदी इकाइयां सुरक्षित थीं, जबकि करीब 11 फीसदी इकाइयां अत्यधिक दोहन वाली श्रेणी में थीं।

देश में भूजल दोहन का कुल स्तर करीब 60 फीसदी रहा। चिंता की बात यह है कि कई इलाकों में जितना भूजल निकाला जा रहा है, उतना पानी बारिश और दूसरे प्राकृतिक स्रोतों से वापस जमीन के भीतर नहीं पहुंच रहा।

अत्यधिक दोहन वाले इलाके खास तौर पर दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों के अलावा राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में पाए गए हैं।

दिल्ली में भूजल पर सबसे ज्यादा दबाव

राजधानी दिल्ली की स्थिति इस संकट को समझने के लिए अहम है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2023 के आकलन में दिल्ली में भूजल दोहन का स्तर करीब 99 फीसदी था। दिल्ली की 34 आकलन इकाइयों में 13 अत्यधिक दोहन वाली, 12 संकटग्रस्त, 4 अर्ध-संकटग्रस्त और सिर्फ 5 सुरक्षित थीं। कुछ इलाकों में स्थिति इससे भी खराब है। वसंत विहार क्षेत्र में भूजल दोहन का स्तर 153 फीसदी तक दर्ज किया गया।

हालांकि दिल्ली की तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। कुछ इलाकों में बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने और भूजल पुनर्भरण के उपायों से स्थिति में सुधार के संकेत मिले हैं। इसका मतलब है कि सही प्रबंधन से गिरते भूजल स्तर को कुछ हद तक रोका जा सकता है।

बेंगलुरु में बारिश के बावजूद पानी का संकट

बेंगलुरु की समस्या भी गंभीर है। तेजी से बढ़ती आबादी और निर्माण गतिविधियों के कारण शहर में पानी की मांग लगातार बढ़ी है। दूसरी तरफ जमीन पर कंक्रीट बढ़ने से बारिश का पानी जमीन के भीतर कम पहुंचता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों में बेंगलुरु शहर के कई हिस्सों में भूजल का स्तर काफी नीचे पाया गया है। कुछ इलाकों में पानी 20 से 40 मीटर और कहीं-कहीं 40 से 60 मीटर की गहराई पर दर्ज किया गया।

2024 में बेंगलुरु में पानी का संकट इतना बढ़ गया था कि कई इलाकों में लोगों को टैंकरों पर निर्भर होना पड़ा। कमजोर बारिश और भूजल स्तर में गिरावट ने स्थिति को और मुश्किल बनाया।

जयपुर और राजस्थान की हालत सबसे चिंताजनक

राजस्थान में भूजल संकट और भी गहरा है। जयपुर जिले में भूजल दोहन की स्थिति बेहद गंभीर है। 2023 के आकलन में जिले के सभी 16 भूजल क्षेत्र अत्यधिक दोहन वाली श्रेणी में पाए गए थे।

जयपुर जिले में जितना भूजल निकाला जा रहा था, वह भूजल के दोबारा भरने की क्षमता से करीब 2.22 गुना था। गोविंदगढ़ और झोटवाड़ा जैसे इलाकों में कुछ वर्षों के भीतर भूजल स्तर में करीब 25 मीटर तक की गिरावट दर्ज की गई।

राजस्थान की समस्या सिर्फ जयपुर तक सीमित नहीं है। राज्य के सैकड़ों भूजल क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। खास बात यह है कि ज्यादा बारिश वाले वर्षों में भी यह संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। इसका मतलब साफ है कि सिर्फ बारिश बढ़ने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

आखिर भूजल तेजी से नीचे क्यों जा रहा है?

इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है जरूरत से ज्यादा भूजल निकालना। शहरों में घरों, उद्योगों, होटलों और निर्माण कार्यों में भूजल का इस्तेमाल बढ़ रहा है। दूसरी बड़ी वजह है शहरीकरण। सड़क, इमारत और पार्किंग बढ़ने से जमीन का बड़ा हिस्सा पक्का हो जाता है। बारिश का पानी जमीन में जाने के बजाय नालों के रास्ते बाहर निकल जाता है। कृषि भी भूजल दोहन का बड़ा कारण है। देश के कई हिस्सों में सिंचाई के लिए बड़ी मात्रा में भूजल निकाला जाता है।

इसके अलावा बारिश के बदलते स्वरूप ने भी परेशानी बढ़ाई है। कम दिनों में बहुत तेज बारिश होने पर पानी का बड़ा हिस्सा बह जाता है और जमीन के भीतर पहुंचने वाला पानी कम हो सकता है।

अगर यही हाल रहा तो क्या होगा?

भूजल संकट अचानक पैदा नहीं होता। पहले पानी का स्तर नीचे जाता है। फिर पुराने कुएं और बोरवेल कम पानी देने लगते हैं। इसके बाद लोग और गहरे बोरवेल खोदते हैं। इससे पानी निकालने की लागत बढ़ती है। आगे चलकर सिर्फ पानी की मात्रा ही नहीं, उसकी गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। कई इलाकों में नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक और यूरेनियम जैसे तत्वों की समस्या सामने आई है।

इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। जिन शहरों में सरकारी पानी की आपूर्ति पर्याप्त नहीं होगी, वहां टैंकरों पर निर्भरता बढ़ सकती है और पानी महंगा हो सकता है।

रास्ता क्या है?

भूजल संकट का समाधान सिर्फ बारिश का पानी जमा करने से नहीं होगा। पानी निकालने और पानी जमीन में पहुंचाने के बीच संतुलन बनाना होगा। बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने की व्यवस्था बढ़ानी होगी। तालाब, झील और प्राकृतिक जलस्रोत बचाने होंगे। भूजल के अत्यधिक दोहन पर रोक लगानी होगी। खेती में कम पानी वाली फसलों और पानी बचाने वाली सिंचाई पद्धतियों को बढ़ावा देना होगा।

Updated on:
11 Aug 2026 03:06 pm
Published on:
11 Aug 2026 03:06 pm