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मिट्टी की जांच क्यों जरूरी है? जानें मिट्टी परीक्षण कैसे कराएं? खर्च और फायदे

Soil Testing Process In India : मिट्टी की जांच क्यों जरूरी है? जानिए सॉइल हेल्थ कार्ड योजना, मिट्टी परीक्षण कराने का तरीका, नमूना लेने की प्रक्रिया, लगने वाला खर्च और फसलों के लिए इसके फायदे।
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Soil Testing Process In india

Soil Testing Process In india : किसानों के लिए क्यों जरूरी है मिट्टी का परीक्षण, PC- Patrika

किसान अक्सर अच्छी फसल के लिए अधिक खाद और उर्वरक डालते हैं, लेकिन कई बार उत्पादन बढ़ने के बजाय घट जाता है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि खेत की मिट्टी में किस पोषक तत्व की कमी है, इसकी जानकारी किसानों को नहीं होती। ऐसे में जरूरत से ज्यादा या गलत खाद डालने से लागत बढ़ती है और मिट्टी की सेहत भी खराब होती है।

इसी समस्या को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने सॉइल हेल्थ कार्ड (Soil Health Card) योजना शुरू की थी। इसका उद्देश्य किसानों को उनकी मिट्टी की वास्तविक स्थिति बताना और फसल के अनुसार सही मात्रा में खाद व उर्वरक की सलाह देना है। देशभर में अब तक 25 करोड़ से अधिक सॉइल हेल्थ कार्ड जारी किए जा चुके हैं।

मिट्टी की जांच क्या होती है?

मिट्टी परीक्षण एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें खेत की मिट्टी का नमूना लेकर प्रयोगशाला में उसकी जांच की जाती है। इस जांच से पता चलता है कि मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में हैं और किनकी कमी है।

जांच रिपोर्ट के आधार पर किसानों को यह सलाह दी जाती है कि किस फसल के लिए कितनी मात्रा में यूरिया, डीएपी, पोटाश, जिंक या अन्य उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए।

सॉइल हेल्थ कार्ड क्या है?

सॉइल हेल्थ कार्ड एक रिपोर्ट कार्ड की तरह होता है, जिसमें किसान की जमीन की मिट्टी का पूरा ब्योरा दिया जाता है। इसमें मिट्टी के 12 प्रमुख मानकों की जांच की जाती है। इनमें मैक्रो न्यूट्रिएंट्स, नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटाश (K), सल्फर (S), माइक्रो न्यूट्रिएंट्स, जिंक (Zn), आयरन (Fe), कॉपर (Cu), मैंगनीज (Mn), बोरॉन (B), भौतिक एवं रासायनिक मानक, pH (अम्लीय या क्षारीयता), EC (इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी), OC (ऑर्गेनिक कार्बन) शामिल हैं। इन्हीं मानकों के आधार पर फसलवार खाद की सिफारिश की जाती है।

मिट्टी की जांच क्यों जरूरी है?

खाद की सही मात्रा तय होती है : कई किसान अनुमान के आधार पर खाद डालते हैं। इससे या तो खाद कम पड़ जाती है या जरूरत से ज्यादा खर्च हो जाता है। मिट्टी परीक्षण बताता है कि वास्तव में कौन-सा पोषक तत्व कम है और कितनी मात्रा में देना चाहिए।

उत्पादन बढ़ाने में मदद : यदि मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी को सही तरीके से पूरा किया जाए तो फसल की वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन बढ़ सकता है।

लागत कम होती है : जहां जरूरत नहीं है, वहां उर्वरक डालने से बचा जा सकता है। इससे खाद पर होने वाला खर्च घटता है।

मिट्टी की सेहत सुधरती है : लगातार एक ही प्रकार की खाद डालने से मिट्टी असंतुलित हो सकती है। मिट्टी परीक्षण संतुलित पोषण प्रबंधन में मदद करता है।

मिट्टी परीक्षण कैसे कराएं?

पहला तरीका है किसान अपने जिले के कृषि विभाग कार्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से संपर्क कर सकते हैं। दूसरा तरीका में सॉइल टेस्टिंग लैब में जाकर सरकारी और निजी दोनों तरह की प्रयोगशालाओं में मिट्टी की जांच कराई जा सकती है।

कई राज्यों में मोबाइल सॉइल टेस्टिंग लैब भी संचालित की जा रही हैं, जो गांवों तक पहुंचकर नमूने जांचती हैं। देशभर में हजारों मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित की जा चुकी हैं।

मिट्टी का नमूना कैसे लिया जाता है?

