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Gender Gap in finance : कामकाजी महिलाओं को सिर्फ बैंक खाते नहीं, आर्थिक आज़ादी चाहिए, क्या हैं चुनौतियां?

Gender Gap in finance : महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ी है। बैंक खाते खुले हैं। क्रेडिट तक पहुंच आसान हुई है, और उद्यमिता में भी उनकी मौजूदगी मजबूत हुई है। फिर भी सवाल कायम है कि क्या भारतीय महिलाएं वास्तव में आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं? आंकड़े बताते हैं कि यात्रा शुरू हो चुकी है, लेकिन मंज़िल अभी दूर है।
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Jul 28, 2026
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महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता (Photo: ChatGpt)

Gender Gap in finance India: भारत में महिलाओं की आर्थिक भूमिका पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बदली है। कभी घर की वित्तीय जिम्मेदारियों तक सीमित रहने वाली महिलाएं अब नौकरी, व्यवसाय, निवेश और उद्यमिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। सरकारी योजनाओं, डिजिटल बैंकिंग, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और बढ़ती शिक्षा ने इस बदलाव को गति दी है।

लेकिन केवल बैंक खाता होना या ऋण मिल जाना आर्थिक स्वतंत्रता का पर्याय नहीं है। असली आर्थिक स्वतंत्रता तभी मानी जाएगी, जब महिलाएं अपनी आय पर स्वयं निर्णय ले सकें, निवेश कर सकें, व्यवसाय चला सकें और वित्तीय जोखिमों का सामना करने में सक्षम हों। यही वह बिंदु है जहां भारत की प्रगति और चुनौतियाँ साथ-साथ दिखाई देती हैं।

रोजगार बढ़ा, लेकिन गुणवत्ता अभी भी चुनौती

भारत में महिला श्रम भागीदारी दर (Female Labour Force Participation Rate) 2017-18 में 23.3 प्रतिशत थी, जो 2023-24 के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के अनुसार बढ़कर 41.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह उल्लेखनीय सुधार है और यह दर्शाता है कि पहले की तुलना में अधिक महिलाएं कार्यबल का हिस्सा बन रही हैं। हालांकि इस वृद्धि की एक महत्वपूर्ण दूसरी सच्चाई भी है।

ग्रामीण महिलाओं की बढ़ी हिस्सेदारी पर…

PLFS के आंकड़े बताते हैं कि यह वृद्धि मुख्यतः ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी से आई है, और इसका बड़ा हिस्सा स्वरोजगार, कृषि, पारिवारिक व्यवसाय या बिना वेतन वाले कार्यों से जुड़ा है। हालांकि रोजगार में विविधता लाने के बजाय महिलाएं फिर से कृषि की ओर लौट रही हैं। कुल कामकाजी महिलाओं में स्वरोजगार की हिस्सेदारी 2017-18 के 51.9 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में लगभग 67.4 प्रतिशत हो गई है, जबकि ग्रामीण महिला कार्यबल में कृषि की हिस्सेदारी 71.1 प्रतिशत से बढ़कर 76.9 प्रतिशत तक पहुँच गई। यानी महिलाएँ काम तो कर रही हैं, लेकिन उनमें से बड़ी संख्या सामाजिक सुरक्षा, निश्चित आय, मातृत्व लाभ और पेंशन जैसी सुविधाओं से अभी भी वंचित है।

वेतन असमानता का सवाल अभी बरकरार

वेतनभोगी महिलाएँ पुरुषों की तुलना में लगभग 76 प्रतिशत ही कमा पाती हैं और स्वरोजगार में यह अंतर और भी अधिक है। यही कारण है कि महिला रोजगार के आँकड़ों में सुधार के बावजूद आर्थिक सुरक्षा का स्तर उसी गति से नहीं बढ़ पाया है।

बैंक खाते खुले, लेकिन क्या महिलाएं उनका पूरा उपयोग कर रही हैं?

पिछले एक दशक में जनधन योजना और डिजिटल वित्तीय समावेशन ने भारत की बैंकिंग व्यवस्था को व्यापक बनाया है। आज अधिकांश भारतीय महिलाओं के पास बैंक खाता है। लेकिन वित्तीय समावेशन का नया प्रश्न अब "खाता है या नहीं" नहीं, बल्कि "खाते का उपयोग कितना होता है" बन गया है।

- 2011 में पुरुषों और महिलाओं के बीच बैंक खाता स्वामित्व का अंतर लगभग 17 प्रतिशत अंक था।

- 2021 तक प्रधानमंत्री जन धन योजना के चलते महिलाओं और पुरुषों के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो गया।

- 2024 में महिलाओं (89.2%) का खाता स्वामित्व पुरुषों (88.8%) से थोड़ा अधिक दर्ज किया गया।

अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों और वित्तीय समावेशन संबंधी रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि महिलाओं के पास बैंक खाते तो हैं, लेकिन डेबिट कार्ड का उपयोग, डिजिटल भुगतान, मोबाइल बैंकिंग, निवेश और औपचारिक वित्तीय सेवाओं का इस्तेमाल पुरुषों की तुलना में कम है।

