
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
पितृ पक्ष के दौरान देशभर में लोग अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करने में जुटे हैं। कुछ लोग घर पर ही श्राद्ध कर्म करते हैं, तो बड़ी संख्या में श्रद्धालु पवित्र नदियों के तट पर जाकर तर्पण और पिंडदान करना पसंद करते हैं। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जहां पितरों के निमित्त किए जाने वाले इन अनुष्ठानों की बरसों पुरानी परंपरा रही है।
महाकाल की नगरी में क्षिप्रा तट के तीर्थ स्थल महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध उज्जैन सिर्फ इसी वजह से खास नहीं है, बल्कि क्षिप्रा नदी के किनारे बसे कई प्राचीन तीर्थ स्थलों के कारण भी इसका अलग धार्मिक महत्व है। इन्हीं तीर्थों में से एक है सिद्धवट, जहां सदियों से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा चली आ रही है। उज्जैन शहर से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित सिद्धवट को स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में अत्यंत पवित्र स्थान का दर्जा हासिल है।
उज्जैन जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, सिद्धवट को पापमोचन तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। यहां स्थित प्राचीन वट वृक्ष को लेकर मान्यता है कि इसे स्वयं देवी पार्वती ने रोपा था और इसकी पूजा-अर्चना भी की थी, जिस कारण इस स्थल का धार्मिक महत्व सदियों पुराना माना जाता है। ऐसी ही एक मान्यता के अनुसार, यहीं पार्वती ने तपस्या भी की थी। इसी वटवृक्ष को लेकर एक और लोकप्रिय जनश्रुति यह भी है कि सदियों पहले इसे काटने के प्रयास हुए, लेकिन यह वृक्ष हर बार पुनः जीवित हो उठा, जिससे इसकी दैवीय महिमा को लेकर आस्था और गहरी होती गई।
सिद्धवट में श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण के साथ-साथ त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे विशेष अनुष्ठान भी किए जाते हैं, जिनका धार्मिक दृष्टि से यहां विशेष महत्व माना गया है। पिंडदान की प्रक्रिया में श्रद्धालु अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हुए पिंड अर्पित करते हैं, जबकि तर्पण के जरिए जल अर्पण किया जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितरों की आत्मा को शांति और तृप्ति प्राप्त होती है।
उज्जैन में क्षिप्रा नदी, महाकालेश्वर मंदिर और अन्य प्राचीन तीर्थ स्थल एक-दूसरे से गहराई से जुड़े नजर आते हैं। इसी क्रम में रामघाट का भी पिंडदान परंपरा से एक लोकप्रिय धार्मिक संदर्भ जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने अपने माता-पिता के निमित्त यहीं पिंडदान किया था, जिस वजह से इस घाट का नाम रामघाट पड़ा। उज्जैन के अन्य घाटों, जैसे दत्त अखाड़ा घाट और नरसिंह घाट, पर भी श्रद्धालु तर्पण और पिंडदान जैसे कर्मकांड करने पहुंचते हैं, जो इस शहर की व्यापक तीर्थ-परंपरा को दर्शाता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध किया जाएगा, जबकि प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर को पड़ेगा। इसके बाद विभिन्न तिथियों पर संबंधित पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म संपन्न होते रहेंगे। पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा, जिसे उन सभी पूर्वजों के श्राद्ध के लिए सबसे महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है, जिनकी मृत्यु-तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश छूट गया हो।
धार्मिक दृष्टि से भले ही पितृ कर्म के लिए बिहार का गया जी धाम सबसे प्रमुख स्थल माना जाता हो, लेकिन उज्जैन का सिद्धवट भी अपनी प्राचीन मान्यताओं और क्षिप्रा नदी के पावन तट के कारण देशभर के श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। हर साल पितृ पक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करने पहुंचते हैं।
Updated on:
23 Sept 2026 07:55 pm
Published on:
23 Sept 2026 07:55 pm
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