6 अगस्त 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

एक घाव और पूरा अंग खतरे में! जानिए ‘नेक्रोटाइज़िंग फेशियाइटिस’ के लक्षण और इलाज

जानिए 'मांस खाने वाली बीमारी' (Necrotizing Fasciitis) क्या है? इसके लक्षण, कारण और समय पर सही इलाज के बारे में पढ़ें।
4 min read
Google source verification

भारत

image

Chitra Badoliya

Aug 06, 2026

bacterIa

दुनिया का सबसे खतरनाक बैक्टीरिया! (AI)

नेक्रोटाइज़िंग फेशियाइटिस (Necrotizing Fasciitis), जिसे आम भाषा में 'फ्लेश-ईटिंग डिसीज़' या 'मांस खाने वाली बीमारी'
कहा जाता है, मानव शरीर को प्रभावित करने वाले सबसे घातक और दुर्लभ बैक्टीरियल इंफेक्शंस में से एक है। यद्यपि नाम से ऐसा प्रतीत हो सकता है कि कोई बैक्टीरिया सीधे तौर पर शरीर के मांस को खा रहा है, लेकिन वास्तविक में यह कुछ अलग तरह से घटता है। यह बैक्टीरिया शरीर के भीतर पहुंचकर ऐसे हानिकारक टॉक्सिन्स (ज़हरीले पदार्थ) छोड़ता है, जो आसपास के ऊतकों (tissues) और मांसपेशियों की परत को नष्ट कर देते हैं। समय पर पहचान और तुरंत इलाज न मिलने पर यह बीमारी कुछ ही घंटों में जानलेवा साबित हो सकती है।

क्या है नेक्रोटाइज़िंग फेशियाइटिस?

शरीर में त्वचा के ठीक नीचे एक महीन और मजबूत परत होती है, जिसे 'फेशिया' (Fascia) कहा जाता है। यह परत मांसपेशियों, नसों और रक्त वाहिकाओं को आपस में जोड़कर रखती है। जब बैक्टीरिया इस परत तक पहुंचते हैं, तो वे बहुत तेज़ी से फैलते हैं।
यह इंफेक्शन रक्त के प्रवाह को बाधित कर देता है, जिससे प्रभावित हिस्से तक ऑक्सीजन और आवश्यक पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते। परिणामस्वरूप, उस हिस्से की कोशिकाएं मृत होने लगती हैं। चिकित्सा विज्ञान में कोशिकाओं के इस प्रकार नष्ट होने की प्रक्रिया को 'नेक्रोसिस' (Necrosis) कहा जाता है, इसलिए इस बीमारी को नेक्रोटाइज़िंग फेशियाइटिस नाम दिया गया है।

इंफेक्शन के मुख्य कारण और बैक्टीरिया

यह बीमारी मुख्य रूप से निम्नलिखित बैक्टीरिया के संक्रमण से होती है:

  • ग्रुप ए स्ट्रैप्टोकोकस (Group A Streptococcus): इसे इस बीमारी का सबसे आम कारण माना जाता है।
  • विब्रियो वल्निफिकस (Vibrio vulnificus): यह बैक्टीरिया आमतौर पर समुद्री पानी या कच्चे/अधपके समुद्री भोजन (seafood) में पाया जाता है।
  • अन्य बैक्टीरिया: स्टैफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus aureus) और क्लॉस्ट्रिडियम (Clostridium) जैसे बैक्टीरिया भी इसके लिए ज़िम्मेदार हो सकते हैं।

शरीर में कैसे प्रवेश करता है बैक्टीरिया?

सामान्य और स्वस्थ त्वचा बैक्टीरिया को शरीर में प्रवेश करने से रोकती है। हालांकि, यदि त्वचा पर कोई छोटा सा घाव भी हो, तो ये बैक्टीरिया आसानी से शरीर के भीतर पहुंच जाते हैं। प्रवेश के प्रमुख माध्यम निम्न हैं:

कट, खरोंच या शेविंग के दौरान लगी मामूली चोट

  • कीड़े के काटने या सुई चुभने के निशान
  • जलने के घाव
  • सर्जरी के बाद बने टांके या घाव
  • समुद्री पानी के संपर्क में आने वाले खुले घाव

Who is at Risk? जोखिम कारक

यद्यपि यह बीमारी किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को हो सकती है, लेकिन कमजोर इम्युनिटी (प्रतिरोधक क्षमता) वाले लोगों में इसका जोखिम अधिक होता है। निम्न स्थितियों में सतर्कता बरतना आवश्यक है:

डायबिटीज (मधुमेह) के मरीज

  • किडनी या लीवर की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति
  • कैंसर और केमोथेरेपी करा रहे मरीज
  • अत्यधिक शराब या नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले
  • स्टेरॉयड या इम्युनिटी कम करने वाली दवाएं लेने वाले लोग

