
War Environmental Impact: दुनिया भर के देशों में चलने वाले युद्ध और संघर्ष का असर पर्यावरण पर भारी (AI Creative)
War Environmental Impact:दुनिया में चल रहे युद्धों का नाम आते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में एक तस्वीर बनती है, सैनिकों की, जान-माल को होने वाले नुकसान की। लेकिन आमतौर पर युद्धों में होने वाली जान-माल की क्षति से आगे हम इसकी एक और तस्वीर भूल जाते हैं कि इसका वायुमंडल पर कितना गहरा और कैसा प्रभाव पड़ा है। ऐसे में यह सिर्फ मानवीय त्रासदी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आपदा भी बन जाती है। दरअसल आधुनिक युद्धों में मिसाइलें, लड़ाकू विमान, टैंक, गोला-बारूद, तेल भंडारों में आग और ध्वस्त होतीं फैक्ट्रियां मिलकर बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें और जहरीले प्रदूषक छोड़ती हैं, जो वातावरण में घुल जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि युद्धों का जलवायु परिवर्तन में योगदान अब एक गंभीर चिंतन का विषय बन गया है। ऐसे में वर्तमान में रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान-अमेरिका और पाकिस्तान-अफगानिस्तान जैसे संघर्षों ने वायुमंडल और पारिस्थितिकी तंत्र को किस तरह प्रभावित किया है, इस सवाल का उत्तर जानने को मजबूर कर दिया है। क्या आप भी जानना चाहेंगे?
रूस-यूक्रेन युद्ध के पर्यावरणीय प्रभाव पर अब तक सबसे ज्यादा अध्ययन किए गए हैं। यूरोपीय आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध के पहले 18 महीनों में केवल सैन्य गतिविधियों से ही करीब 77 मिलियन टन CO₂ के बराबर उत्सर्जन हुआ। इसमें हथियारों का इस्तेमाल, सैन्य वाहनों का ईंधन और आग जैसी गतिविधियां शामिल थीं। वहीं दूसरी और इनिशिएटिव ऑन जीएचजी एकाउंटिंग ऑफ वार की व्यापक रिपोर्ट में शामिल सैन्य गतिविधियों के साथ ही पुनर्निर्माण, जंगलों में आद और विस्थापन जैसे कारक शामिल हैं, इसमें पहले 12 महीनों में करीब 120 मिलियन टन CO₂e उत्सर्जन हुआ। दो वर्षों में यह नंबर बढ़कर करीब 175 मिलियन तक बढ़ गया। यह कई मध्यम आकार के देशों के वार्षिक कार्बन उत्सर्जन के बराबर माना जाता है।
दरअसल युद्ध के दौरान युक्रेन के कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में उपग्रह के आंकडो़ं के मुताबिक NO₂ (नाइट्रोजन ऑक्साइड) का स्तर 10-30 फीसदी तक कम दर्ज किया गया। इसका बड़ा कारण युद्ध नहीं बल्कि, युद्ध के कारण उद्योगों और यातायात का ठप होना था। कहना होगा कि प्रदूषण का एक स्रोत खत्म हुआ लेकिन युद्ध से होने वाले अन्य प्रदूषक कई गुना बढ़ गए।
2026 में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान में सैन्य कार्रवाई तथा ईरान की जवाबी मिसाइल और ड्रोन हमलों ने पर्यावरण पर भी गंभीर असर डाला। सैन्य ठिकानों के साथ-साथ तेल भंडारण केंद्रों, ईंधन डिपो और ऊर्जा ढांचे पर हुए हमलों से बड़े पैमाने पर आग लगी, जिससे भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें और जहरीले प्रदूषक वातावरण में फैले।
क्लाइमेट एंड कम्यूनिटी इंस्टिट्यूट (CCI) के विश्लेषण के मुताबिक, संघर्ष के पहले 14 दिनों में करीब 50.5 लाख टन (5.05 मिलियन टन) CO₂e का उत्सर्जन हुआ। यह मात्रा आइसलैंड के पूरे एक वर्ष के कार्बन उत्सर्जन से भी अधिक बताई गई है। रिपोर्ट में बताया गया कि इस दौरान कार्बन स्रोत के स्रोतों में करीब 24 लाख टन CO₂e नष्ट हुई इमारतों और बुनियादी ढांचे, लगभग 18.8 लाख टन CO₂e तेल डिपो, ईंधन भंडार और रिफाइनरी में लगी आग से, करीब 5.29 लाख टन CO₂e लड़ाकू विमान, टैंक, युद्धपोत और सैन्य वाहनों में जले ईंधन से। मिसाइलों, ड्रोन और अन्य हथियार प्रणालियों के निर्माण व उपयोग से भी हजारों टन अतिरिक्त उत्सर्जन हुआ।