विशेषज्ञों के अनुसार खेत के चारों कोनों और बीच के हिस्से से लगभग 15 से 20 सेंटीमीटर गहराई तक मिट्टी निकालकर नमूना लिया जाता है। इसके बाद सभी नमूनों को अच्छी तरह मिलाकर लगभग आधा किलो मिट्टी जांच के लिए भेजी जाती है। नमूना तब लेना चाहिए जब खेत में कोई खड़ी फसल न हो।

मिट्टी की जांच में कितना खर्च आता है?

सॉइल हेल्थ कार्ड योजना के तहत किसानों को यह सुविधा पूरी तरह मुफ्त दी जाती है। केंद्र सरकार खुद प्रति नमूना ₹190 राज्य सरकार को देती है, जिसमें नमूना संग्रह, जांच, कार्ड तैयार करना और किसान तक कार्ड पहुंचाना, यह पूरी प्रक्रिया शामिल है। यानी योजना के दायरे में आने वाले किसान को अपनी जेब से कुछ नहीं देना पड़ता।

वहीं अगर कोई किसान सरकारी योजना के बाहर, स्वेच्छा से किसी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या राज्य की प्रयोगशाला में मिट्टी की जांच कराना चाहे, तो वहां सामान्य जांच (pH, EC, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश आदि) के लिए लगभग ₹100 से ₹150 और सूक्ष्म पोषक तत्वों (जिंक, आयरन, कॉपर, मैंगनीज) की अतिरिक्त जांच के लिए लगभग ₹150 से ₹200 तक का शुल्क लग सकता है। निजी लैब में यह शुल्क और अधिक (₹200 से ₹500 प्रति नमूना तक) हो सकता है। अलग-अलग राज्यों और प्रयोगशालाओं में यह शुल्क अलग-अलग होता है।

रिपोर्ट में क्या लिखा होता है?

मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट में प्रत्येक पोषक तत्व की स्थिति बताई जाती है। इसमें लिखा होता है कि तत्व की मात्रा पर्याप्त, मध्यम और कम। इसके साथ यह भी लिखा होता है कि किसान को कौन-सी फसल के लिए कितनी मात्रा में खाद, जैव उर्वरक या मिट्टी सुधारक का उपयोग करना चाहिए।

किस फसल के लिए कौन-सी खाद चाहिए?

इसका एक ही जवाब नहीं होता। यह पूरी तरह मिट्टी की रिपोर्ट पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए अगर समझें तो धान की फसल में यदि नाइट्रोजन कम है तो यूरिया की मात्रा बढ़ाने की सलाह दी जा सकती है। वहीं गेहूं में फॉस्फोरस की कमी होने पर डीएपी या अन्य फॉस्फेट उर्वरक की सिफारिश की जा सकती है। दलहन में सल्फर और जिंक की कमी होने पर सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग की सलाह दी जा सकती है। यही कारण है कि एक ही गांव के दो खेतों के लिए खाद की सिफारिश अलग-अलग हो सकती है।

मिट्टी की खराब सेहत का असर कितना बड़ा है?

हाल के आकलनों में पाया गया है कि देश की बड़ी संख्या में मिट्टी के नमूनों में नाइट्रोजन और ऑर्गेनिक कार्बन की कमी है। इससे फसल उत्पादन और मिट्टी की उर्वरता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि संतुलित उर्वरक उपयोग और नियमित मिट्टी परीक्षण से मिट्टी की गुणवत्ता लंबे समय तक बनाए रखी जा सकती है।

कितने समय बाद दोबारा जांच करानी चाहिए?

सॉइल हेल्थ कार्ड योजना के तहत हर 2 से 3 साल के अंतराल पर मिट्टी परीक्षण कराया जाता है, ताकि मिट्टी की स्थिति में आए बदलावों का पता चल सके। विशेषज्ञ भी सलाह देते हैं कि कुछ वर्षों के अंतराल पर मिट्टी की दोबारा जांच करानी चाहिए।