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सरकारी स्कूलों से दूर हो रहे बच्चे, क्या बदल रही पढ़ाई की पसंद या फिर सिस्टम पर घटता भरोसा, जानिए क्यों?

Government School Enrollment Decline why in India: भारत में राज्य सरकारें सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने के प्रयासों के तहत लगातार जतन कर रही हैं, लेकिन इस विषय पर सरकारों की सफलता अब भी दूर है... जानिए क्या हैं कारण, क्यों सरकारी स्कूलों से दूरियां बना रहे बच्चे?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 03, 2026

Government School Enrollment Decline why in India

Government School Enrollment Decline why in India: सरकारी स्कूलों में स्थितियां सुधारने के बाद भी कम हो रही बच्चों की संख्या, जानिए क्यों? (AI Creative)

Government School Enrollment Decline: भारत की शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। एक ओर सरकार स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और नई शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों से बच्चों का नामांकन लगातार घट रहा है, वहीं निजी स्कूलों की ओर रुझान बढ़ रहा है। शिक्षा मंत्रालय की ताजा UDISE रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो वर्षों में सरकारी स्कूलों में लगभग 86 लाख छात्रों की कमी दर्ज हुई, जबकि इसी अवधि में निजी मान्यता प्राप्त स्कूलों में 88 लाख से अधिक नए छात्र जुड़े। यह केवल आंकड़ों का बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय परिवारों की बदलती सोच, शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य की उम्मीदों का संकेत भी है।

सरकारी स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं अभिभावक?

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं। वे इसका सबसे बड़ा कारण अंग्रेजी माध्यम की बढ़ती मांग। आज अधिकांश अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम में पढ़े ताकि, आगे चलकर प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार में उन्हें फायदा मिले। दूसरा कारण, निजी स्कूलों में अनुशासन, नियमित पढ़ाई और अभिभावकों के साथ बेहतर संवाद की धारणा ने भी इसे बल दिया है। कम फीस वाले निजी स्कूलों के बढ़ने से मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए भी यह विकल्प आसान हुआ है। कई राज्यों में सरकारी स्कूलों के विलय (Merger) और कम नामांकन वाले स्कूलों के बंद होने से भी बच्चों का निजी स्कूलों की ओर रुख बढ़ा है। क्योंकि सरकारी स्कूलों के विलय से कई स्टूडेंट्स का स्कूल उनके घर से बहुत दूर हो गया है।

क्या सरकारी स्कूलों में सब कुछ खराब है?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसा कहना कि सरकारी स्कूलों में सबकुछ खराब है, किसी भी आशय से पूरी तरह सही नहीं होगा। एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (UDISE) की रिपोर्ट कहती है, स्कूलों में शिक्षकों की संख्या बढ़ी है और छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) में सुधार हुआ है। एक कक्षा में पास होकर अगली कक्षा में जाने की दर (Transition Rate) भी पहले की तुलना में बेहतर हुई है। वहीं शून्य नामांकन वाले और एक शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या में भी कमी आई है। यानी बुनियादी व्यवस्था में सुधार हुआ है, लेकिन यह सुधार अभी तक अभिभावकों का भरोसा पूरी तरह नहीं जीत पाया है।

क्या बदल रही है भारत की शिक्षा व्यवस्था?

विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा अब केवल 'स्कूल' नहीं बल्कि 'भविष्य में निवेश' बन गई है। परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करने को तैयार हैं। कई अभिभावकों के लिए स्कूल चुनने के प्रमुख आधार हैं, जानिए क्या-

  • अंग्रेजी माध्यम
  • प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी
  • डिजिटल क्लास
  • बेहतर उपस्थिति और अनुशासन
  • अतिरिक्त गतिविधियां
  • परिवहन और सुरक्षा
  • यही कारण है कि छोटे शहरों और कस्बों में भी निजी स्कूल तेजी से बढ़ रहे हैं।

गांवों में चुनौती ज्यादा

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अलग है। कई गांवों में छात्रों की संख्या घटने के कारण स्कूलों का विलय किया जा रहा है। इससे बच्चों को दूर जाकर पढ़ना पड़ता है। विशेषकर प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों और लड़कियों पर इसका अधिक असर पड़ सकता है। हालांकि कुछ राज्यों ने सरकारी स्कूलों में CBSE पाठ्यक्रम, स्मार्ट क्लास और आधुनिक सुविधाएं देकर स्थिति बदलने की कोशिश शुरू की है। इसका उदाहरण बना है हिमाचल प्रदेश। यहां हाल के महीनों में हजारों छात्र निजी स्कूलों से वापस सरकारी स्कूलों में आए हैं।

क्या यह केवल निजी स्कूलों की जीत है?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक ऐसा जरूरी नहीं है। भारत में जन्मदर में लगातार गिरावट भी स्कूलों में कुल नामांकन को प्रभावित कर रही है। शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (UDISE) के मुताबिक कुल छात्र संख्या में भी हल्की कमी दर्ज हुई है। इसलिए सरकारी स्कूलों में घटता नामांकन केवल निजी स्कूलों की ओर पलायन नहीं, बल्कि जनसांख्यिकीय बदलाव का भी परिणाम है।

जानिए अब आगे क्या?

भारत की नई शिक्षा नीति का लक्ष्य सरकारी और निजी शिक्षा के बीच गुणवत्ता का अंतर कम करना है। यदि सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, अंग्रेजी माध्यम के विकल्प, डिजिटल संसाधन और बेहतर सीखने के परिणाम दिखाई देते हैं, तो अभिभावकों का भरोसा फिर मजबूत हो सकता है।

दरअसल सरकारी स्कूलों से घटता नामांकन केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि सामाजिक बदलाव का संकेत भी बन गया है। एक ओर सरकारी व्यवस्था में सुधार के प्रयास जारी हैं, दूसरी ओर परिवार अपने बच्चों के भविष्य के लिए नए विकल्प चुन रहे हैं। असली चुनौती यह नहीं कि निजी स्कूल आगे बढ़ रहे हैं, बल्कि यह है कि सरकारी स्कूलों पर लोगों का भरोसा कैसे और कितनी जल्दी मजबूत किया जाए। आने वाले वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था की सफलता इसी सवाल के जवाब पर निर्भर करेगी।