
दुनिया के ज्यादातर मुल्कों में जल संकट गहराने लगा है। पानी के प्राकृतिक स्रोत कम होते जा रहे हैं। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों में समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाने को लेकर काम चल रहा है। भारत में इस दिशा में पहल शुरू हो गई है। आइए जानते हैं कि देश में कहां-कहां समुद्र का जल पीने योग्य बनाने की दिशा में काम चल रहा है।
समुद्र का पानी नमकीन होता है, इसलिए उसे पीने योग्य बनाने के लिए उसमें से नमक और अन्य अशुद्धियां हटानी पड़ती हैं। सबसे सामान्य तरीका है रिवर्स ऑस्मोसिस (Reverse Osmosis)। इसमें समुद्र के पानी को उच्च दबाव में एक विशेष झिल्ली (मेम्ब्रेन) से गुजारा जाता है, जो पानी को पार होने देती है, लेकिन नमक और अन्य अशुद्धियों को रोकती है। इस प्रक्रिया में पहले पानी को फिल्टर किया जाता है ताकि झिल्ली बंद न हो, और बाद में उसे पीने योग्य बनाने के लिए उसमें फिर से खनिज मिलाए जाते हैं। एक पुराना तरीका थर्मल डीसैलिनेशन है, जिसमें पानी को गर्म करके भाप बनाकर फिर से ठंडा कर पीने योग्य बनाया जाता है—लेकिन यह ऊर्जा की दृष्टि से महंगा होता है।
इसके अलावा, बीएआरसी, बीएचईएल, एनपीसीआईएल जैसी संस्थाओं ने छोटे स्तर पर एसडब्ल्यूआरओ (Sea Water Reverse Osmosis) तकनीक पर आधारित प्लांट विकसित किए हैं—जैसे कलपक्कम, कुदनकुलम आदि में।
समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाना संभव है और कई स्थानों पर यह काम कर रहा है। भारत में मुंबई, लक्षद्वीप और चेन्नई जैसे स्थानों पर यह तकनीक लागू हो रही है। लेकिन चुनौतियाँ भी हैं- ऊर्जा की लागत, पर्यावरणीय प्रभाव और आर्थिक व्यवहार्यता। इनसे निपटने के लिए ऊर्जा-कुशल तकनीकों (जैसे OTEC), ब्राइन प्रबंधन और शोध-आधारित सुधारों की आवश्यकता है। साथ ही, जल संरक्षण और पुनर्चक्रण (recycling) को प्राथमिकता देना भी जरूरी है, क्योंकि वे कम ऊर्जा में अधिक पानी उपलब्ध कराते हैं।
मुंबई का मनोरी प्लांट अगले चार वर्षों में चालू होने की उम्मीद है, जो शहर की जल सुरक्षा में बड़ा बदलाव ला सकता है। लक्षद्वीप का OTEC मॉडल भी एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि कैसे ऊर्जा और पानी दोनों को एक साथ प्राप्त किया जा सकता है। देश के अन्य तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में इन तकनीकों को अपनाने से जल संकट से निपटने में मदद मिलेगी। लेकिन यह तभी संभव है जब तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा जाए।
समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसे समझदारी, शोध और सतत प्रयास से ही सफल बनाया जा सकता है।