इसके पीछे कई कारण हैं—

  • डिजिटल साक्षरता की कमी
  • मोबाइल और इंटरनेट तक सीमित पहुंच
  • परिवार के पुरुष सदस्य द्वारा वित्तीय निर्णय लिया जाना
  • आय पर सीमित नियंत्रण
  • सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिबंध

यानी वित्तीय पहुंच का पहला चरण पूरा हो चुका है, लेकिन वित्तीय उपयोग का दूसरा चरण अभी अधूरा है।

क्रेडिट मार्केट में महिलाओं की मजबूत होती मौजूदगी

- महिलाओं का कुल क्रेडिट पोर्टफोलियो अब लगभग ₹76 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है, जो देश के कुल सिस्टम क्रेडिट का लगभग 26 प्रतिशत है।

- 2017 में यह पोर्टफोलियो लगभग ₹16 लाख करोड़ था यानी 2025 तक इसमें लगभग 4.8 गुना वृद्धि दर्ज की गई है।

- पहले महिलाएं मुख्य रूप से छोटे ऋण या स्वयं सहायता समूहों तक सीमित थीं।

- अब महिलाएं गृह ऋण, व्यवसाय ऋण, वाहन ऋण, शिक्षा ऋण और रिटेल क्रेटिड ले रही हैं।

आधार e-KYC, UPI और डिजिलॉकर जैसी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) ने ग्रामीण क्षेत्रों में पहली बार ऋण लेने वाली महिलाओं के लिए प्रवेश की बाधाओं को भी कम किया है।

हाउसिंग लोन में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी

आवासीय संपत्ति महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार मानी जाती है।

2022 से 2025 के बीच रिटेल लोन में महिलाओं की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत तक पहुँच गई।

विशेष रूप से हाउसिंग लोन में महिलाओं की हिस्सेदारी 63 प्रतिशत से बढ़कर 69 प्रतिशत हो गई। इसमें स्टाम्प ड्यूटी में महिलाओं को दी जाने वाली छूट जैसी सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं की भी भूमिका रही है। इसका अर्थ केवल घर खरीदना नहीं है।

जब किसी महिला के नाम संपत्ति होती है, तब-

  • उसकी आर्थिक निर्णय क्षमता बढ़ती है।
  • भविष्य में बैंक से ऋण लेना आसान होता है।
  • परिवार में उसकी सामाजिक स्थिति मजबूत होती है।
  • घरेलू हिंसा और आर्थिक निर्भरता का जोखिम अपेक्षाकृत कम हो सकता है।

इसलिए संपत्ति स्वामित्व महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।

उपभोग ऋण में भी बढ़ रही भागीदारी

  • क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन और उपभोग आधारित ऋणों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ रही है।
  • 2022 में जहाँ यह लगभग 16 प्रतिशत थी, वहीं 2025 तक बढ़कर 19 प्रतिशत हो गई।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस क्षेत्र में वित्तीय साक्षरता अत्यंत आवश्यक है।

यदि उपभोग ऋण का उपयोग आय बढ़ाने वाले निवेश के बजाय केवल खर्च बढ़ाने के लिए किया जाए, तो यह आर्थिक स्वतंत्रता के बजाय कर्ज़ के बोझ का कारण भी बन सकता है।

महिला उद्यमिता की नई उड़ान

भारत में महिला उद्यमिता अब केवल कुटीर उद्योग तक सीमित नहीं रही।

सरकार द्वारा संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2026 तक Udyam पंजीकरण पोर्टल और Udyam Assist प्लेटफॉर्म पर 3.07 करोड़ से अधिक महिला-नेतृत्व वाले उद्यम पंजीकृत हो चुके हैं, और महिला-स्वामित्व वाले उद्यमों की हिस्सेदारी कुल पंजीकृत MSMEs में लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच गई है। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत भी लगभग 39-40 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएँ हैं, और महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों को CGTMSE योजना के तहत सामान्य 75 प्रतिशत की तुलना में 90 प्रतिशत तक कोलैटरल-मुक्त क्रेडिट गारंटी कवरेज भी मिलता है। यह आंकड़ा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि महिलाएं अब केवल रोजगार खोजने वाली नहीं, बल्कि रोजगार देने वाली भी बन रही हैं।

स्टार्टअप, ऑनलाइन व्यवसाय, खाद्य प्रसंस्करण, फैशन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, डिजिटल सेवाएँ और कृषि आधारित उद्यमों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

केवल ऋण नहीं, वित्तीय शिक्षा भी जरूरी

विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल ऋण उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है।

यदि महिला को व्यवसाय प्रबंधन, नकदी प्रवाह, लाभ-हानि, डिजिटल भुगतान, कर व्यवस्था और निवेश की जानकारी न हो, तो व्यवसाय लंबे समय तक सफल नहीं रह सकता।

इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए Women's World Banking और महाराष्ट्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (UMED–MSRLM) की EmpowerHer पहल के तहत लगभग एक लाख महिला उद्यमियोंको वित्तीय एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया है।

ऐसी पहलें यह दिखाती हैं कि आर्थिक सशक्तिकरण केवल पूंजी से नहीं, बल्कि ज्ञान और कौशल से भी आता है।

आर्थिक एजेंसी का नया मॉडल

हाल के शोध यह भी बताते हैं कि यदि वित्तीय योजनाएं महिलाओं को ध्यान में रखकर तैयार की जाएं, तो उनका प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है।

भारत में महिला नमक किसानों पर आधारित सौर जल पंप परियोजना इसका एक उदाहरण मानी जाती है।

इस परियोजना में -

  • महिलाओं को प्रत्यक्ष आय मिली।
  • संपत्ति स्वामित्व बढ़ा।
  • उत्पादन क्षमता में सुधार हुआ।
  • परियोजना अधिक टिकाऊ साबित हुई।

यह अनुभव बताता है कि जब महिलाओं को वित्तीय निर्णयों में वास्तविक भागीदारी मिलती है, तब विकास अधिक समावेशी और स्थायी बनता है।

कानून हैं, लेकिन बराबरी अभी अधूरी

विश्व बैंक की Women, Business and the Law 2026 रिपोर्ट (190 अर्थव्यवस्थाओं पर आधारित इस अध्ययन का ग्यारहवाँ संस्करण) एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी देती है।

रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में केवल लगभग 4 प्रतिशत महिलाएँ ऐसे देशों में रहती हैं जहाँ उन्हें पुरुषों के लगभग बराबर कानूनी अधिकार प्राप्त हैं, और वैश्विक स्तर पर महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कानूनी अधिकारों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा ही हासिल है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि भले ही कानून बराबरी की बात करें, लेकिन उन्हें लागू कराने वाली नीतियों और संस्थाओं की उपलब्धता वैश्विक औसत में केवल लगभग 47 अंक (100 में से) है यानी अधिकारों के इस्तेमाल के लिए ज़रूरी आधे से कम ढाँचे ही मौजूद हैं।

भारत सहित अनेक देशों में महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन, संस्थागत सहयोग और न्याय तक आसान पहुँच अभी भी चुनौती बनी हुई है।

कानून तभी प्रभावी होते हैं जब -

  • महिलाओं को अपने अधिकारों की जानकारी हो।
  • कानूनी सहायता सुलभ हो।
  • वित्तीय संस्थाएँ लैंगिक रूप से संवेदनशील हों।
  • सामाजिक सोच में बदलाव आए।

कामकाजी महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौतियाँ

आज भी लाखों कामकाजी महिलाओं को कई स्तरों पर वित्तीय असमानता का सामना करना पड़ता है।

इनमें प्रमुख हैं -

  • समान कार्य के लिए असमान वेतन
  • करियर में पदोन्नति की धीमी गति
  • मातृत्व के बाद रोजगार में व्यवधान
  • घरेलू और पेशेवर जिम्मेदारियों का दोहरा दबाव
  • निवेश और वित्तीय निर्णयों में सीमित भागीदारी
  • डिजिटल वित्तीय सेवाओं का सीमित उपयोग

यही कारण है कि आर्थिक स्वतंत्रता केवल आय अर्जित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस आय पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी उतनी ही आवश्यक है।

आगे की राह

भारत महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के मामले में परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। रोजगार, बैंकिंग, डिजिटल वित्त, ऋण और उद्यमिता—हर क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है। यह बदलाव केवल सरकारी योजनाओं का परिणाम नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक सोच, शिक्षा, तकनीक और महिलाओं की बढ़ती आकांक्षाओं का भी संकेत है।

फिर भी अगला चरण अधिक चुनौतीपूर्ण है। अब आवश्यकता केवल बैंक खाते खोलने की नहीं, बल्कि वित्तीय साक्षरता बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध कराने, औपचारिक क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने, संपत्ति स्वामित्व को प्रोत्साहित करने और डिजिटल वित्तीय सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करने की है।

जब महिलाएं अपनी कमाई, बचत, निवेश और व्यवसाय से जुड़े निर्णय स्वयं लेने लगेंगी, तभी आर्थिक स्वतंत्रता वास्तविक अर्थों में हासिल होगी।

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी यह केवल लैंगिक समानता का प्रश्न नहीं, बल्कि समावेशी विकास, उत्पादकता और दीर्घकालिक आर्थिक प्रगति का आधार है। महिलाओं की आर्थिक क्षमता का पूर्ण उपयोग देश की विकास यात्रा को नई गति दे सकता है। इसलिए अब लक्ष्य केवल वित्तीय समावेशन नहीं, बल्कि वित्तीय सशक्तिकरण होना चाहिए, जहां महिलाएं केवल वित्तीय प्रणाली का हिस्सा न हों, बल्कि उसकी निर्णायक भागीदार भी बनें।

Updated on:
28 Jul 2026 05:50 pm
Published on:
28 Jul 2026 05:50 pm