
देश में एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, डिफेंस कॉरिडोर, एयरपोर्ट, रेलवे लाइन और नई टाउनशिप जैसी परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में जमीन की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सरकार किसानों की जमीन का अधिग्रहण करती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही रहता है। किसान को जमीन के बदले कितना मुआवजा मिलेगा, और यह राशि तय कैसे होती है? ज्यादातर लोग समझते हैं कि सरकार सिर्फ सर्किल रेट के हिसाब से भुगतान कर देती है, जबकि असल प्रक्रिया इससे कहीं अधिक विस्तृत और किसान के पक्ष में झुकी हुई है।
जब किसी सार्वजनिक उद्देश्य या सरकारी परियोजना जैसे एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, रेलवे, औद्योगिक कॉरिडोर, बिजली या सिंचाई परियोजना के लिए निजी जमीन की जरूरत होती है, तो सरकार कानून के तहत उसका अधिग्रहण करती है और बदले में भूमि स्वामी को मुआवजा देती है।
यह पूरी प्रक्रिया भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (LARR Act, 2013) के तहत संचालित होती है, जो 26 सितंबर 2013 को अधिनियमित हुआ था। इस कानून का मकसद सिर्फ जमीन लेना नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों को मानवीय, पारदर्शी और सहभागी प्रक्रिया के जरिए उचित मुआवजा व पुनर्वास देना है।
मुआवजे की गणना तीन हिस्सों में होती है: पहले जमीन का बाजार मूल्य तय होता है, फिर उस पर एक गुणक (multiplier) लगता है, और आखिर में 100% सोलैटियम जोड़ा जाता है।
जमीन का बाजार मूल्य तय करने के लिए तीन आधार देखे जाते हैं, और जो भी आधार किसान के लिए ज्यादा फायदेमंद हो, उसे चुना जा सकता है:
ध्यान रहे, सर्किल रेट को अक्सर जमीन का असली बाजार मूल्य मान लिया जाता है, जबकि हकीकत में कई इलाकों में असली बाजार मूल्य सर्किल रेट से काफी ज्यादा होता है। इसलिए कानून इन तीनों में से सबसे उपयुक्त मूल्य को आधार बनाने की छूट देता है।
बाजार मूल्य तय होने के बाद उस पर एक गुणक लगाया जाता है, जिसे राज्य सरकार शहर से दूरी के आधार पर अधिसूचित करती है:
गुणक लगने के बाद जो राशि बनती है, उस पर कानून 100% सोलैटियम जोड़ता है — यानी उतनी ही अतिरिक्त राशि और मिलती है। यह इसलिए दिया जाता है क्योंकि किसान अपनी इच्छा से जमीन नहीं बेच रहा होता, बल्कि सरकार की जरूरत के चलते उसे जमीन छोड़नी पड़ती है।
गुणक और सोलैटियम को मिलाकर देखें तो व्यावहारिक असर यह होता है:
यही वजह है कि एक्सप्रेसवे या औद्योगिक परियोजनाओं में किसानों को सर्किल रेट से कई गुना अधिक भुगतान मिलता दिखता है यह कोई अतिरिक्त कृपा नहीं, बल्कि कानून की तय गणना का नतीजा है।
उदाहरण से समझें: मान लीजिए किसी ग्रामीण इलाके में जमीन का तय बाजार मूल्य ₹20 लाख है और वहां गुणक 2 लागू होता है। तो पहले यह राशि ₹40 लाख होगी (20 लाख × 2)। इसके बाद 100% सोलैटियम जुड़ने पर अंतिम मुआवजा ₹80 लाख तक पहुंच सकता है यानी मूल बाजार मूल्य का चार गुना।
नहीं। मुआवजे में जमीन पर मौजूद अन्य परिसंपत्तियों का मूल्य भी अलग से जुड़ता है, जैसे- पेड़, मकान, कृषि संरचनाएं (शेड, गोदाम), बोरवेल, खड़ी फसल इत्यादि। इन सबका आकलन अलग-अलग किया जाता है और अंतिम मुआवजे में जोड़ा जाता है।
अगर किसान को लगे कि उसकी जमीन का मूल्य कम आंका गया है, तो वह यह उपाय कर सकता है। पहले सक्षम प्राधिकारी के सामने आपत्ति दर्ज कराए। फिर LARR प्राधिकरण के समक्ष मुआवजा निर्धारण को चुनौती दे। अंत में जरूरत पड़ने पर न्यायालय का रुख करे।