
Namo drone didi Yojana: भारत में खेती को आधुनिक बनाने और ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए शुरू की गई 'नमो ड्रोन दीदी' योजना केवल एक सरकारी योजना नहीं है, बल्कि कृषि में तकनीक आधारित बदलाव का बड़ा प्रयोग है। इसका उद्देश्य स्वयं सहायता समूह (SHG) की महिलाओं को ड्रोन उपलब्ध कराकर उन्हें कृषि सेवाओं की उद्यमी बनाना है। सवाल यह है कि क्या यह योजना वास्तव में गांवों की महिलाओं की आय बढ़ा पाएगी या फिर प्रशिक्षण, रखरखाव और मांग जैसी चुनौतियां इसकी रफ्तार धीमी कर सकती हैं?
'नमो ड्रोन दीदी' कोई नई घोषणा नहीं है। यह पहले से चल रही योजना है, जो अब अपने आखिरी चरण में पहुंच चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2023 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इसकी घोषणा की थी और उसी साल पहले 500 ड्रोन SHG महिलाओं तक पहुंचा दिए गए थे। केंद्र सरकार ने 2023-24 से 2025-26 की अवधि के लिए 1,261 करोड़ रुपए के बजट के साथ इस केंद्रीय क्षेत्र की योजना को मंजूरी दी। लक्ष्य 15,000 महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन उपलब्ध कराना है ताकि, वे किसानों को किराये पर ड्रोन स्प्रे सेवाएं दे सकें। चयनित SHG को ड्रोन पैकेज की लागत पर 80% तक (अधिकतम 8 लाख रुपए) केंद्रीय सहायता दी जाती है।
चूंकि योजना का तय समय 2025-26 में पूरा हो रहा है, इसलिए यह अभी नई शुरू होने वाली नहीं है, बल्कि अपने अमल के अंतिम पड़ाव में है। राज्यों में SHG चयन और ड्रोन वितरण की प्रक्रिया अब भी सक्रिय है। इनका उदाहरण बना हरियाणा जहां जनवरी 2026 से आवेदन प्रक्रिया शुरू हुई थी।
योजना के तहत मिलने वाला पैकेज केवल ड्रोन तक सीमित नहीं है। इसमें कृषि छिड़काव के लिए आवश्यक उपकरण, बैटरियां, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता भी शामिल होती है। SHG की एक सदस्य को 15 दिन का ड्रोन पायलट प्रशिक्षण तथा दूसरी सदस्य या परिवार के सदस्य को 5 दिन का ड्रोन असिस्टेंट प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि संचालन और रखरखाव दोनों संभव हो सकें।
ड्रोन के जरिए खेतों में नैनो यूरिया, कीटनाशक और तरल उर्वरकों का छिड़काव तेजी से किया जा सकता है। संसद में सरकार ने बताया कि एक कृषि ड्रोन लगभग एक एकड़ क्षेत्र को 7-8 मिनट में कवर कर सकता है। इससे समय, श्रम और रसायनों की खपत कम होने की संभावना रहती है।
इस योजना का सबसे बड़ा उद्देश्य महिलाओं को ड्रोन ऑपरेटर नहीं, बल्कि सेवा प्रदाता उद्यमी बनाना है। SHG किसानों से सेवा शुल्क लेकर आय अर्जित कर सकती हैं। इससे पारंपरिक बचत समूह अब तकनीक आधारित ग्रामीण व्यवसाय में भी प्रवेश कर रहे हैं।
सरकारी जानकारी के अनुसार 2023-24 में 1,094 ड्रोन महिला SHG तक पहुंचाए गए, जिनमें से 500 ड्रोन नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत वितरित किए गए। शेष आवंटन राज्यों को चरणबद्ध तरीके से दिया जा रहा है। इन महिलाओं को DGCA से अधिकृत प्रशिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षित किया गया है।
योजना की सफलता केवल ड्रोन बांटने से तय नहीं होगी। कृषि एवं ग्रामीण परिवर्तन केंद्र (ADRTC), बेंगलुरु के अध्ययन में पाया गया कि जिन समूहों के पास परिवहन वाहन नहीं थे, उनमें 42% से अधिक ड्रोन दीदियों को ड्रोन ले जाने में कठिनाई हुई। बैटरी चार्जिंग, मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स, मौसम और किसानों की नियमित मांग भी व्यावहारिक चुनौतियां हैं।
भारत का ड्रोन इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है। फरवरी 2026 तक देश में 38,500 से अधिक पंजीकृत ड्रोन और लगभग 39,890 DGCA-प्रमाणित रिमोट पायलट मौजूद थे। अब यह आंकड़े और आगे बढ़ चुके हैं। 15 जुलाई 2026 तक देशभर में DGCA-मान्यता प्राप्त 274 रिमोट पायलट ट्रेनिंग संस्थानों ने कुल 48,748 रिमोट पायलटों को प्रशिक्षित किया है। 169 ड्रोन मॉडलों को टाइप सर्टिफिकेट जारी किया जा चुका है। इससे स्पष्ट है कि कृषि के अलावा सर्वेक्षण, आपदा प्रबंधन और सार्वजनिक सेवाओं में भी ड्रोन का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
नमो ड्रोन दीदी योजना की असली परीक्षा यह नहीं होगी कि कितने ड्रोन बांटे गए, बल्कि यह होगी कि कितनी महिलाएं तीन-चार साल बाद भी सफल ग्रामीण एग्री-टेक उद्यमी बनी रहती हैं। यदि रखरखाव, बाजार, प्रशिक्षण और स्थानीय मांग की समस्याओं का समाधान हुआ तो, यह योजना ग्रामीण भारत में महिलाओं की आय बढ़ाने के साथ कृषि के डिजिटलीकरण की बड़ी मिसाल बन सकती है। लेकिन यदि सेवा मॉडल टिकाऊ नहीं बना, तो महंगे ड्रोन गांवों में निष्क्रिय संपत्ति बनकर रह सकते हैं। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में नमो ड्रोन दीदी योजना को केवल महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि भारत के कृषि-तकनीकी मॉडल की कसौटी के रूप में भी देखा जाएगा।