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वह क्रांतिकारी जिसकी लाश तक से डर गए थे अंग्रेज, पत्थरों से बांधकर समुद्र में फेंका

Mahavir Singh Rathore : अंडमान की सेल्युलर जेल में जबरन फोर्स-फीडिंग के कारण शहीद होने वाले महान क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर की अमर गाथा, जिनके शव से डरकर अंग्रेजों ने उसे पत्थरों से बांधकर समुद्र में फेंक दिया था।
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Aug 11, 2026
1857 Revolt
1857 Revolt : क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर।

साल 1933। हिंद महासागर के बीचों-बीच बसी अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल। चारों तरफ ऊंची दीवारें, लोहे की सलाखें और ऐसा सन्नाटा, जिसमें कैदियों की चीखें भी दब जाती थीं। अंग्रेजों ने इस जेल को सिर्फ कैदखाना नहीं, बल्कि भारतीय क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ने की फैक्ट्री बना रखा था। लेकिन उसी जेल में एक युवा क्रांतिकारी ऐसा भी था, जिसने तय कर लिया था कि शरीर टूट सकता है, आत्मा नहीं। उस युवा का नाम था महावीर सिंह राठौर।

आज जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का जिक्र होता है, तब महावीर सिंह का नाम अक्सर पीछे छूट जाता है। लेकिन सच यह है कि वह उन चुनिंदा क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने आजादी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। इतना ही नहीं, उनकी मौत के बाद भी अंग्रेज उनकी शहादत से इतने भयभीत थे कि उनके शव को परिवार तक पहुंचाने की हिम्मत नहीं जुटा सके।

एटा के एक गांव से शुरू हुई कहानी

16 सितंबर 1904 को उत्तर प्रदेश के एटा जिले के शाहपुर टहला गांव में महावीर सिंह का जन्म हुआ। उनके पिता कुंवर देवी सिंह राजवैध थे। घर में राष्ट्रभक्ति का माहौल था और देश में भी स्वतंत्रता आंदोलन की लहर धीरे-धीरे तेज हो रही थी।

महावीर सिंह बचपन से ही तेज, साहसी और स्वाभिमानी थे। जैसे-जैसे बड़े हुए, अंग्रेजी शासन के अत्याचारों की खबरें उनके भीतर आग पैदा करने लगीं। उस समय देश के दो रास्ते दिखाई देते थे- एक संवैधानिक आंदोलन का और दूसरा क्रांतिकारी संघर्ष का।महावीर सिंह ने दूसरा रास्ता चुना।

1927 में वह लाहौर पहुंचे। यह वही दौर था जब पंजाब क्रांतिकारी गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन चुका था। यहां उनकी मुलाकात उन युवाओं से हुई जो भारत को केवल आजाद ही नहीं, बल्कि एक नए और न्यायपूर्ण राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। यहीं से उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया।

जब भगत सिंह और आजाद के साथी बने

महावीर सिंह जल्द ही हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़ गए। यह वही संगठन था जिसमें चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारी सक्रिय थे। संगठन में उनकी पहचान एक ऐसे साथी की थी जिस पर आंख बंद करके भरोसा किया जा सकता था।

एक घटना इसका उदाहरण भी है। जब अंग्रेज पुलिस भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की तलाश में लगी हुई थी, तब महावीर सिंह ने उन्हें लाहौर के मोजांग हाउस से सुरक्षित निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसे कई गुप्त अभियानों में वह संगठन की रीढ़ बने रहे। वे भाषण देने वाले क्रांतिकारी नहीं थे। वे काम करने वाले क्रांतिकारी थे।

अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे महावीर

1928 में लाला लाजपत राय की मौत के बाद सांडर्स हत्याकांड हुआ। फिर 1929 में केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका गया। इन घटनाओं ने अंग्रेजी सरकार को हिला दिया। अब अंग्रेज क्रांतिकारी नेटवर्क को तोड़ने में जुट गए। गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ और महावीर सिंह भी इसकी चपेट में आ गए। उन्हें उनके घर से गिरफ्तार किया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में सह-आरोपी बनाया गया। अदालत में जब मुकदमा चला, तब अंग्रेज उम्मीद कर रहे थे कि आरोपी अपनी सफाई देंगे या दया की गुहार लगाएंगे। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा।

महावीर सिंह और उनके साथियों ने साफ कहा कि वे अंग्रेजों की अदालत को ही वैध नहीं मानते। उनका कहना था कि जो शासन भारत पर जबरन कब्जा करके बैठा है, उसके न्याय से उन्हें कोई उम्मीद नहीं। यह सिर्फ मुकदमा नहीं था, यह अदालत के भीतर चल रही एक राजनीतिक लड़ाई थी।

उम्रकैद की सजा और कालापानी का रास्ता

1930 में अदालत ने महावीर सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। पहले उन्हें मुल्तान सेंट्रल जेल भेजा गया। फिर बेल्लारी सेंट्रल जेल। लेकिन अंग्रेजों को लगता था कि ऐसे क्रांतिकारी जेलों में भी आंदोलन खड़ा कर सकते हैं। इसलिए जनवरी 1933 में उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया। उस समय कालापानी की सजा को लगभग मौत के बराबर माना जाता था।