ईरान में तेल डिपो और रिफाइनरी पर हमलों से निकलने वाली कालिख, राख और जहरीले रसायन बारिश के साथ गिरकर वायु, मिट्टी और जल को प्रदूषित कर रहे हैं। इससे फेफड़ों, दिल और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। कनफ्लिक्ट एंड एन्वायरमेंट ऑब्जर्वेट्री ने अब तक 400 से ज्यादा पर्यावरणीय जोखिम वाले घटनाक्रम दर्ज किए हैं। यूक्रेन में, विस्फोटों और आग से निकलने वाले रसायन, जैसे कि NOx, CO और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs), वायु में फैलकर लोगों के स्वास्थ्य पर असर डाल रहे हैं।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हालिया संघर्षों पर पर्यावरणीय आंकड़ों की कमी है। हालांकि, अफगानिस्तान में लंबे समय से चल रहे युद्धों ने जल स्तर घटने, दलदली इलाकों का सूखना, वनस्पति का क्षरण, मिट्टी का कटाव और वन्यजीवों की हानि जैसी समस्याएं पैदा की हैं। पुराने घरेलू उपकरणों से निकलने वाले HCFCs और HFCs जैसे रसायन ओजोन परत को नुकसान पहुंचाते हैं और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाते हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे संघर्षों में केवल कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) ही नहीं, बल्कि सूक्ष्म कण (PM2.5), सल्फर ऑक्साइड (SOx), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) भी हवा में फैल जाते हैं। इनसे वायु की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है। ये अम्लीय वर्षा का खतरा बढ़ाते हैं और लंबे समय में श्वसन तथा हृदय रोगों का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) कई बार चेतावनी दे चुका है कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी पर्यावरणीय नुकसान करीब एक दशक तक बना रह सकता है। इसलिए अब युद्ध के मानवीय और आर्थिक नुकसान के साथ ही पर्यावरणीय नुकसान का आकलन भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध
ईरान-अमेरिका संघर्ष
यदि हालिया अमेरिका-ईरान सैन्य टकराव (जिसमें अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाई शामिल रही) को देखें, तो शुरुआती आकलनों के अनुसार केवल पहले 14 दिनों में लगभग 50-56 लाख टन CO₂e उत्सर्जन हुआ।
संघर्ष अनुमानित कार्बन प्रभाव
रूस-यूक्रेन - 2 वर्षों में - लगभग 175 मिलियन टन CO₂e
रूस-यूक्रेन (पहला वर्ष) - लगभग 120 मिलियन टन CO₂e
अमेरिका-ईरान (पहले 14 दिन) - लगभग 5–5.6 मिलियन टन CO₂e
अब आगे क्या हो सकता है? इसके जवाब में एक्सपर्ट्स का कहना है कि युद्धों के बाद पर्यावरणीय सफाई और पुनर्निर्माण में निवेश जरूरी है। युद्ध-प्रभावित क्षेत्रों में वायु, जल और मिट्टी की निगरानी, स्वास्थ्य जांच और प्रदूषण नियंत्रण प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को युद्धों के पर्यावरणीय प्रभावों को न्यायिक रूप से मापने और जिम्मेदार पक्षों से मुआवजा दिलाने के लिए कदम उठाना चाहिए। यह समझना महत्वपूर्ण है कि युद्ध सिर्फ मानवीय त्रासदी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आपदा भी है और इसका असर दशकों तक महसूस किया जा सकता है।
Updated on:
06 Aug 2026 03:14 pm
Published on:
06 Aug 2026 03:14 pm
