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भारत-न्यूजीलैंड FTA को न्यूजीलैंड संसद की मंजूरी: व्यापार, निवेश और रक्षा सहयोग को मिली नई रफ्तार, भारत को क्या फायदा होगा?

भारत-न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता और रणनीतिक साझेदारी से व्यापार, निवेश, रक्षा और समुद्री सहयोग के नए अवसर खुल रहे हैं। दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक जुड़ाव और साझा सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
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भारत

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Vinay Shakya

Sep 23, 2026

India NZ Partnership

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

भारत और न्यूजीलैंड के बीच आर्थिक, सामरिक और समुद्री सहयोग को हाल के महीनों में नई गति मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जुलाई 2026 में हुई न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान दोनों देशों के रिश्तों को 'रणनीतिक साझेदारी' के स्तर तक बढ़ाया गया था। यह चार दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की न्यूजीलैंड की पहली यात्रा थी। लोवी इंस्टीट्यूट में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, अब न्यूजीलैंड की संसद द्वारा मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया पूरी किए जाने के बाद दोनों देश अपने पहले द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं।

एफटीए को मिली संसदीय मंजूरी

दोनों देशों ने यह मुक्त व्यापार समझौता इसी वर्ष 27 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में हस्ताक्षरित किया था। इसके बाद 16 सितंबर 2026 को न्यूजीलैंड की संसद ने इस समझौते को अमल में लाने के लिए जरूरी कानून को 93 के मुकाबले 29 मतों से पारित कर दिया, जिसे विपक्षी लेबर पार्टी का भी समर्थन मिला। हालांकि इसके साथ ही समझौता पूरी तरह से प्रभावी नहीं हुआ है, दोनों पक्षों को अभी अपनी-अपनी घरेलू अनुसमर्थन प्रक्रियाएं पूरी करनी हैं और उम्मीद है कि यह इसी वर्ष लागू हो जाएगा।

किसे मिलेगा फायदा?

इस एफटीए से दोनों देशों को व्यापक फायदा मिलने की उम्मीद है। समझौते के तहत भारत के लगभग शत-प्रतिशत निर्यात, जिनमें टेक्सटाइल, लेदर, फुटवियर तथा जेम्स एंड ज्वेलरी जैसे उत्पाद शामिल हैं - को न्यूजीलैंड के बाजार में तत्काल शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी। वहीं भारत, न्यूजीलैंड के करीब 95 प्रतिशत निर्यात पर शुल्क समाप्त या कम करेगा, हालांकि डेयरी और कुछ चुनिंदा संवेदनशील कृषि उत्पादों को इससे बाहर रखा गया है। समझौता लागू होते ही न्यूजीलैंड के आधे से अधिक निर्यात उत्पाद शुल्क-मुक्त हो जाएंगे। न्यूजीलैंड के व्यापार मंत्री टॉड मैक्ले ने इसे "उच्च गुणवत्ता वाला समझौता" बताते हुए कहा कि निर्यातकों को इसका तत्काल और बड़ा लाभ मिलेगा। न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में करीब 20 अरब डॉलर के निवेश की भी प्रतिबद्धता जताई है।


लोवी इंस्टीट्यूट के लेख के मुताबिक, अमेरिकी व्यापार नीतियों से उपजी वैश्विक शुल्क अनिश्चितताओं के दौर में भारत जैसा बड़ा और तेजी से बढ़ता बाजार न्यूजीलैंड के लिए खास अहमियत रखता है, क्योंकि उसका व्यापार अब भी बड़े पैमाने पर चीन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे परंपरागत साझेदारों पर केंद्रित है। वर्ष 2025 में न्यूजीलैंड के कुल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी महज 1.8 प्रतिशत थी, जिसमें एफटीए लागू होने के बाद उल्लेखनीय बढ़ोतरी की उम्मीद जताई जा रही है।


भारत पर क्या असर होगा?

भारत के लिए यह समझौता न सिर्फ व्यापार और निवेश बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। न्यूजीलैंड, भारत को ओशिनिया क्षेत्र से मजबूत जुड़ाव प्रदान करता है, जिससे भारत के मुक्त, खुले, समावेशी और सुरक्षित इंडो-पैसिफिक के विजन का भौगोलिक दायरा और बढ़ता है। साथ ही यह भारत को सिर्फ क्वाड जैसे बहुपक्षीय मंचों तक सीमित न रहकर द्विपक्षीय साझेदारियों के जरिए भी इंडो-पैसिफिक में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का अवसर देता है। दूसरी ओर, न्यूजीलैंड भारत के लिए उन्नत अनुसंधान, शिक्षा, निवेश तथा कृषि व खाद्य प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में व्यापक संभावनाएं खोलता है।

दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य रखा

दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करते हुए करीब 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर (लगभग 4.2 अरब अमेरिकी डॉलर) तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। जून 2026 तक के एक वर्ष में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 3.99 अरब न्यूजीलैंड डॉलर रहा, और भारत फिलहाल न्यूजीलैंड के लिए वस्तुओं व सेवाओं के निर्यात का नौवां सबसे बड़ा गंतव्य है।

रक्षा और समुद्री सहयोग को भी मिली धार

व्यापार के अलावा दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा, हाइड्रोग्राफी, लॉजिस्टिक्स और सूचना साझा करने पर बनी सहमति ने रक्षा सहयोग को भी नया आयाम दिया है। इसके तहत न्यूजीलैंड के भारत की इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव (आईपीओआई) के समुद्री सुरक्षा स्तंभ से जुड़ने का रास्ता भी खुल गया है। लोवी इंस्टीट्यूट के लेख के अनुसार, भौगोलिक रूप से दूर स्थित इन दोनों देशों को इससे समुद्री जागरूकता, सुरक्षित समुद्री मार्ग, आपदा राहत एवं प्रतिक्रिया तथा साझा समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने का अवसर मिलेगा, जो आने वाले वर्षों में दोनों देशों के संबंधों को और गहरा कर सकता है।

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