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Rajasthan Sports: संघर्ष, सफलता और सिस्टम बनी चुनौतियां, पर राजस्थान के गांवों से निकल रहे चैंपियन

Rajasthan Sports: राजस्थान के गांवों से खेल की दुनिया को नए सितारे मिल रहे हैं। आइए पढ़ते हैं चैंपियन और पैरा चैंपियन खिलाड़ियों की सफलता उनकी चुनौतियों पर विशेष रिपोर्ट।
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Jul 25, 2026
Sports News rajasthan Sports Harish Kumar Sargara Jai Moondra
राजस्थान के गांवों से निकल रहे खेल चैंपियन (Photo: AI Generated)

Rajasthan Sports : राजस्थान का नाम सुनते ही मन में वीरता, संस्कृति और परंपराओं की तस्वीर उभरती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस राज्य ने खेल जगत में भी अपनी एक नई पहचान बनाई है। गांवों और छोटे शहरों से निकल रहे खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। सीमित संसाधनों, आर्थिक अभाव और बुनियादी सुविधाओं की कमी के बावजूद इन खिलाड़ियों ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी सुविधा की मोहताज नहीं होती। दूसरी ओर, कई ऐसे खिलाड़ी भी हैं जिन्होंने देश और प्रदेश के लिए पदक जीतने के बावजूद आज तक अपनी पुरस्कार राशि नहीं पाई है। यह विरोधाभास राजस्थान के खेल तंत्र की उपलब्धियों और चुनौतियों, दोनों को सामने लाता है।

गांव की मिट्टी से निकला जैवलिन का नया सितारा

राजस्थान के जालोर जिले के भवरणी गांव के 15 वर्षीय हरीश कुमार सरगरा (Harish Kumar Sargara) इन दिनों अपनी प्रतिभा के कारण चर्चा में हैं। उनकी जैवलिन थ्रो तकनीक सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद देशभर का ध्यान उनकी ओर गया। सबसे खास बात यह है कि हरीश के पास न कोई आधुनिक प्रशिक्षण केंद्र था और न ही महंगे खेल उपकरण। उन्होंने अपने स्कूल के पीटीआई और एथलेटिक्स स्वर्ण पदक विजेता दिनेश कुमार राव के मार्गदर्शन में साधारण संसाधनों के बीच अभ्यास शुरू किया।

दिसंबर 2025 में चूरू में आयोजित राज्य एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हरीश ने शानदार प्रदर्शन करते हुए छठा स्थान प्राप्त किया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके पिता गणेश सरगरा दैनिक मजदूरी और पेंटिंग का काम करके परिवार का पालन-पोषण करते हैं। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद परिवार ने बेटे के सपने को टूटने नहीं दिया। हरीश की कहानी बताती है कि यदि प्रतिभा को सही मार्गदर्शन मिले तो गांव का खिलाड़ी भी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकता है।

आयरलैंड की जर्सी में चमका टोंक का बेटा

राजस्थान के टोंक जिले में जन्मे जय मूंद्रा (Jai Moondra) की कहानी खेलों की बदलती वैश्विक तस्वीर को दर्शाती है। 10 जनवरी 1997 को टोंक में जन्मे जय इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर हैं और 2021 में मास्टर डिग्री के लिए डबलिन (आयरलैंड) चले गए थे, जहां वे डबलिन की लीनस्टर क्रिकेट क्लब से जुड़े। जून 2026 में बेलफास्ट के स्टॉर्मोंट मैदान पर उन्होंने आयरलैंड के लिए टी20 अंतरराष्ट्रीय डेब्यू किया और अपनी पहली ही गेंद पर भारत के सांजू सैमसन को आउट कर दिया। इसी मैच में आयरलैंड ने भारत के खिलाफ अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय जीत दर्ज की, और सीरीज़ में आयरलैंड ने भारत को 2-0 से हराया। जय की इस उपलब्धि पर टोंक स्थित उनके परिवार और गांव में गर्व और खुशी का माहौल था।

जय मूंद्रा इस बात का उदाहरण हैं कि राजस्थान की प्रतिभाएं अब केवल राज्य या देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी पहचान बना रही हैं।

पदक जीतने वालों को अब तक नहीं मिला सम्मान

जहां एक ओर राजस्थान के खिलाड़ी देश और विदेश में प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक पदक विजेता खिलाड़ी वर्षों से अपनी पुरस्कार राशि का इंतजार कर रहे हैं। यह स्थिति खेल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

