
आम जिंदगी में कई बार लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या कोई पुलिसकर्मी बिना किसी वजह के उनका मोबाइल फोन चेक कर सकता है? पुलिसकर्मी पूछताछ करता है तो आम नागरिक के पास क्या कानूनी अधिकार होते हैं? हाल ही आए कोर्ट के कुछ फैसलों ने इस विषय पर स्थिति साफ कर दी है, जिससे आम आदमी को अपने अधिकार समझने में मदद मिलेगी। आइए जानते हैं आम आदमी और पुलिस के पास क्या कानूनी अधिकार हैं?
कानून के मुताबिक, किसी आम नागरिक का फोन जांचने या जब्त करने के लिए पुलिस के पास तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत पुलिस किसी दस्तावेज या वस्तु, जिसमें मोबाइल फोन भी शामिल हो सकता है। ऐसी वस्तुओं को चेक या पेश करने के लिए पुलिस समन जारी कर सकती है। लेकिन तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया के दौरान अब ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग करना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
हाल ही में एक हाईकोर्ट के फैसले में यह भी स्पष्ट हुआ कि बिना BNSS की तय प्रक्रिया का पालन किए किसी का मोबाइल फोन जब्त करना उस व्यक्ति की निजता और सम्मान का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा। यानी सामान्य परिस्थितियों में पुलिस किसी आम नागरिक का फोन मनमाने ढंग से चेक नहीं कर सकती है। इसी तरह फोन कॉल टैप करने या निगरानी करने के लिए भी पुलिस को कानूनी अनुमति या शिकायत के आधार की जरूरत होती है। पुलिस के पास वारंट या शिकायत के बिना किसी आम आदमी के फोन कॉल को टैप करने का अधिकार नहीं है।
हालांकि, अगर कोई गंभीर या संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) से जुड़ा मामला हो, जैसे किसी अपराध की जांच में मोबाइल सबूत के तौर पर जरूरी हो, तो पुलिस उचित प्रक्रिया अपनाकर, सक्षम अधिकारी की अनुमति या अदालत के आदेश से फोन जांच सकती है। लेकिन बिना किसी शिकायत, FIR या जांच के सिर्फ शक के आधार पर सड़क पर रोककर किसी का फोन चेक करना कानूनी रूप से उचित नहीं माना जाता।
भारतीय संविधान और BNSS के तहत हर नागरिक को कुछ बुनियादी अधिकार प्राप्त हैं। गिरफ्तारी की स्थिति में व्यक्ति को गिरफ्तारी का कारण जानने, परिवार के किसी सदस्य को सूचित करने, वकील से सलाह लेने और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का अधिकार है।
इसके अलावा महिला की तलाशी केवल महिला पुलिसकर्मी ही ले सकती है। सूर्यास्त के बाद व सूर्योदय से पहले सामान्यतः किसी महिला को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। किसी महिला की गिरफ्तारी सिर्फ विशेष परिस्थितियों में ही की जा सकती है। अगर कोई झूठी FIR दर्ज कराई गई हो, तो नागरिक BNSS की धारा 528 के तहत सीधे हाईकोर्ट में उसे रद्द कराने के लिए याचिका दायर कर सकता है।
अगर कोई पुलिसकर्मी बिना उचित कारण के परेशान करे, धमकाए या जबरदस्ती करे तो सबसे पहले शांत रहते हुए संबंधित अधिकारी का नाम, पद (रैंक) और पहचान पत्र मांगना चाहिए। किसी भी पूछताछ या नोटिस को लिखित रूप में मांगने का अधिकार भी नागरिक को है। संभव हो तो बातचीत को रिकॉर्ड करना भी एक कारगर तरीका है। अगर व्यवहार में कोई गड़बड़ी महसूस हो, तो तुरंत संबंधित थाने के वरिष्ठ अधिकारी, पुलिस अधीक्षक (SP) या पुलिस महानिदेशक (DGP) से संपर्क किया जा सकता है।
पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए कई माध्यम उपलब्ध हैं। सबसे पहले संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) या पुलिस महानिदेशक (DGP) कार्यालय में शिकायत दी जा सकती है। कई राज्यों में इसके लिए ऑनलाइन पोर्टल भी उपलब्ध हैं। जैसे उत्तर प्रदेश में uppolice.gov.in या गुजरात में हेल्पलाइन नंबर 14449 है। इसके अलावा पुलिस शक्तियों के दुरुपयोग की शिकायत के लिए राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण (State Police Complaints Authority) से भी संपर्क किया जा सकता है। जिसका गठन कई राज्यों में नागरिकों की सुरक्षा के लिए किया गया है। अगर मामला मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ा हो, तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। NHRC की हेल्पलाइन सेवा सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक 14433 नंबर पर उपलब्ध है।
ईमेल के जरिए भी NHRC में शिकायत भेजी जा सकती है। ध्यान रहे कि NHRC में शिकायत घटना के 60 दिनों के भीतर दर्ज करानी होती है और मामला किसी अदालत में लंबित नहीं होना चाहिए। इसके अलावा राज्य मानवाधिकार आयोग में भी शिकायत की जा सकती है। कानून के जानकारों का मानना है कि आम नागरिक को अपने मौलिक अधिकारों की जानकारी होना बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की ज्यादती की स्थिति में वे सही मंच पर आवाज उठा सकें। फोन जांच हो या गिरफ्तारी की प्रक्रिया, पुलिस को हर कदम पर तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है, और इसका उल्लंघन होने पर नागरिकों के पास शिकायत और न्याय पाने के कई भरोसेमंद रास्ते मौजूद हैं।