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क्या समुद्र का पानी पीने योग्य बन सकता है? जानें भारत और दुनिया में कहां चल रहे नए प्रयोग!

भारत समेत दुनिया के कई मुल्कों में जल संकट के बीच समुद्र का खारा पानी अब तकनीक से मीठा बन रहा है। जानिए भारत और दुनिया के किन देशों में क्या नए प्रयोग किए जा रहे हैं।
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Sea Water

जानिए समुद्र का पानी कैसे पीने योग्य बन सकता है (CHatGpt)

दुनिया के ज्यादातर मुल्कों में जल संकट गहराने लगा है। पानी के प्राकृतिक स्रोत कम होते जा रहे हैं। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों में समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाने को लेकर काम चल रहा है। भारत में इस दिशा में पहल शुरू हो गई है। आइए जानते हैं कि देश में कहां-कहां समुद्र का जल पीने योग्य बनाने की दिशा में काम चल रहा है।

समुद्र के पानी को कैसे पीने योग्य बनाया जाता है?

समुद्र का पानी नमकीन होता है, इसलिए उसे पीने योग्य बनाने के लिए उसमें से नमक और अन्य अशुद्धियां हटानी पड़ती हैं। सबसे सामान्य तरीका है रिवर्स ऑस्मोसिस (Reverse Osmosis)। इसमें समुद्र के पानी को उच्च दबाव में एक विशेष झिल्ली (मेम्ब्रेन) से गुजारा जाता है, जो पानी को पार होने देती है, लेकिन नमक और अन्य अशुद्धियों को रोकती है। इस प्रक्रिया में पहले पानी को फिल्टर किया जाता है ताकि झिल्ली बंद न हो, और बाद में उसे पीने योग्य बनाने के लिए उसमें फिर से खनिज मिलाए जाते हैं। एक पुराना तरीका थर्मल डीसैलिनेशन है, जिसमें पानी को गर्म करके भाप बनाकर फिर से ठंडा कर पीने योग्य बनाया जाता है—लेकिन यह ऊर्जा की दृष्टि से महंगा होता है।

भारत : मुंबई और लक्षद्वीप में चल रहे प्रयोग

  1. मुंबई (मनोरी) : मुंबई में अब शहर को पानी की कमी से निजात दिलाने के लिए मनोरी में पहला बड़ा डीसैलिनेशन प्लांट बनने जा रहा है। यह प्लांट समुद्र के पानी को पीने योग्य पानी में बदलने की क्षमता रखता है और शहर में इस स्तर पर ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
  • अप्रैल 2026 में इस परियोजना को सीआरजेड (Coastal Regulation Zone) की मंजूरी मिल चुकी है, जो एक बड़ा कदम था।
  • मई 2026 में बताया गया कि यह 200 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) क्षमता से शुरू होगा, जिसे बाद में 400 एमएलडी तक बढ़ाया जा सकता है, और इसकी अनुमानित लागत ₹11,166 करोड़ है।
  • जुलाई 2026 में यह भी स्पष्ट हुआ कि मुंबई में पानी की कमी लगभग 565 एमएलडी है, और यह प्लांट अगले चार वर्षों में चालू हो जाएगा; साथ ही पानी का शुल्क लगभग 17 पैसे प्रति लीटर बढ़ सकता है।
  • इसके साथ ही मनोरी प्लांट को शहर के मौजूदा जल वितरण नेटवर्क से जोड़ने के लिए 7.2 किलोमीटर लंबा भूमिगत सुरंग बनाने की योजना है, जिसकी लागत लगभग ₹2,241.3 करोड़ है और यह कुल परियोजना लागत का आधा हिस्सा है; निर्माण अगले महीने शुरू होगा और इसे 45 महीनों में पूरा करने का लक्ष्य है।
  1. लक्षद्वीप (OTEC और LTTD तकनीकें) : लक्षद्वीप में एक अनूठा प्रयोग चल रहा है, जहाँ समुद्र की सतह और गहरे पानी के बीच तापमान के अंतर (Ocean Thermal Energy Conversion – OTEC) का उपयोग करके बिजली और पीने योग्य पानी दोनों उत्पन्न किए जा रहे हैं।
  • मार्च 2026 में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कवरत्ती में इस OTEC-आधारित डीसैलिनेशन सुविधा का निरीक्षण किया। यह संयंत्र लगभग 1 लाख लीटर पीने का पानी प्रतिदिन और 60 किलोवाट बिजली उत्पादन करेगा, जो पूरी तरह से प्लांट को चलाने के लिए पर्याप्त होगा।
  • साथ ही, लघु तापीय डीसैलिनेशन (Low Temperature Thermal Desalination – LTTD) तकनीक पर आधारित कई प्लांट पहले से ही लक्षद्वीप के आठ द्वीपों जैसे कवरत्ती, मिनिकॉय, अगत्ती आदि में काम कर रहे हैं। इन्हें नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी (NIOT) संचालित कर रहा है।
  1. चेन्नई और अन्य तटीय क्षेत्र : चेन्नई में पहले से ही कई डीसैलिनेशन प्लांट कार्यरत हैं। मिनजूर (100 एमएलडी), नेम्मेली (100+150 एमएलडी), और निर्माणाधीन पेरूर (400 एमएलडी) प्लांट मिलकर सूखे दिनों में शहर की 40% से अधिक पानी की आवश्यकता पूरी करते हैं।

इसके अलावा, बीएआरसी, बीएचईएल, एनपीसीआईएल जैसी संस्थाओं ने छोटे स्तर पर एसडब्ल्यूआरओ (Sea Water Reverse Osmosis) तकनीक पर आधारित प्लांट विकसित किए हैं—जैसे कलपक्कम, कुदनकुलम आदि में।

दुनिया भर में प्रयोग और चुनौतियाँ

  • वैश्विक स्तर पर लगभग 20,000 से अधिक डीसैलिनेशन प्लांट कार्यरत हैं, जो प्रतिदिन 95 मिलियन क्यूबिक मीटर ताजा पानी प्रदान करते हैं और 300 मिलियन से अधिक लोगों को सेवा देते हैं।
  • मध्य पूर्व के कई देश जैसे कुवैत, ओमान और सऊदी अरब अपनी पीने के पानी की 70–90% आवश्यकता डीसैलिनेशन से पूरी करते हैं।
  • हालांकि, यह प्रक्रिया ऊर्जा-गहन है और पर्यावरण पर प्रभाव डालती है- जैसे ब्राइन (नमकीन पानी) का समुद्र में वापस छोड़ा जाना, जिससे समुद्री जीवन को नुकसान हो सकता है।
  • ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन भी बड़ी चिंता हैं- 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, डीसैलिनेशन उद्योग वार्षिक 500–850 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जित करता है, जो वैश्विक विमानन उद्योग के बराबर है।

क्या यह समाधान व्यवहार्य है?

समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाना संभव है और कई स्थानों पर यह काम कर रहा है। भारत में मुंबई, लक्षद्वीप और चेन्नई जैसे स्थानों पर यह तकनीक लागू हो रही है। लेकिन चुनौतियाँ भी हैं- ऊर्जा की लागत, पर्यावरणीय प्रभाव और आर्थिक व्यवहार्यता। इनसे निपटने के लिए ऊर्जा-कुशल तकनीकों (जैसे OTEC), ब्राइन प्रबंधन और शोध-आधारित सुधारों की आवश्यकता है। साथ ही, जल संरक्षण और पुनर्चक्रण (recycling) को प्राथमिकता देना भी जरूरी है, क्योंकि वे कम ऊर्जा में अधिक पानी उपलब्ध कराते हैं।

क्या है आगे का रास्ता?

मुंबई का मनोरी प्लांट अगले चार वर्षों में चालू होने की उम्मीद है, जो शहर की जल सुरक्षा में बड़ा बदलाव ला सकता है। लक्षद्वीप का OTEC मॉडल भी एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि कैसे ऊर्जा और पानी दोनों को एक साथ प्राप्त किया जा सकता है। देश के अन्य तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में इन तकनीकों को अपनाने से जल संकट से निपटने में मदद मिलेगी। लेकिन यह तभी संभव है जब तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा जाए।

समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसे समझदारी, शोध और सतत प्रयास से ही सफल बनाया जा सकता है।