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महिला खिलाड़ियों के हर मेडल के पीछे बदलती सोच की कहानी, जानिए कैसे आगे बढ़ रहीं बेटियां

क्या आपने सोचा है कि खेलों में लिंग समानता का क्या असर हो सकता है? अब गांव की लड़कियाँ भी मेडल जीतने की दौड़ में शामिल हो रही हैं! जानिए, कैसे एक पहल बदल रही है खेलों की दुनिया!
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Aug 01, 2026
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प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT

खेल जगत में महिला एथलीटों की उपस्थिति अब सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि बदलाव की दिशा में एक ठोस कदम बन चुकी है। हाल ही में केंद्र सरकार की ‘अस्मिता’ पहल ने इस बदलाव को और गति दी है, जिससे ग्रामीण और छोटे शहरों की लड़कियों को खेलों में आने का मौका मिल रहा है।

अस्मिता कार्यक्रम क्या है और क्यों मायने रखता है

‘खेलो इंडिया’ मिशन के तहत 2021 में शुरू हुई अस्मिता (Achieving Sports Milestone by Inspiring Women Through Action) पहल का उद्देश्य महिला खिलाड़ियों की भागीदारी बढ़ाना और नई प्रतिभाओं की पहचान करना है।

मार्च 2026 में, अस्मिता के तहत 250 स्थानों पर अंडर-13, 13–18 और 18+ आयु वर्गों में राष्ट्रीय स्तर की एथलेटिक्स लीग आयोजित की गई, जिससे ग्रामीण और छोटे शहरों की लड़कियों को खेलों में आने का मंच मिला।

सरकार की दृष्टि और आगे की राह

खेल मंत्रालय की यह पहल ‘विकसित भारत 2047’ के विजन से जुड़ी है, जिसमें लिंग-तटस्थता को खेलों में एक अहम लक्ष्य माना गया है। प्रधानमंत्री ने भी इस पहल को साझा करते हुए इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

महिला एथलीटों की दृश्यता और चुनौतियाँ

महिला खिलाड़ी अब पहले से कहीं अधिक दिख रही हैं। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत रही हैं, रिकॉर्ड बना रही हैं और राष्ट्रीय गौरव का हिस्सा बन रही हैं। लेकिन सिर्फ दृश्यता ही काफी नहीं है। सामाजिक अपेक्षाएँ, सुरक्षा, परिवार की चिंता और संस्थागत असमानताएँ अभी भी उनके रास्ते में बड़ी बाधाएँ हैं।

संरचनात्मक और सांस्कृतिक बाधाएँ

2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में आर्थिक बाधाएँ, खेल संरचना की कमी, करियर के अवसरों की कमी, और सामाजिक-सांस्कृतिक अवरोधों को महिला खिलाड़ियों की भागीदारी में मुख्य बाधाएँ बताया गया है। इसी तरह, एक अन्य शोध में कहा गया है कि संरचनात्मक अन्याय, मीडिया में कम दिखना, और प्रायोजन की कमी जैसी समस्याएँ महिला खिलाड़ियों को पूरी क्षमता तक पहुंचने से रोकती हैं।

सुरक्षा और संरक्षण की ज़रूरत

महिला एथलीटों के खिलाफ शारीरिक, मानसिक, लैंगिक और साइबर उत्पीड़न की घटनाएँ अभी भी आम हैं। हालिया शोध में पाया गया है कि भारत में कानूनी सुरक्षा मौजूद होने के बावजूद, कार्यान्वयन में कमी, रिपोर्टिंग की हिचक और संस्थागत शक्ति असंतुलन सुरक्षा को कमजोर बनाते हैं। इस शोध में पारदर्शी रिपोर्टिंग, शिक्षा, स्वतंत्र निगरानी और संगठनात्मक जिम्मेदारी जैसे उपाय सुझाए गए हैं।

न्यायिक और कानूनी दृष्टिकोण

एक हालिया शोध (अप्रैल 2026) ने यह दर्शाया है कि भारत में लैंगिक पहचान को संविधान के तहत समान अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन खेल प्रशासन में यह अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हुआ है। इसमें ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी खिलाड़ियों की स्थिति, और न्यायपालिका की भूमिका पर भी चर्चा की गई है।

महिला एथलीटों के लिए क्या मायने रखता है

यह बदलाव सिर्फ खेल तक सीमित नहीं है। जब लड़कियाँ खेलों में आती हैं, तो वे आत्मविश्वास, नेतृत्व और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में कदम बढ़ाती हैं। वैश्विक स्तर पर भी यह माना जाता है कि खेल महिलाओं को नेतृत्व और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आगे ले जाता है।

आगे की राह: क्या करना चाहिए

सरकार, खेल संस्थान, मीडिया और समाज—सभी को मिलकर काम करना होगा। अस्मिता जैसी पहलें एक अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन उन्हें व्यापक आधार पर लागू करना होगा। सुरक्षा और संरक्षण के लिए मजबूत तंत्र, मीडिया में समान कवरेज, प्रायोजन में पारदर्शिता और खेल संरचना में सुधार जरूरी है। साथ ही, ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी खिलाड़ियों को भी शामिल करने के लिए नीतिगत बदलाव की आवश्यकता है।

खेलों में लिंग समानता सिर्फ एक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है—जहाँ हर कदम मायने रखता है। महिला एथलीटों की बढ़ती भूमिका इस दिशा में एक मजबूत संकेत है।

Updated on:
01 Aug 2026 01:26 pm
Published on:
01 Aug 2026 01:17 pm