Patrika+

राजस्थानी मानसून थाली: बाजरा, कैर-सांगरी और घेवर… जानिए बारिश में यहां क्या-क्या खाते हैं लोग

राजस्थान में मानसून के साथ सिर्फ मौसम ही नहीं, बल्कि खान-पान भी बदल जाता है। बाजरे की बुआई से लेकर मिर्ची बड़ा, घेवर, कैर-सांगरी और मंगौड़ी जैसी पारंपरिक डिशेज आज भी खाई जाती हैं।
4 min read
Jul 27, 2026
Rajasthan Monsoon Food, Rajasthani Cuisine, Rajasthan Traditional Food,
प्रतीकात्मक फोटो | Credit- ChatGPT AI

राजस्थान की रसोई सिर्फ स्वाद की कहानी नहीं है। यह सदियों से रेगिस्तानी जलवायु और पानी की कमी से जूझते हुए विकसित हुई एक जीवनशैली है। जैसे-जैसे मानसून आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे यहां की थाली भी बदलती है। आइए जानते हैं कि इस मौसम में राजस्थान में क्या खाया जाता है और इसके पीछे की वजह क्या है।

राजस्थान का मौसम

राजस्थान की जलवायु को मोटे तौर पर चार चरणों में बांटा जाता है - ग्रीष्म (अप्रैल से जून), मानसून (जून के अंत से सितंबर), मानसून के बाद (अक्टूबर-नवंबर) और सर्दी। गर्मियों में तापमान आमतौर पर 32°C से 45°C के बीच रहता है, लेकिन पश्चिमी राजस्थान के इलाकों - जैसे बीकानेर, जैसलमेर और श्रीगंगानगर में यह मई-जून में 48°C तक पहुंच जाता है। जून 2025 में तो श्रीगंगानगर में पारा 49.4°C तक चला गया था, जो पिछले 35 साल का रिकॉर्ड था।

जब मानसून दस्तक देता है, तो राहत मिलती है, लेकिन अधिक नहीं। दिन का तापमान आमतौर पर 33°C से 40°C के बीच रहता है, और रातें थोड़ी ठंडी होकर 23°C से 26°C तक।

बारिश की मात्रा राज्य में बेहद असमान है - पूर्वी और दक्षिणी राजस्थान में जहां सीजन भर में 400 से 700 मिलीमीटर तक बारिश हो सकती है, वहीं पश्चिमी रेगिस्तानी इलाकों में यह आंकड़ा कहीं कम रहता है। जुलाई और अगस्त, ये दोनों महीने मिलकर राज्य की सालाना बारिश का करीब दो-तिहाई हिस्सा ले आते हैं।

इसी बदलते मौसम के अनुसार यहां की फसल और भोजन दोनों तय होते हैं।

बाजरा: मानसून का पहला मेहमान

मानसून के आगमन के साथ ही राजस्थान में बाजरे की बुआई शुरू हो जाती है - आमतौर पर जुलाई के पहले पखवाड़े में, यानी 1 से 15 जुलाई के बीच। यह टाइमिंग कोई संयोग नहीं; बाजरा एक खरीफ फसल है, जिसे बढ़ने के लिए ठीक उतनी ही नमी चाहिए जितनी मानसून की पहली बारिशें देती हैं। रेतीली मिट्टी और कम पानी वाले इलाकों में भी यह फसल अच्छी तरह टिक जाती है, यही वजह है कि राजस्थान भारत का सबसे बड़ा बाजरा उत्पादक राज्य है।

बाजरे से बनने वाले व्यंजन

जैसे बाजरे की खिचड़ी और दही की कढ़ी असल में सर्दियों में अधिक लोकप्रिय होते हैं, जब इनकी गर्माहट शरीर को राहत देती है। लेकिन मानसून में बोया गया यही बाजरा आने वाले महीनों की इन थालियों की नींव रखता है। इसे देसी घी या तिल के साथ परोसा जाता है, और इसे इम्युनिटी बढ़ाने वाला भोजन माना जाता है।

