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कोयला घोटाले की पूरी कहानी, CAG रिपोर्ट से शुरू हुआ विवाद, अब मनमोहन सिंह को मिली क्लीन चिट

Manmohan Singh coal scam clean chit : कोयला घोटाले से जुड़े तालाबीरा-II मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, कुमार मंगलम बिड़ला और पीसी पारेख को दी बड़ी राहत। जानें 2015 के समन रद्द होने और पूरे मामले की पूरी कहानी।
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Jul 29, 2026
Manmohan Singh coal scam clean chit
Manmohan Singh coal scam clean chit : निधन के 19 महीने बाद नममोहन सिंह को मिली कोयला घोटाले मामले में क्लीन चिट।

भारत की राजनीति में 'कोयला घोटाला' के नाम से चर्चित कोयला ब्लॉक आवंटन मामला एक दशक से अधिक समय तक चर्चा में रहा। यह विवाद इतना बड़ा था कि उस समय की यूपीए सरकार और तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी इसके केंद्र में आ गए थे। अब 29 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़े एक अहम केस में उनके खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी है, जिसके बाद यह मुद्दा फिर सुर्खियों में है। ऐसे में समझना जरूरी है कि यह मामला आखिर था क्या, इसमें कितना नुकसान बताया गया था, मनमोहन सिंह का नाम इसमें क्यों जुड़ा और अब मिली राहत का असली संदर्भ क्या है।

क्या था कोयला घोटाला?

यह मामला 2004 से 2009 के बीच कोयला खदानों (Coal Blocks) के आवंटन से जुड़ा था। उस समय सरकार ने कई सरकारी और निजी कंपनियों को कोयला ब्लॉक आवंटित किए थे। आरोप था कि इन ब्लॉकों का आवंटन प्रतिस्पर्धी नीलामी (Auction) के बजाय एक चयन प्रक्रिया के जरिए किया गया, जिससे कुछ कंपनियों को अनुचित लाभ मिला।

कोयला देश के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक है। इसलिए सवाल उठा कि जब इसकी कीमत इतनी अधिक है तो सरकार ने खुले बाजार में नीलामी कर अधिक राजस्व क्यों नहीं जुटाया।

मामला चर्चा में कैसे आया?

2012 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट सामने आई। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि कोयला ब्लॉकों की नीलामी की जाती, तो सरकार को कहीं अधिक राजस्व मिल सकता था। CAG ने संभावित नुकसान का अनुमान लगभग ₹1.86 लाख करोड़ लगाया था।

यह आंकड़ा सामने आते ही देशभर में राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया। विपक्ष ने इसे स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े घोटालों में से एक बताया और संसद में लगातार हंगामा हुआ।

मनमोहन सिंह का नाम किस केस में जुड़ा?

पूरे कोयला घोटाले में कई अलग-अलग कोयला ब्लॉकों की जांच अलग-अलग केस के तौर पर हुई। मनमोहन सिंह का नाम खासतौर पर एक विशिष्ट मामले से जुड़ा। ओडिशा के तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक के 2005 में हिंडाल्को (आदित्य बिड़ला ग्रुप की कंपनी) को हुए आवंटन से। उस समय कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पास था।

विपक्ष का आरोप था कि मंत्रालय उनके पास होने के कारण आवंटन प्रक्रिया की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर आती है। 2015 में एक विशेष CBI अदालत ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते हुए मनमोहन सिंह के साथ-साथ उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख और कुछ अन्य को भी आरोपी के तौर पर समन जारी किया था। मनमोहन सिंह ने इस समन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद कोर्ट ने उस समन पर रोक लगा दी थी।

शुरुआत से ही मनमोहन सिंह का पक्ष यह था कि सभी फैसले स्थापित प्रक्रिया के तहत लिए गए थे और किसी को अनुचित लाभ पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था।

जांच में क्या हुआ?

