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स्वतंत्रता दिवस विशेष: कौन थे लेफ्टिनेंट कर्नल रणजीत राय, जिनके एक फैसले से कश्मीर बन गया भारत का हिस्सा

भारत देश 15 अगस्त 2026 को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। स्वतंत्रता दिवस के इस मौके पर कर्नल रणजीत राय जैसे उन गुमनाम नायकों को याद करना जरूरी है, जिन्होंने आजादी मिलते ही मातृभूमि की एक-एक इंच जमीन बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी।
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Aug 12, 2026
lieutenant colonel ranjit rai
सांकेतिक इमेज (सोर्स-Chatgpt)

हमारा देश इस बार 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के लिए बलिदान देने वाले वीर सपूतों का जिक्र अवश्य होता है। 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी तो मिल गई थी, लेकिन युवा राष्ट्र के लिए असली परीक्षा अभी बाकी थी। आजादी के महज ढाई महीने बाद ही कश्मीर की धरती पर एक ऐसी लड़ाई लड़ी गई, जिसने तय किया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा रहेगा या नहीं। इस लड़ाई के सबसे बड़े नायकों में एक नाम है- लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रणजीत राय, जिनके एक फैसले ने कश्मीर की तकदीर बदल दी। रणजीत राय ने अपनी जान देकर श्रीनगर को दुश्मन के कब्जे से बचाया।

कौन थे रणजीत राय?

दीवान रणजीत राय का जन्म 6 फरवरी 1913 को एक पंजाबी जाट परिवार में गुजरांवाला में हुआ था। उन्होंने शिमला के बिशप कॉटन स्कूल से पढ़ाई की थी। 1 फरवरी 1935 को रणजीत राय को सेना में कमीशन मिला और शुरुआत में एक ब्रिटिश रेजिमेंट से जोड़ा गया। बाद में 24 फरवरी 1936 को उन्हें भारतीय सेना की 11वीं सिख रेजिमेंट की 5वीं बटालियन में नियुक्त किया गया।

रणजीत राय को मई 1936 में लेफ्टिनेंट और फरवरी 1942 में कैप्टन बनाया गया। अप्रैल 1944 तक वे भर्ती से जुड़े एक स्टाफ पद पर रहे। अक्टूबर 1947 तक रणजीत राय गुरुग्राम में तैनात सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन की कमान संभाल रहे थे और उस समय बंटवारे के दौरान भारत आ रहे शरणार्थियों की व्यवस्था में व्यस्त थे।

घुसपैठियों को रोकने के लिए कर्नल राय ने क्या किया?

अगस्त 1947 में आजादी और बंटवारे के बाद कश्मीर की रियासत को लेकर विवाद बना हुआ था। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान समर्थित हथियारबंद कबायली घुसपैठियों ने ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’ के तहत कश्मीर पर हमला बोल दिया। यह लश्कर तेजी से उरी और बारामूला होते हुए श्रीनगर की ओर बढ़ने लगा। हालात इतने नाज़ुक हो गए कि 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय-पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर कानूनी रूप से भारत का हिस्सा बन गया।

विलय होते ही भारतीय सेना को श्रीनगर भेजने का आदेश जारी हुआ। इसके बाद 27 अक्टूबर 1947 को तड़के करीब 5 बजे भारतीय वायुसेना का पहला डकोटा विमान श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरा, जिसमें कर्नल रणजीत राय के नेतृत्व में पहली सिख बटालियन के जवान सवार थे। यह आजाद भारत की सेना की पहली फौजी टुकड़ी थी, जिसे युद्धक्षेत्र में उतारा गया था। इसी वजह से हर साल 27 अक्टूबर को भारतीय सेना ‘इन्फेंट्री डे’ के रूप में मनाती है।

बटालियन को सीमा पर डटे रहने का आदेश

जब घुसपैठिए उरी और बारामूला पर कब्जा कर चुके थे और 5000 से ज्यादा हमलावर श्रीनगर की तरफ बढ़ रहे थे। उस समय कर्नल राय ने कैप्टन कमलजीत सिंह की अगुवाई में ‘सी कंपनी’ को बारामूला रवाना किया, ताकि दुश्मन को आगे बढ़ने से रोका जा सके। बारामूला और पट्टन के पास भारतीय जवानों की घुसपैठिओं की भीषण मुठभेड़ हुई। इस दौरान सिख बटालियन ने बेहद बहादुरी से मुकाबला किया। हालांकि, बारामूला और पट्टन शहरों को बचाया नहीं जा सका। इस लड़ाई में भारत के 109 जवान शहीद हुए एवं 369 घायल हुए।

श्रीनगर को सुरक्षित करके शहीद हो गए कर्नल राय

घुसपैठिओं को रोकने के लिए भारतीय सेना की जब बाकी दो कंपनियां तय समय पर श्रीनगर नहीं पहुंच पाईं और ‘माइल 32’ पर स्थिति बेकाबू होने लगी, तो कर्नल राय ने अपने सैनिकों को वहां से सुरक्षित निकालने का कठिन फैसला लिया। तब तक दुश्मन ने वापसी का रास्ता लगभग काट दिया था। अपने जवानों को घेरे से बाहर निकालने की इसी कोशिश के दौरान कर्नल राय दुश्मन की गोली का शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हुए। शहीद होने से पहले कर्नल और उनकी टुकड़ी ने श्रीनगर को पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए हमलावरों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।

रणजीत के फैसले से बदली कश्मीर की तकदीर

कर्नल राय से पहले ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने भी कई दिनों तक अकेले मोर्चा संभालकर कश्मीर की रक्षा की नींव रखी थी। लेकिन राय की टुकड़ी के डटे रहने और श्रीनगर हवाई पट्टी को सुरक्षित रखने का सीधा नतीजा यह हुआ कि अगले दिनों में भारतीय सेना की और कुमक तथा साजो-सामान हवाई मार्ग से लगातार श्रीनगर पहुंचता रहा। इसी मजबूती के दम पर बाद में शालातंग की लड़ाई में घुसपैठियों को खदेड़ दिया गया और श्रीनगर तथा घाटी का बड़ा हिस्सा भारत के नियंत्रण में सुरक्षित रह गया।

यदि राय की टुकड़ी उस दिन पीछे हट जाती या हवाई पट्टी दुश्मन के हाथ लग जाती, तो कश्मीर की तस्वीर बिल्कुल अलग होती। कर्नल राय के इसी बलिदान और नेतृत्व के लिए उन्हें मरणोपरांत स्वतंत्र भारत के पहले महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। कुछ ही दिन बाद बडगाम की लड़ाई में मेजर सोमनाथ शर्मा के नेतृत्व में 4 कुमाऊं रेजीमेंट की एक कंपनी ने भी इसी तरह श्रीनगर हवाई पट्टी की रक्षा की, जिसमें मेजर शर्मा शहीद हुए और उन्हें भारत का पहला परमवीर चक्र मिला।

Updated on:
12 Aug 2026 03:38 pm
Published on:
12 Aug 2026 03:38 pm