
Education Minister : भारत के पहले शिक्षा मंत्री के बारें में जानें, उन्होंने क्या किए सुधार, PC- Patrika
देश की शिक्षा व्यवस्था सुर्खियों में है। 25 जुलाई 2026 को NEET पेपर लीक को लेकर हफ्तों चले छात्र आंदोलन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया, और अब यह ज़िम्मेदारी एक नए मंत्री के कंधों पर आ गई है। ऐसे मौके पर यह जानना दिलचस्प है कि आजाद भारत में शिक्षा मंत्रालय की नींव किसने रखी थी, और तब से लेकर आज तक इस कुर्सी का सफर कैसा रहा।
आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद थे। वे 15 अगस्त 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहली केंद्रीय कैबिनेट में शामिल हुए और 1947 से 1958 तक, यानी करीब 11 साल तक इस पद पर बने रहे, जो आज तक किसी भी शिक्षा मंत्री का सबसे लंबा कार्यकाल है।
मौलाना अबुल कलाम आजाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्षों में गिने जाते हैं। वे एक विद्वान, लेखक और पत्रकार भी थे, जिन्होंने 'अल-हिलाल' जैसी पत्रिकाएं निकालीं और शिक्षा तथा सामाजिक सुधार को लेकर गहरी समझ रखते थे। आइए जानते हैं शिक्षा मंत्री के तौर पर उनके बड़े सुधार।
आजाद ने 1948 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में "यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन" (राधाकृष्णन आयोग) का गठन किया। इस आयोग ने उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए दूरगामी सिफारिशें दीं, जिनमें विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, शिक्षकों के प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम में सुधार जैसे सुझाव शामिल थे।
उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और एकरूपता लाने के लिए 1953 में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) की स्थापना हुई, जो आज तक भारत में विश्वविद्यालयों को मान्यता देने और फंडिंग तय करने वाली सबसे बड़ी संस्था है।
तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आज़ाद के कार्यकाल में ही 1951 में पहला IIT खड़गपुर में स्थापित किया गया। यह आगे चलकर देशभर में IIT नेटवर्क की नींव बना, जो आज भारत की सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में गिना जाता है।
आजाद ने प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और मुफ्त बनाने पर ज़ोर दिया, जैसा कि संविधान के नीति निदेशक सिद्धांतों में भी लक्ष्य रखा गया था। उन्होंने माध्यमिक शिक्षा में सुधार के लिए भी कई कदम उठाए, ताकि स्कूली स्तर पर बुनियादी ढांचा और गुणवत्ता दोनों बेहतर हों।
आजाद सिर्फ स्कूल-कॉलेज की शिक्षा तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने भारतीय कला, साहित्य और संगीत को बढ़ावा देने के लिए तीन बड़ी राष्ट्रीय अकादमियों की स्थापना की:
आजाद ने वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी शिक्षा को राष्ट्र-निर्माण से जोड़ा। उनके कार्यकाल में ही भारत में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) जैसी संस्थाओं को मज़बूती मिली और उच्च तकनीकी शिक्षण संस्थानों के लिए ज़मीन तैयार हुई।
एक विद्वान और स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते आज़ाद का मानना था कि शिक्षा किसी धर्म या जाति से ऊपर होनी चाहिए। उन्होंने ऐसी शिक्षा नीति की वकालत की जो सभी धर्मों और समुदायों के बच्चों को समान अवसर दे — यह सोच आज भी भारत की शिक्षा नीति की एक बुनियादी वैल्यू मानी जाती है।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के योगदान को सम्मान देने के लिए भारत सरकार हर साल 11 नवंबर (उनकी जन्मतिथि) को "राष्ट्रीय शिक्षा दिवस" के रूप में मनाती है। 1992 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न, देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, दिया गया।
UGC, IIT खड़गपुर, साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी ये सभी संस्थाएं आज भी उनके 11 साल के कार्यकाल की मजबूत नींव पर खड़ी हैं, और यही वजह है कि उन्हें आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था का वास्तुकार माना जाता है।
आजाद के दौर से आज तक शिक्षा मंत्रालय कई हाथों से गुजरा है। हाल ही में यह कुर्सी एक बड़े विवाद के केंद्र में रहीं। धर्मेंद्र प्रधान जुलाई 2021 से केंद्रीय शिक्षा मंत्री थे। NEET पेपर लीक को लेकर 6 जून 2026 से शुरू हुआ छात्र आंदोलन जब जंतर-मंतर पर हफ्तों तक चला और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के नेतृत्व में उनके इस्तीफे की मांग तेज़ हुई, तो 25 जुलाई 2026 को उन्होंने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 75(2) के तहत प्रधानमंत्री की सलाह पर उनका इस्तीफा स्वीकार किया। उनकी जगह अब केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार (Additional Charge) सौंपा गया है, जबकि वे पहले से उपभोक्ता मामले व खाद्य मंत्रालय की ज़िम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक, यह "दोहरा प्रभार" व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि मंत्रालय के कामकाज में कोई रुकावट न आए।
Updated on:
26 Jul 2026 05:09 pm
Published on:
26 Jul 2026 05:09 pm