पहचानें शुरुआती और गंभीर लक्षण

इस बीमारी के लक्षण बहुत तेज़ी से विकसित होते हैं। इसकी समय पर पहचान ही मरीज की जान बचा सकती है।

शुरुआती लक्षण (पहले 24 घंटों में):

  • अत्यधिक दर्द: घाव या चोट दिखने में बहुत छोटी हो सकती है, लेकिन वहां होने वाला दर्द असहनीय और असाधारण होता है।
  • लालिमा और गर्माहट: प्रभावित स्थान पर सूजन आने लगती है और वह हिस्सा छूने पर काफी गर्म महसूस होता है।
  • बुखार और बेचैनी: मरीज को तेज़ बुखार, ठंड लगना और फ्लू जैसे लक्षण महसूस होते हैं।

गंभीर लक्षण (48 से 72 घंटों के भीतर):

  • त्वचा का रंग बदलना: प्रभावित त्वचा का रंग लाल से बदलकर बैंगनी, नीला या काला पड़ने लगता है।
  • छाले और मवाद: त्वचा पर पानी या खून से भरे छाले (blisters) बनने लगते हैं।
  • गैंग्रीन: ऊतकों के मृत होने के कारण प्रभावित हिस्से से दुर्गंध आने लगती है।
  • सेप्टिक शॉक: पूरे शरीर में इंफेक्शन फैलने से ब्लड प्रेशर अचानक गिर जाता है, मरीज बेहोश होने लगता है और शरीर के अंग काम करना बंद कर सकते हैं।

डायग्नोसिस और मेडिकल जांच

  • ब्लड टेस्ट: वाइट ब्लड सेल्स (WBC) की संख्या और इंफेक्शन के स्तर की जांच के लिए।
  • इमेजिंग स्कैन (CT Scan / MRI): ऊतकों में गैस के बुलबुले या फेशिया के नुकसान की स्थिति देखने के लिए।
  • टिश्यू बायोप्सी: प्रभावित हिस्से से छोटा सा सैंपल लेकर बैक्टीरिया की पहचान की जाती है।

इलाज की प्रक्रिया (Treatment Process)

नेक्रोटाइज़िंग फेशियाइटिस एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है। इसका इलाज केवल अस्पतालों के आईसीयू (ICU) में ही संभव है।

  • सर्जरी (Debridement): इस बीमारी के इलाज में सर्जरी सबसे महत्वपूर्ण कदम है। केवल दवाओं से इस इंफेक्शन को नहीं रोका जा सकता। सर्जन तुरंत ऑपरेशन करके सभी मृत और संक्रमित ऊतकों को काटकर बाहर निकालते हैं, ताकि इंफेक्शन स्वस्थ अंगों तक न पहुंचे। कई मामलों में इंफेक्शन को पूरी तरह साफ करने के लिए मरीज की कई बार सर्जरी करनी पड़ती है। अत्यंत गंभीर मामलों में मरीज की जान बचाने के लिए प्रभावित अंग (हाथ या पैर) को काटना (Amputation) भी पड़ सकता है।
  • नसों द्वारा एंटीबायोटिक्स (IV Antibiotics): मरीज को तुरंत हाई-डोज एंटीबायोटिक्स ड्रिप (IV) के जरिए दी जाती हैं ताकि रक्त में मौजूद बैक्टीरिया को खत्म किया जा सके।
  • सपोर्टिव केयर: मरीज का ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने के लिए आईवी फ्लूइड्स, ब्लड ट्रांसफ्यूजन और सांस लेने में तकलीफ होने पर वेंटिलेटर सपोर्ट दिया जाता है।

बचाव के उपाय

हालांकि इस बीमारी को पूरी तरह से रोकना कठिन है, लेकिन स्वच्छता और सही प्राथमिक उपचार से जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है:

  • घावों की सफाई: किसी भी छोटे-मोटे कट, खरोंच या घाव को तुरंत साबुन और साफ पानी से धोएं।
  • एंटीसेप्टिक का प्रयोग: घाव पर एंटीसेप्टिक क्रीम लगाएं और उसे साफ व सूखी पट्टी से ढककर रखें।
  • खुले घाव के साथ पानी से बचें: यदि शरीर पर कोई कट या घाव है, तो स्विमिंग पूल, हॉट टब या समुद्र के पानी में जाने से बचें।
  • हाथों की स्वच्छता: नियमित रूप से हाथ धोएं, विशेषकर घाव को छूने से पहले और बाद में।
  • डॉक्टर से संपर्क: यदि किसी छोटे घाव के आसपास अत्यधिक दर्द, सूजन या रंग में बदलाव दिखे, तो बिना समय गंवाए तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचें।