
दुनिया भर में हरित क्रांति की सफलता के लिए पहचाने जाने वाले पंजाब की यह भी एक विडंबना है कि देश के सबसे उपजाऊ राज्यों में शामिल होने के बावजूद यहां प्राकृतिक जंगल बेहद कम बचे हैं। पंजाब का अधिकांश भूभाग आज खेतों, बस्तियों और सड़क नेटवर्क से घिरा है। यही वजह है कि राज्य का वन क्षेत्र राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी कम है।
हाल ही में विधानसभा में पेश की गई पंजाब CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority) वार्षिक रिपोर्ट 2022-23 के अनुसार, 50,362 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले पंजाब में केवल 1,846.09 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही वन आवरण के अंतर्गत है। यानी राज्य का मात्र 3.67% भूभाग ही जंगलों से ढका है। यह भारत के औसत वन आवरण (करीब 21-22%) से बहुत कम है।
पंजाब के कुल वन क्षेत्र का लगभग 63 प्रतिशत हिस्सा केवल तीन शिवालिक जिलों होशियारपुर, रूपनगर (रोपड़) और पठानकोट में केंद्रित है। इन जिलों की पहाड़ी भौगोलिक संरचना और अपेक्षाकृत कम कृषि विस्तार के कारण यहां प्राकृतिक वन अब भी सुरक्षित हैं। राज्य के मैदानी जिलों में जंगल लगभग समाप्त हो चुके हैं, और वहां हरियाली का बड़ा हिस्सा खेतों या सड़क किनारे लगाए गए पेड़ों तक ही सीमित है।
हरित क्रांति ने बढ़ाया खेती का विस्तार: 1960 और 1970 के दशक में हरित क्रांति ने पंजाब को देश का अन्न भंडार बना दिया। गेहूं और धान की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर भूमि को खेती के दायरे में लाया गया। कई स्थानों पर प्राकृतिक वन और झाड़ियां कृषि भूमि में बदल गईं। आज पंजाब के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खेती में उपयोग होता है, जिससे प्राकृतिक जंगलों के विस्तार की गुंजाइश बेहद सीमित रह गई है।
मैदानी क्षेत्र होने से कृषि को शुरू से तवज्जो: पंजाब का अधिकांश हिस्सा समतल इंडो-गंगा मैदान का भाग है। ऐसे क्षेत्रों में सदियों से कृषि गतिविधियां होती रही हैं। इसके विपरीत, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड या पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय और दुर्गम इलाके प्राकृतिक वनों को बचाए रखने में सहायक रहे हैं।
शहरीकरण और विकास परियोजनाओं ने वनों का किया नाश: राज्य में सड़क, औद्योगिक कॉरिडोर, रेलवे, आवासीय कॉलोनियों और अन्य आधारभूत ढांचे के विस्तार ने भी वन क्षेत्र पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि वन भूमि के बदले प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) किया जाता है, लेकिन प्राकृतिक जंगलों की जैव विविधता और पारिस्थितिकी को कृत्रिम पौधारोपण पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।
ब्रिटिश काल में भी विकास का उठाना पड़ा खामियाजा: विशेषज्ञों के अनुसार, पंजाब के मैदानी इलाकों में सदियों से हुए कृषि विस्तार, बढ़ती आबादी और सिंचाई नेटवर्क के विकास ने जंगलों को लगातार कम किया है। औपनिवेशिक काल में भी रेलवे, निर्माण और कृषि विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई। इसके बाद हरित क्रांति ने भूमि उपयोग में और बड़ा बदलाव ला दिया।
भारत का कुल वन आवरण देश के लगभग 21-22 प्रतिशत क्षेत्र में फैला है, जबकि राष्ट्रीय वन नीति का दीर्घकालिक लक्ष्य 33 प्रतिशत भूभाग पर वन एवं वृक्ष आवरण का है। इसके मुकाबले पंजाब का 3.67 प्रतिशत वन क्षेत्र देश में सबसे कम वन आवरण वाले राज्यों में शामिल है।
कम वन क्षेत्र का असर केवल हरियाली तक नहीं है सीमित
पंजाब पहले से ही भूजल दोहन, पराली जलाने और बढ़ते तापमान जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में सीमित वन क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और गंभीर बना सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल पौधे लगाने से वन नहीं बन जाते। प्राकृतिक जंगल बनने में कई दशक लगते हैं। सफल वनीकरण के लिए स्थानीय प्रजातियों का चयन, पौधों की देखभाल, चराई पर नियंत्रण और समुदाय की भागीदारी जरूरी होती है।
राज्य सरकार CAMPA फंड के जरिए प्रतिपूरक वनीकरण, सड़क किनारे पौधारोपण और वन विकास कार्यक्रम चला रही है। हाल के वर्षों में "ग्रीनिंग पंजाब मिशन" के तहत प्रकृति पार्क और हरित क्षेत्र विकसित करने की पहल भी की गई है।
होशियारपुर, रूपनगर और पठानकोट केवल पंजाब के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों के जंगल:
इसी कारण इन्हें पंजाब का 'ग्रीन बफर' भी कहा जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब में बड़े प्राकृतिक जंगल विकसित करना आसान नहीं होगा, क्योंकि अधिकांश भूमि पहले से ही कृषि उपयोग में है। फिर भी कई उपाय प्रभावी हो सकते हैं:-
पंजाब की पहचान खेतों से है, लेकिन स्वस्थ पर्यावरण के लिए केवल खेती पर्याप्त नहीं होती। जंगल जल, मिट्टी, जैव विविधता और जलवायु संतुलन की आधारशिला हैं। आज जब राज्य का केवल 3.67 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र के रूप में बचा है, और उसका अधिकांश भाग केवल तीन शिवालिक जिलों में सिमटा हुआ है, तब हरियाली बढ़ाना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि कृषि, जल सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा विकास का प्रश्न भी है। यदि खेती और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाले वर्षों में पंजाब को जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के संकट का और गंभीर सामना करना पड़ सकता है।