
भागदौड़ भरी जिंदगी, समय का अभाव, बढ़ती जनसंख्या और तेजी से बढ़ रहा एकल परिवार का चलन बुजुर्गों के लिए चुनौती बन गया है। सीमित क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का कम होना और लोगों को कमाई के लिए दूसरे स्थानों पर अस्थाई रूप से रहने के लिए विवश होना, जैसे कारण एकल परिवारों के चलन को बढ़ा रहे हैं। एकल परिवारों के चलन के दौर में बुजुर्ग अकेलेपन से गुजर रहे हैं। इसके साथ ही बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा भी बड़ी चुनौती बन गया है। जो घर कभी बुजुर्गों की मौजूदगी से भरे रहते थे, आज उन्हीं घरों के कई कमरे खाली पड़े हैं। ऐसे घरों में बच्चे पढ़ाई और रोजगार के लिए शहर या विदेश जा चुके हैं और बुजुर्ग माता-पिता अकेले रह गए हैं। संयुक्त परिवार व्यवस्था के टूटने और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने भारत में बुजुर्गों की देखभाल को एक गंभीर सामाजिक मुद्दा बना दिया है।
प्रवास के दौर ने बुजुर्गों के अकेलेपन को एक तरह की मजबूरी बना दिया है। परिवार के केंद्र में रहने वाले बुजुर्ग अब धीरे-धीरे घर के किनारे की ओर खिसकते नजर आते हैं। समय के साथ भौगोलिक दूरी बढ़ी, आपसी संवाद कम हुआ और रिश्तों की गर्माहट प्रभावित हुई है। तकनीकी ने भले ही परिवार से संपर्क करने की सुविधा को संभव बनाया हो, लेकिन मानवीय उपस्थिति का विकल्प नहीं बन सका है।
रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में युवाओं का शहरों और महानगरों की ओर पलायन, बढ़ता शहरीकरण, आर्थिक दबाव के चलते छोटे घरों में सीमित जगह, बदलती जीवनशैली जिसमें दोनों पति-पत्नी नौकरी करते हैं। ऐसी जीवनशैली में बुजुर्गों की देखभाल के लिए समय निकालना मुश्किल होता जा रहा है। आधुनिकता, नगरीकरण, उपभोक्तावाद और संयुक्त परिवारों के विघटन ने बुजुर्गों की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। आज अधिकांश वृद्धजन उपेक्षा, अकेलापन, आर्थिक शोषण और मानसिक उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं।
अकेले रह रहे बुजुर्गों के सामने सिर्फ भावनात्मक अकेलापन ही नहीं, बल्कि शारीरिक सुरक्षा का खतरा भी बड़ी चुनौती है। उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्गों की शारीरिक शक्ति, याददाश्त और गतिशीलता कम होने लगती है। इस उम्र में उन्हें मधुमेह, हृदय संबंधी समस्याएं या जोड़ों के दर्द जैसी दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं घेर लेती हैं, जिसके चलते घर पर सुरक्षा सुनिश्चित करना और नियमित स्वास्थ्य निगरानी बेहद जरूरी हो जाती है।
राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान (NISD) के अनुसार, भारत जनसांख्यिकीय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। जनगणना 2011 के अनुसार, देश में 8.2 प्रतिशत बुजुर्ग पुरुष और 9 प्रतिशत बुजुर्ग महिलाएं हैं, जो 2001 की जनगणना के 7.4 प्रतिशत से बढ़कर कुल मिलाकर 8.6 प्रतिशत हो गई है। यानी बुजुर्गों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, जिसका सीधा असर परिवार, समाज और नीति-निर्माण पर पड़ना तय है।
बुजुर्गों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए भारत में 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007' लागू है। यह अधिनियम 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए है, जो अपनी आय या संपत्ति से खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं। अपने बच्चों या कानूनी उत्तराधिकारियों से भरण-पोषण मांगने का कानूनी अधिकार देता है। इसके अतिरिक्त दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भी बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों से भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं।
हाल के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी अधिनियम के तहत एक वरिष्ठ दंपति की अपने बेटे को बेदखल करने की याचिका पर सुनवाई की, जो दिखाता है कि पारिवारिक विवादों में यह कानून अब सक्रिय रूप से इस्तेमाल हो रहा है। 2019 में इस अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव भी लाया गया, जिसमें भरण-पोषण की परिधि को और व्यापक बनाने की बात कही गई।