मामले की जांच CBI और अन्य एजेंसियों ने की। कई कोयला ब्लॉकों के आवंटन की अलग-अलग जांच हुई। कुछ मामलों में कंपनियों और अधिकारियों के खिलाफ आरोप तय हुए, कुछ मामलों में सजा भी हुई, जबकि कई मामलों में अदालतों ने पर्याप्त सबूत न मिलने पर आरोपियों को बरी कर दिया।

2014 में सुप्रीम कोर्ट ने आवंटन प्रक्रिया को मनमाना बताते हुए 1993 के बाद आवंटित 214 कोयला ब्लॉकों में से 204 का आवंटन रद्द कर दिया था। यह फैसला इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा कानूनी मोड़ माना जाता है।

यह समझना बेहद जरूरी है कि डॉ. मनमोहन सिंह का 26 दिसंबर 2024 को निधन हो चुका है। तालाबीरा-II केस में उनकी अपील तकनीकी रूप से उनके निधन के साथ ही निष्प्रभावी (infructuous) हो चुकी थी। लेकिन उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में यह गुहार लगाई कि भले ही अपील निष्प्रभावी हो गई हो, ट्रायल कोर्ट की उन टिप्पणियों को हटाया जाना चाहिए जिनमें उन्हें आरोपी ठहराया गया था, ताकि उनकी प्रतिष्ठा पर कोई कानूनी दाग न रहे।

अब यह राहत क्यों और कैसे मिली?

29 जुलाई 2026 को चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें जस्टिस ज्योयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना भी शामिल थे, उस बेंच ने 2015 के ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि विशेष जज के पास CBI की क्लोजर रिपोर्ट खारिज करके संज्ञान लेने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं था, क्योंकि जांच एजेंसी की रिपोर्ट स्वीकार करने से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पूर्व सिद्धांत इसका समर्थन नहीं करते।

इसी आधार पर कोर्ट ने CBI की दोनों क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर लीं, अपील को मंजूर किया, पुराना आदेश रद्द किया और मामला पूरी तरह बंद कर दिया। इस फैसले से मनमोहन सिंह के साथ-साथ कुमार मंगलम बिड़ला और पीसी पारेख को भी क्लीन चिट मिल गई।

ध्यान रहे, यह फैसला सिर्फ तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक से जुड़े इस विशिष्ट केस पर लागू होता है, न कि समूचे कोयला घोटाले के हर मामले पर, क्योंकि कोयला घोटाले के तहत कई अलग-अलग कोयला ब्लॉकों के अलग-अलग केस चले थे, जिनमें से कुछ में आज भी कार्यवाही जारी हो सकती है।

कोयला घोटाले का देश पर क्या असर पड़ा?

इस विवाद के बाद प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन को लेकर सरकार की नीतियों में बड़े बदलाव हुए। कोयला ब्लॉकों के आवंटन में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नीलामी व्यवस्था लागू की गई। सरकार ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि भविष्य में कोयला, स्पेक्ट्रम और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन अधिक खुली और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के जरिए हो।

एक नजर में समझें पूरा मामला

❓ सवाल✅ जवाब
कोयला घोटाला क्या था?कोयला ब्लॉकों के आवंटन को लेकर विवाद
यह कब का मामला है?मुख्य रूप से 2004–2009 के बीच
कितना नुकसान बताया गया था?CAG ने ₹1.86 लाख करोड़ के संभावित नुकसान का अनुमान लगाया था
मनमोहन सिंह किस केस से जुड़े थे?ओडिशा के तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक के 2005 में हिंडाल्को को हुए आवंटन से
डॉ. मनमोहन सिंह का निधन कब हुआ?26 दिसंबर 2024
सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?29 जुलाई 2026 को CBI की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर 2015 का समन आदेश रद्द किया
क्लीन चिट किसे मिली?मनमोहन सिंह, कुमार मंगलम बिड़ला, पी.सी. पारेख और अन्य आरोपियों को
सबसे बड़ा असर क्या हुआ?कोयला ब्लॉकों के आवंटन में नीलामी व्यवस्था लागू हुई
Updated on:
29 Jul 2026 05:08 pm
Published on:
29 Jul 2026 05:08 pm