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भारत में हर घंटे 24 लोग लापता, “गुमशुदा की तलाश…” ये महज पोस्टर नहीं, इसके पीछे हैं कई गंभीर राज

क्या आप जानते हैं कि भारत में हर घंटे औसतन 24 लोग लापता हो रहे हैं? यह सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि एक गंभीर संकट है जो हर नागरिक को चिंतित कर सकता है। आइए जानें इसके पीछे की सच्चाई!
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 07, 2026

Missing Persons in India

प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT

अक्सर रेलवे स्टेशन, बस अड्डों या बाजार या फिर अखबारों के पन्नों पर "गुमशुदा की तलाश…" वाले पोस्टर दिख जाते हैं। ये दरअसल, एकाध घटना नहीं है। आंकड़े बता रहे हैं कि देश में हर घंटे 24 लोग लापता होते हैं।

भारत में लापता व्यक्तियों की संख्या में लगातार वृद्धि चिंता का विषय बनी हुई है। हालिया आंकड़े और मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हैं। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि यह समस्या क्यों बढ़ रही है, इसमें कौन-कौन से कारक योगदान दे रहे हैं, और इससे आम नागरिकों को क्या सीख मिलती है।

लापता लोगों के आंकड़े

2024 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल 5,20,164 लोग लापता हुए - जिसमें 1,67,414 पुरुष, 3,52,729 महिलाएं और 21 ट्रांसजेंडर शामिल हैं। यह संख्या 2023 की तुलना में 7.3 प्रतिशत अधिक है, जबकि बच्चों के मामलों में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।

दिल्ली में जनवरी 2026 के करीब पंद्रह से बीस दिनों में 807 लोग लापता हुए - जिनमें 509 महिलाएं और लड़कियां तथा 191 नाबालिग शामिल हैं। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि यह कोई असामान्य वृद्धि नहीं है और कुल मिलाकर मामलों की संख्या पिछले वर्षों के औसत के आसपास ही बनी हुई है।

इन राज्यों में अधिक मामले

एनएचआरसी ने बिहार, ओडिशा, तेलंगाना, महाराष्ट्र और राजस्थान में मानव तस्करी और लापता मामलों की बढ़ती संख्या पर संज्ञान लेते हुए इन राज्यों के मुख्य सचिवों और डीजीपी को दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।

लापता व्यक्तियों की संख्या बढ़ने के पीछे के कारण

समाजशास्त्रीय और प्रशासनिक दोनों तरह के कारण इस समस्या को बढ़ा रहे हैं:

  • मानव तस्करी और शोषण: एनएचआरसी ने बताया है कि कई लापता बच्चों को जबरन भिक्षावृत्ति, बाल श्रम, वेश्यावृत्ति जैसी अवैध गतिविधियों में धकेला जा रहा है।
  • सामाजिक-आर्थिक दबाव: तमिलनाडु के एफआईआर और जिला अपराध रिकॉर्ड के विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ लोग अकादमिक असफलता या पारिवारिक दबाव से बचने के लिए घर छोड़ देते हैं, जबकि अन्य बड़े मेलों या धार्मिक आयोजनों में बिछड़ जाते हैं।
  • शहरी प्रवासन और पहचान की कमी: कई लोग बेहतर रोजगार की तलाश में गांव से शहर आते हैं। पहचान पत्र न होने के कारण, यदि वे लापता हो जाते हैं या उनकी मृत्यु हो जाती है, तो उन्हें पहचानना मुश्किल हो जाता है।
  • पुलिस-प्रणाली में कमियां: पुलिस-जनसंख्या अनुपात कम होने, रिपोर्ट दर्ज करने में देरी, और कुछ मामलों में रिपोर्ट दर्ज न करने जैसी चुनौतियां भी इस समस्या को बढ़ाती हैं।
  • डेटा की असंगति और रिपोर्टिंग में अंतर: कई मामलों में लोग खोजे जाने के बाद भी रिपोर्ट में शामिल बने रहते हैं, जिससे आंकड़े बढ़े हुए दिखते हैं।

क्या हो रहा है सुधार के लिए

  • एनएचआरसी की कार्रवाई: पांच राज्यों को रिपोर्ट देने का निर्देश और NCRB से नवीनतम आंकड़े मांगना, इस समस्या को गंभीरता से लेने का संकेत है।
  • गुजरात का “ऑपरेशन मिलाप”: मई 2026 में शुरू हुए इस अभियान में पुलिस ने 1,470 लापता व्यक्तियों को उनके परिवारों से मिलाया, जिसमें विशेष रूप से किशोर लड़कियों के मामलों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
  • तकनीकी पहल: AIIMS और ICMR की पहल UMID पोर्टल और DNA डेटाबेस से अज्ञात शवों की पहचान में मदद मिल रही है, जिससे लापता मामलों की जांच में तेजी आ सकती है।

यह समस्या केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है - यह हर परिवार, हर समुदाय को प्रभावित कर सकती है। यदि कोई लापता होता है, तो तुरंत पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना, पहचान पत्र सुरक्षित रखना और स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

इसके अलावा, सरकार और पुलिस को चाहिए कि वे:

  • रिपोर्ट दर्ज करने में पारदर्शिता और तेजी लाएं।
  • तकनीकी साधनों जैसे DNA डेटाबेस, मोबाइल ट्रैकिंग और सोशल मीडिया मॉनिटरिंग का उपयोग बढ़ाएं।
  • मानव तस्करी और बाल शोषण के खिलाफ जागरूकता अभियानों को मजबूत करें।

एनएचआरसी की रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि राज्यों ने क्या उपाय किए हैं। साथ ही, NCRB की अगली ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट में 2025–26 के आंकड़े आने पर यह समझना आसान होगा कि क्या सुधार हो रहा है या नहीं।

यह समस्या केवल सरकार की नहीं है - यह समाज की भी जिम्मेदारी है। हर नागरिक को सतर्क रहना होगा, लापता मामलों में सहयोग करना होगा, और बच्चों व महिलाओं की सुरक्षा के लिए मिलकर काम करना होगा।