सेल्युलर जेल में राजनीतिक कैदियों के साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया जाता था। सड़ा-गला खाना, गंदे कपड़े, कठिन श्रम और लगातार अपमान यह सब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।

लेकिन महावीर सिंह जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ी यातना यह थी कि उन्हें अपराधियों की तरह रखा जा रहा था, जबकि वे खुद को देशभक्त मानते थे।

जब कैदियों ने अंग्रेजों को चुनौती दी

12 मई 1933 को अंडमान की सेल्युलर जेल में एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया। राजनीतिक कैदियों ने सामूहिक भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनकी मांगें बहुत साधारण थीं, मानवीय व्यवहार, बेहतर भोजन और राजनीतिक कैदी का दर्जा। लेकिन अंग्रेजों के लिए यह विद्रोह था। दिन बीतते गए। कैदी खाना खाने से इनकार करते रहे। जेल प्रशासन परेशान होने लगा। उन्हें डर था कि अगर कोई कैदी भूख हड़ताल में मर गया तो पूरे देश में आक्रोश फैल जाएगा। तब अंग्रेज अधिकारियों ने एक क्रूर तरीका अपनाया, 'फोर्स-फीडिंग', यानी जबरन दूध पिलाना।

वह दिन जिसने महावीर सिंह को अमर कर दिया

17 मई 1933। भूख हड़ताल का छठा दिन। महावीर सिंह को पकड़कर जमीन पर लिटाया गया। कई सिपाही उन्हें दबाए हुए थे। एक डॉक्टर ने उनके सीने पर घुटना रखा और नाक के जरिए रबर की नली डालनी शुरू की। महावीर सिंह विरोध करते रहे। लेकिन अंग्रेजों ने उनकी एक नहीं सुनी। फिर एक भयानक गलती हुई। नली पेट तक पहुंचने के बजाय फेफड़ों में चली गई। इसके बाद करीब एक लीटर दूध उनके फेफड़ों में चला गया। कुछ ही देर में उनकी सांसें उखड़ने लगीं। और देखते ही देखते 28 वर्षीय वह युवा क्रांतिकारी हमेशा के लिए शांत हो गया। लेकिन उसकी शहादत अभी खत्म नहीं हुई थी।

मौत के बाद भी अंग्रेज डरते रहे

अंग्रेज जानते थे कि यदि महावीर सिंह का शव परिवार को सौंप दिया गया तो वह एक राष्ट्रीय प्रतीक बन जाएंगे। इसलिए उन्होंने वह किया, जिसे इतिहास आज भी शर्मनाक मानता है। बताया जाता है कि उनके शव को पत्थरों से बांधा गया और समुद्र में फेंक दिया गया, ताकि कोई अंतिम संस्कार न हो सके और कोई जनआंदोलन न खड़ा हो। लेकिन अंग्रेज यह नहीं समझ पाए कि विचारों को समुद्र में नहीं डुबोया जा सकता। महावीर सिंह की शहादत की खबर पूरे देश में फैल गई। क्रांतिकारियों के बीच उनका नाम सम्मान और प्रेरणा का प्रतीक बन गया।

एक ऐसी कहानी जिसे भुलाया नहीं जाना चाहिए

महावीर सिंह ने न कोई चुनाव लड़ा, न कोई बड़ा पद संभाला, न ही उनके नाम पर बड़े-बड़े स्मारक बने। लेकिन उन्होंने वह किया जो हर कोई नहीं कर सकता। उन्होंने अदालत के सामने झुकने से इनकार किया। उन्होंने जेल की यातनाओं के सामने झुकने से इनकार किया। उन्होंने भूख के सामने झुकने से इनकार किया और आखिर में उन्होंने मौत के सामने भी झुकने से इनकार कर दिया।

एक नजर में समझें पूरा परिचय

🏷️ तथ्य📖 जानकारी
👤 नाममहावीर सिंह राठौर
🎂 जन्म16 सितंबर 1904
📍 जन्मस्थानशाहपुर टहला, एटा (उत्तर प्रदेश)
🚩 संगठनहिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)
🤝 प्रमुख सहयोगीभगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त
⚖️ प्रमुख मामलालाहौर षड्यंत्र केस (1929 गिरफ्तारी)
⛓️ सजाआजीवन कारावास, मुल्तान और बेल्लारी जेल के बाद अंडमान भेजे गए
संघर्षसेल्युलर जेल में सामूहिक भूख हड़ताल (12 मई 1933)
🕯️ शहादत17 मई 1933, सेल्युलर जेल, अंडमान
⚠️ मृत्यु का कारणजबरन दूध पिलाने के दौरान नली फेफड़ों में चली गई
ऐतिहासिक महत्वक्रांतिकारी आंदोलन के गुमनाम शहीदों में प्रमुख नाम
Updated on:
11 Aug 2026 11:00 am
Published on:
11 Aug 2026 11:00 am