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राजस्थान के 7 अनजाने कंद-मूल, जिनका स्वाद एक बार चखा तो भूल नहीं पाएंगे

क्या आपने राजस्थान के राम कंद, जंगली कंद-मूल और पारंपरिक खाद्य विरासत के बारे में सुना है? जानिए रेगिस्तान में मिलने वाले इन दुर्लभ कंद-मूलों का स्वाद, पारंपरिक उपयोग, पोषण और उनसे जुड़ी रोचक कहानियां।
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 03, 2026

Traditional Food

प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT

राजस्थान की सूखी, धूप-भरी धरती में छिपे ऐसे कंद-मूल हैं, जो न सिर्फ भूख मिटाते हैं, बल्कि स्वाद और संस्कृति की गहराई भी खोलते हैं। ये जंगली जड़ें और कंद, जिन्हें अक्सर "अनजाने" कहा जाता है, राजस्थान की पारंपरिक रसोई में आज भी जीवनदायिनी भूमिका निभाते हैं।

आइए, जानते हैं इन खास कंद-मूलों की कहानी, स्वाद और आपके खाने पर पड़ने वाले असर को।

अद्भुत जंगली कंद-मूल: राजस्थान की भूख मिटाने वाली विरासत

राजस्थान के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में जंगली कंद-मूलों का उपयोग सदियों से होता आ रहा है। CSIR-NISCAIR की एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिणी राजस्थान में 46 जंगली खाद्य पौधों की पहचान की गई है। इनमें से अधिकांश पौधे सूखे मौसम या अकाल में भोजन का भरोसेमंद स्रोत बने रहते हैं।

हर्षनाथ पहाड़ियों पर 105 औषधीय (मेडिसिनल) पौधों की प्रजातियों पर स्टडी की गई थी, जो 49 कुलों (families) से संबंधित थीं।

राम कंद-मूल: सूखे में ठंडक और ऊर्जा का स्रोत

"राम कंद-मूल" नाम से प्रसिद्ध यह जंगली कंद, राजस्थान और गुजरात के शुष्क, पत्थरीले इलाकों में पाया जाता है। यह Asparagus racemosus (शतावरी) का मोटा, गुदेदार कंद होता है, जिसे स्थानीय लोग प्यास बुझाने और गर्मी से राहत पाने के लिए खाते हैं।

इसमें पानी और स्टार्च की मात्रा अधिक होती है, जिससे यह तुरंत ऊर्जा और ठंडक देता है। लोककथाओं में कहा जाता है कि भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान इसे खाया था, इसलिए इसे पवित्र और जीवनदायी माना जाता है।

राजस्थान की पारंपरिक रसोई में कंद-मूल की भूमिका

राजस्थानी रसोई में सूखे और संरक्षित खाद्य पदार्थों का विशेष महत्व है। जैसे कि केर-सांगरी, कचरी, गट्टे, पित्तोड आदि। इनमें से कई कंद-मूल आधारित हैं। उदाहरण के लिए, कचरी (एक प्रकार का जंगली खीरा) मांस को मैरिनेट करने में इस्तेमाल होती है और उसे एक खास खट्टा स्वाद देती है। केर-सांगरी, जो खेजड़ी की बेरी और सांगरी से बनती है, सूखी बनी रहती है और शादी-समारोहों में पारंपरिक रूप से परोसी जाती है।

ये कंद-मूल न केवल स्वाद में अनूठे हैं, बल्कि लंबे समय तक सुरक्षित भी रहते हैं—जो राजस्थान जैसे सूखे प्रदेश में बहुत जरूरी है।

स्वाद और पोषण: क्या खास है इन कंद-मूल में?

राम कंद-मूल जैसे कंदों में पानी और स्टार्च की मात्रा अधिक होती है, जिससे वे तुरंत ऊर्जा और ठंडक प्रदान करते हैं। हालांकि, इन पर वैज्ञानिक पोषण डेटा सीमित है, लेकिन पारंपरिक ज्ञान इसे ठंडक देने वाला और ऊर्जा बढ़ाने वाला मानता है।

बता दें, वैज्ञानिक समुदाय में राम कंद-मूल की पहचान को लेकर मतभेद है।

दूसरी ओर, जंगली पौधों पर हुए अध्ययन बताते हैं कि इनमें पोषक तत्वों की मात्रा अच्छी होती है। जैसे कि दक्षिणी राजस्थान के अध्ययन में दर्ज पौधों में से कई को पकाकर खाया जाता है, जो पोषण सुरक्षा में योगदान करते हैं। सिकर जिले के अध्ययन में भी इन पौधों की पारिस्थितिकी और स्थानीय उपयोगिता पर जोर दिया गया है।

इन कंद-मूलों का स्वाद अक्सर मिट्टी जैसा, ठंडा, खट्टा या हल्का मीठा होता है—जो पारंपरिक मसालों के साथ मिलकर एक अनूठा स्वाद पैदा करता है।

आपके खाने में इन कंद-मूलों का असर

अगर आप इन कंद-मूलों को अपनी रसोई में शामिल करते हैं, तो आपको मिलेगा:

  • प्राकृतिक ठंडक और ऊर्जा का स्रोत, खासकर गर्मियों में।
  • पारंपरिक स्वाद और सांस्कृतिक जुड़ाव—जैसे केर-सांगरी या राम कंद-मूल की लोककथा।
  • सूखे मौसम में सुरक्षित और टिकाऊ खाद्य विकल्प।

लेकिन ध्यान रहे:

  • इन जंगली कंद-मूलों को पहचानना और सही तरीके से तैयार करना जरूरी है। गलत पहचान से स्वास्थ्य जोखिम हो सकता है।
  • पोषण संबंधी वैज्ञानिक जानकारी सीमित है, इसलिए इन्हें संतुलित आहार के हिस्से के रूप में ही शामिल करें।

अगर आप इन कंद-मूलों को आजमाना चाहते हैं, तो स्थानीय आदिवासी या ग्रामीण समुदायों से सीखें—वे इन पौधों की पहचान और उपयोग में पारंगत होते हैं। साथ ही, किसी विश्वसनीय पोषण विशेषज्ञ या कृषि विश्वविद्यालय से सलाह लेना भी उपयोगी रहेगा।

इन कंद-मूलों को आजमाकर आप न सिर्फ स्वाद में नई गहराई जोड़ेंगे, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत से भी जुड़ेंगे।