बरसात की खास सौगातें

मानसून के मौसम में जोधपुर की सड़कों पर मिर्ची बड़ा एक खास पहचान है। बड़ी हरी मिर्च में खट्टा-चटपटा आलू या बेसन का मसाला भरकर इसे तला जाता है, और खट्टी-मीठी चटनी के साथ परोसा जाता है। बरसात के मौसम में शाम में गरमागरम मिर्ची बड़ा खाने का अपना ही मजा है।

राजस्थान की मशहूर मिठाई

इसी मौसम में जयपुर की मशहूर मिठाई घेवर बाजारों में छा जाती है। तीज और रक्षाबंधन के त्योहार इसी दौरान पड़ते हैं, और इन मौकों पर घेवर बड़े पैमाने पर बनाई और बेची जाती है। केसर, मावा और चाशनी की परतों से सजा यह मिष्ठान्न मानसून के त्योहारी माहौल का अभिन्न हिस्सा है।

सूखी सब्जियों का स्वाद

राजस्थान की पहचान संरक्षित और सूखी सामग्री के रचनात्मक इस्तेमाल में देखने को मिलती है। यह आदत मूलतः पानी की कमी और लंबे सूखे महीनों से निपटने के लिए विकसित हुई, लेकिन मानसून की नम रसोई में भी उतनी ही काम आती है।

कैर-सांगरी इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है - कैर (एक जंगली बेरी) और सांगरी (खेजड़ी के पेड़ की फली) को धूप में सुखाकर महीनों तक रखा जा सकता है, और इन्हें लाल मिर्च, अजवाइन, हल्दी और जीरे के साथ पकाया जाता है।

मंगौड़ी भी इसी परंपरा की देन है। यह मूंग दाल को भिगोकर, पीसकर, मसाले मिलाकर छोटी-छोटी बूंदों के आकार में धूप में सुखाई गई तैयारी है। ये दाल से बनती है। सूखी होने के कारण यह सालभर स्टोर की जा सकती है, और मानसून में जब ताजी सब्जियां कम पड़ जाती हैं, तब मंगौड़ी की सब्जी या पालक-मंगौड़ी जैसी डिशेजी रसोई को संभाल लेती हैं।

एक अन्य अलग व्यंजन भी है जिसे "पापड़ मंगौड़ी की सब्जी" कहते हैं, जिसमें पापड़ और मंगौड़ी दोनों को साथ मिलाकर दही की ग्रेवी में पकाया जाता है।

इसी तरह मूंग दाल की कचौरी भी सूखे मौसम की देन है, जो अब मानसून की शामों में चाय के साथ उतनी ही पसंद की जाती है।

सफेद और लाल मांस

राजस्थानी रसोई में लाल मांस और सफेद मांस जैसे व्यंजन भी मौसम के हिसाब से अपनी जगह बनाते हैं। लाल मांस तीखा और गहरे मसालों वाला होता है - गर्मी और पानी की कमी वाले मौसम में इसे पाचन के लिए अनुकूल माना जाता है। सफेद मांस अपेक्षाकृत हल्का और मलाईदार होता है, जो मानसून के नम मौसम में अधिक सुहाता है।

एक परंपरा जो जरूरत से जन्मी

राजस्थान में मौसम के अनुसार खान-पान का चुनाव सिर्फ स्वाद का मामला नहीं, बल्कि सदियों की समझ का नतीजा है। बाजरा, मक्का, जौ, गेहूं, दाल, दूध-दही, छाछ, बेसन की मिठाइयां, खाजा, पापड़, मठरी और कैर-सांगरी-हरी मिर्च-नींबू के अचार - ये सब मिलकर एक ऐसी थाली बनाते हैं जो मरुस्थल की चुनौतियों का जवाब है।

मानसून में जब आसमान बादलों से घिरा हो और हवा में नमी हो, तब गरमागरम मिर्ची बड़ा, मीठा घेवर, और मंगौड़ी की चटपटी सब्जी - ये सब मिलकर राजस्थान के इस मौसम को यादगार बना देते हैं। यहां का खान-पान सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि मौसम, भूगोल और परंपरा का जीता-जागता उत्सव है।

Updated on:
27 Jul 2026 12:15 pm
Published on:
27 Jul 2026 12:14 pm