
'करो या मरो'...9 अगस्त 1942 के दिन यह नारा करोड़ों भारतीयों के लिए स्वतंत्रता का संकल्प बन गया। महात्मा गांधी के इन दो शब्दों ने पूरे देश में ऐसी चेतना जगाई कि अंग्रेजी शासन की नींव हिल गई। भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह निर्णायक मोड़ था, जिसने यह साफ कर दिया कि अब भारत पर ब्रिटिश शासन अधिक समय तक नहीं टिक सकता।
आजादी के 79 वर्ष बाद भी यह आंदोलन जनशक्ति, अहिंसक प्रतिरोध और राष्ट्रीय एकता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
1942 का समय पूरी दुनिया के लिए उथल-पुथल भरा था। दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था और ब्रिटेन जर्मनी, इटली और जापान के खिलाफ लड़ रहा था। ब्रिटिश सरकार ने भारत को बिना भारतीय नेताओं की सहमति के युद्ध में शामिल कर दिया। भारतीय नेताओं का सवाल साफ था, "जब भारत खुद गुलाम है तो वह लोकतंत्र बचाने के लिए युद्ध में क्यों लड़े?"
1942 में ब्रिटिश सरकार ने क्रिप्स मिशन भेजा। उद्देश्य था भारतीय नेताओं को युद्ध में सहयोग के बदले भविष्य में कुछ संवैधानिक रियायतों का आश्वासन देना, लेकिन प्रस्ताव में तत्काल सत्ता हस्तांतरण का कोई स्पष्ट वादा नहीं था। गांधी जी ने इस प्रस्ताव को "डूबते बैंक का उत्तर-दिनांकित चेक" तक कह डाला और कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया। यहीं से निर्णायक संघर्ष की भूमिका तैयार हुई।
8 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक हुई, जिसमें "भारत छोड़ो प्रस्ताव" पारित किया गया। इसी बैठक में महात्मा गांधी ने ऐतिहासिक भाषण देते हुए कहा, "करो या मरो। हम भारत को आजाद कराएंगे या इस प्रयास में अपने प्राण न्योछावर कर देंगे।" यही भाषण भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत बना।
9 अगस्त की सुबह होते-होते महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद सहित लगभग पूरा कांग्रेस नेतृत्व गिरफ्तार कर लिया गया। गांधी जी को पुणे के आगा खान महल में नजरबंद रखा गया। यहीं कैद के दौरान 15 अगस्त 1942 को उनके निजी सचिव महादेव देसाई का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया, और डेढ़ साल बाद 22 फरवरी 1944 को उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी का भी वहीं देहांत हुआ। दोनों की समाधियां आज भी आगा खान महल परिसर में स्थित हैं।
ब्रिटिश सरकार को लगा कि नेतृत्व जेल में जाएगा तो आंदोलन समाप्त हो जाएगा, लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। इस बार आंदोलन शीर्ष नेताओं ने नहीं, बल्कि आम जनता और दूसरी पंक्ति के युवा नेताओं ने संभाल लिया। जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई।
भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि यह पूरी तरह जनआंदोलन बन गया।
ब्रिटिश प्रशासन पहली बार इतने व्यापक जनविद्रोह से जूझ रहा था।
इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। अरुणा आसफ अली ने गिरफ्तारी से बचते हुए गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया। उन्हें बाद में "भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका" कहा गया।
उषा मेहता ने भूमिगत कांग्रेस रेडियो शुरू किया। इस गुप्त रेडियो के माध्यम से पूरे देश में आंदोलन की खबरें पहुंचाई जाती थीं। जब ब्रिटिश सरकार अखबारों पर सेंसर लगा रही थी, तब यह रेडियो स्वतंत्रता की आवाज बन गया।
बंगाल के तमलुक में मातंगिनी हाजरा नाम की 73 वर्षीय महिला एक जुलूस का नेतृत्व करते हुए पुलिस गोलीबारी में शहीद हो गईं। हाथ में तिरंगा थामे उनकी शहादत आज भी आंदोलन के सबसे मार्मिक प्रसंगों में गिनी जाती है।
भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे रोचक पक्ष यह था कि कई जिलों में लोगों ने अंग्रेजी शासन को मानने से इनकार कर दिया।
इसने ब्रिटिश सरकार को संकेत दिया कि जनता अब वैकल्पिक शासन चलाने का आत्मविश्वास भी रखती है।
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए कठोर कार्रवाई की।
1942 से 1944 के बीच लगभग एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। हजारों घायल हुए और अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो आंदोलन को तत्काल सफलता नहीं मिली। ब्रिटिश सरकार ने इसे दबा दिया और कांग्रेस का पूरा नेतृत्व लंबे समय तक जेल में रहा।
इतिहासकार मानते हैं कि यह आंदोलन मनोवैज्ञानिक रूप से अंग्रेजों की सबसे बड़ी हार था। ब्रिटिश सरकार समझ चुकी थी कि अब भारत को लंबे समय तक बलपूर्वक नियंत्रित करना संभव नहीं है।
1942 के बाद भारतीय राजनीति पूरी तरह बदल गई।
इतिहासकारों का मानना है कि यदि भारत छोड़ो आंदोलन न हुआ होता, तो 1947 में स्वतंत्रता की प्रक्रिया इतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ती।
भारत छोड़ो आंदोलन ने यह साबित किया कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता होती है। यह आंदोलन किसी एक नेता, एक राज्य या एक वर्ग तक सीमित नहीं था। इसमें छात्र, किसान, मजदूर, व्यापारी, महिलाएं और युवा, सभी एक साथ खड़े हुए। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता थी।