
खेती, घरों और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए बोरवेल और ट्यूबवेल आज पानी का बड़ा स्रोत बन चुके हैं। लेकिन भूजल स्तर लगातार गिरने के कारण केंद्र और राज्य सरकारों ने भूजल दोहन को लेकर कई नियम बनाए हैं। ऐसे में बोरवेल खुदवाने से पहले यह जानना जरूरी है कि किन क्षेत्रों में अनुमति लेनी पड़ती है, कृषि और व्यावसायिक उपयोग के नियमों में क्या अंतर है और नियम तोड़ने पर क्या कार्रवाई हो सकती है।
भारत में भूजल प्रबंधन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों की है, जबकि केंद्रीय स्तर पर केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) और केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) नियमन और दिशा-निर्देश जारी करते हैं। नियमों का उद्देश्य भूजल का अनियंत्रित दोहन रोकना और जल स्रोतों को सुरक्षित रखना है।
कई क्षेत्रों को भूजल उपलब्धता के आधार पर Safe, Semi-Critical, Critical और Over-Exploited श्रेणियों में बांटा जाता है। जहां भूजल का अत्यधिक दोहन हो चुका है, वहां नए बोरवेल पर अतिरिक्त प्रतिबंध या अनुमति की शर्तें लागू हो सकती हैं।
इसलिए बोरवेल खुदवाने से पहले संबंधित जिला प्रशासन, भूजल विभाग या जल संसाधन विभाग से स्थानीय नियम जरूर जांच लेने चाहिए।
कृषि उपयोग : यदि किसान अपनी खेती और सिंचाई के लिए बोरवेल या ट्यूबवेल लगाता है, तो कई केंद्रीय नियमों में कृषि उपयोग को विशेष छूट दी गई है। भारत में भूजल का सबसे बड़ा हिस्सा सिंचाई के लिए उपयोग होता है।
व्यावसायिक उपयोग : यदि भूजल का उपयोग व्यवसायिक कार्यों के लिए किया जा रहा है तो आमतौर पर नियम अधिक सख्त होते हैं और कई मामलों में NOC या पंजीकरण आवश्यक हो सकता है।
यदि कोई व्यक्ति या संस्था बिना आवश्यक अनुमति के भूजल का व्यावसायिक दोहन करती है, तो कार्रवाई की जा सकती है। संभावित कार्रवाई में शामिल हो सकते हैं:
उत्तर प्रदेश भूजल प्रबंधन एवं विनियमन अधिनियम के तहत कुछ उल्लंघनों पर लाखों रुपये तक जुर्माना और जेल का प्रावधान बताया गया है।
खाली या छोड़े गए खुले बोरवेल बच्चों और पशुओं के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट और भूजल प्राधिकरण समय-समय पर ऐसे बोरवेल को सुरक्षित तरीके से बंद करने के निर्देश जारी करते रहे हैं।