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दस्तकारों की कला कैसे बन रही है आत्मनिर्भरता का आधार, पंचायत और सरपंच की क्या हो सकती है भूमिका?

गांव के दस्तकारों की कहानी सिर्फ कला की नहीं है- यह आज की ग्रामीण समृद्धि और आत्मनिर्भरता की भी कहानी है। जब एक कारीगर अपनी परंपरा को आधुनिक बाजार से जोड़ता है, तो न केवल उसकी कला बचती है, बल्कि उसका परिवार और पूरा गाँव भी आगे बढ़ता है। आइए जानते हैं कि देश के दस्तकारों का जीवन कैसे बदल रहा है?
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जानिए डिजिटल इंडिया मिशन से कैसे बदल रहा है दस्तकारों का जीवन (Photo: ChatGpt)

पिछले कुछ वर्षों में भारत में हस्तशिल्प क्षेत्र ने ग्रामीण रोजगार और आर्थिक विकास में अहम भूमिका निभाई है। 2024–25 की कपड़ा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देश में लगभग 64.66 लाख हैंडलूम और हस्तशिल्प कारीगर हैं, जिनमें करीब 64 प्रतिशत महिलाएँ हैं। यह संख्या बताती है कि यह क्षेत्र सिर्फ कला का नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का भी आधार है।

वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट जैसे प्रयोग हुए सफल

सरकार ने कई योजनाओं के ज़रिए इन कारीगरों को बाजार से जोड़ने की कोशिश की है। मिसाल के तौर पर राष्ट्रीय हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम, अंबेडकर हस्तशिल्प विकास योजना, स्किल इंडिया मिशन, समग्र हस्तशिल्प क्लस्टर विकास योजना और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP)। इन पहलों ने डिज़ाइन नवाचार, कौशल विकास और बाज़ार तक पहुंच में सुधार किया है, जिससे कारीगरों को बेहतर अवसर मिले हैं।

लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। आय में उतार-चढ़ाव, संस्थागत ऋण की कमी, सामाजिक सुरक्षा का अभाव, तकनीकी सीमाएँ और मशीन-निर्मित उत्पादों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा — ये सब ग्रामीण कारीगरों को कमजोर स्थिति में रखती हैं। कई बार कारीगरों को बीच-बीच में काम करने वाले दलालों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे उनकी कमाई और पहचान दोनों प्रभावित होती हैं।

नौ बुनकरों से हुआ था शुरू, अब 600 से अधिक गांवों में पहुंचा

राजस्थान के जयपुर में हाल ही में एक नए रुझान ने दस्तकारों को नई दिशा दी है। जयपुर रग्स, जो 1978 में नौ बुनकरों के साथ शुरू हुआ था, अब 600 से अधिक गाँवों और हजारों कारीगरों को जोड़ता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जब पारंपरिक कला को आधुनिक डिज़ाइन और वैश्विक बाज़ार से जोड़ा जाए, तो उसका असर गाँव-गाँव तक पहुंच सकता है।

'डिज़ाइन नि दुकान' से लुप्त कला रूपों को मिला पुनर्जीवन

इसी तरह, “डिज़ाइन नि दुकान” नामक एक पहल ने दो लुप्तप्राय कला रूपों - बिहार की सुजानी कढ़ाई और तमिलनाडु की पाथमदई पाई, को फिर से जीवित किया है। इन कलाओं को आधुनिक उत्पादों में ढालकर न केवल कला बची है, बल्कि कारीगरों को पहचान और आय भी मिली है।

एक और प्रेरणादायक उदाहरण है - उत्तर प्रदेश के खुरजा ब्लू पॉटरी और गुजरात की साडेली वुड क्राफ्ट। खुरजा के रैसुद्दीन और साडेली के राकेश पेटिगारा जैसे कारीगरों ने राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार पाकर अपनी कला को नई ऊंचाइयां दीं। यह दिखाता है कि जब पारंपरिक कला को सम्मान और मंच मिलता है, तो उसका प्रभाव गहरा होता है।

डिजिटल इंडिया मिशन से बदल रहा दस्तकारों का जीवन

गाँवों में डिजिटल पहुँच भी दस्तकारों के लिए एक बड़ा अवसर बनकर उभरी है। डिजिटल इंडिया मिशन के तहत गाँव-गाँव इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता पहुंचाई जा रही है। इससे कारीगर अपने उत्पादों की तस्वीरें या वीडियो सोशल मीडिया पर डालकर Meesho, Amazon, Flipkart जैसे प्लेटफॉर्म से सीधे जुड़ सकते हैं। इससे दलालों पर निर्भरता कम होती है और कारीगरों की कमाई में सुधार होता है।

लेकिन ग्रामीण दस्तकारों की कहानी सिर्फ योजनाओं और बाज़ार तक पहुंच की नहीं है, बलिक यह उनकी पहचान, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक विरासत की भी कहानी है। जब एक कारीगर अपनी कला को आधुनिक रूप में पेश करता है, तो वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है और साथ ही भविष्य की राह भी बनाता है।

पंचायत और सरपंच की क्या हो सकती है भूमिका?

अगले कदम के रूप में पंचायत और सरपंच इस दिशा में क्या कर सकते हैं? सबसे पहले, स्थानीय हस्तशिल्प को पहचान देने के लिए मेलों और प्रदर्शनियों का आयोजन करें। दूसरे, डिजिटल प्रशिक्षण शिविर लगाकर कारीगरों को ऑनलाइन बिक्री और मार्केटिंग की जानकारी दें। तीसरे, स्थानीय स्तर पर कारीगरों के समूह बनाकर उन्हें सामूहिक रूप से सरकारी योजनाओं और बाजार से जोड़ें।

गाँव के दस्तकारों की परंपरा सिर्फ कलात्मक विरासत नहीं है, यह ग्रामीण समृद्धि और आत्मनिर्भरता का रास्ता है। जब हम उन्हें सही मंच, सही समर्थन और सही पहचान देते हैं, तो वे न केवल अपनी कला बचाते हैं, बल्कि पूरे गाँव की तस्वीर बदल देते हैं।