राजस्थान के पैरा-एथलीट हाल ही में जयपुर के एसएमएस स्टेडियम में प्राइज मनी और नौकरी की मांग को लेकर धरने पर बैठे थे। उनका कहना था कि पदक जीतने के वर्षों बाद भी घोषित पुरस्कार राशि का भुगतान नहीं हुआ है, जिससे उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। यह अकेला मामला नहीं है - राज्य के सर्वोच्च खेल सम्मान महाराणा प्रताप पुरस्कार और प्रशिक्षकों को दिए जाने वाले गुरु वशिष्ठ अवार्ड भी बीते कई वर्षों से लंबित बताए जाते हैं, यानी पदक विजेता खिलाड़ियों को न सिर्फ पुरस्कार राशि, बल्कि राज्य के सर्वोच्च सम्मान का भी इंतजार करना पड़ रहा है।

खिलाड़ियों का कहना है कि प्रशिक्षण और उपकरणों का खर्च उठाना उनके लिए लगातार कठिन होता जा रहा है, और आर्थिक मजबूरी के कारण कुछ खिलाड़ी कैब चलाने, फूड डिलीवरी और अन्य निजी काम करने को विवश हैं।

राजस्थान खेल परिषद का कहना है कि भुगतान में देरी का कारण प्रशासनिक प्रक्रियाएं और नए ऑनलाइन सिस्टम में बदलाव है। हालांकि खिलाड़ियों का मानना है कि सम्मान केवल मंच पर पदक पहनाने से नहीं, बल्कि समय पर प्रोत्साहन राशि देने से भी मिलता है। राजस्थान क्रीड़ा सहायता अनुदान नियम, 2016 के तहत अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में प्रथम स्थान पाने वाले खिलाड़ी को ₹5 लाख तक और द्वितीय स्थान पाने वाले को ₹3 लाख तक की राशि देय है — सवाल यह है कि यह स्वीकृत राशि खिलाड़ियों तक समय पर पहुंचे।

खेल नीति में सुधार की नई पहल

केंद्र सरकार ने खेलों के प्रशासन को व्यवस्थित करने के लिए राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम बनाया है, जिसका आंशिक क्रियान्वयन 1 जनवरी 2026 से शुरू हो चुका है। इसी दिशा में राज्यों को भी अपनी खेल नीतियों को राष्ट्रीय ढांचे के अनुरूप अपडेट करने के लिए कहा गया है। राजस्थान सरकार भी खेल अवसंरचना और प्रशिक्षण व्यवस्था को मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दे रही है, जिसमें खेल विज्ञान केंद्र, खिलाड़ियों के लिए बीमा सुविधा, युवा विकास कार्यक्रम और आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं का विस्तार शामिल है। जयपुर स्थित हाई परफॉर्मेंस सेंटर में खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिटनेस, स्पोर्ट्स साइंस और आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो आने वाले वर्षों में राजस्थान खेलों के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छू सकता है।

प्रेरणा बन चुके राजस्थान के खिलाड़ी

राजस्थान ने देश को कई ऐसे खिलाड़ी दिए हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा बुलंद किया है। जयपुर में 8 नवंबर 2001 को जन्मीं अवनी लेखरा भारत की सबसे सफल पैरालंपिक निशानेबाजों में शामिल हैं। उन्होंने टोक्यो पैरालंपिक 2020 में महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग SH1 स्पर्धा में स्वर्ण और 50 मीटर राइफल थ्री-पोजीशन SH1 में कांस्य पदक जीतकर एक ही पैरालंपिक में दो पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला बनने का इतिहास रचा। इसके बाद उन्होंने पेरिस पैरालंपिक 2024 में भी 10 मीटर एयर राइफल में स्वर्ण पदक जीता, यानी वे अब लगातार दो पैरालंपिक खेलों में स्वर्ण जीतने वाली भारत की एकमात्र महिला पैरा-एथलीट हैं।

करौली जिले के देवलेन गांव के सुंदर सिंह गुर्जर भाला फेंक (F46 वर्ग) के पैरा-एथलीट हैं। 2016 में एक दुर्घटना में अपना बायां हाथ गंवाने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और टोक्यो पैरालंपिक 2020 तथा पेरिस पैरालंपिक 2024, दोनों में कांस्य पदक जीता। इसके अलावा वे 2023 के एशियाई पैरा गेम्स में स्वर्ण पदक भी जीत चुके हैं और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित हैं।

वहीं चूरू जिले में जन्मे देवेंद्र झाझरिया भारतीय पैरालंपिक इतिहास के सबसे सफल खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। भाला फेंक (F46 वर्ग) में उन्होंने 2004 के एथेंस पैरालंपिक और 2016 के रियो पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीता, जिससे वे दो पैरालंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने। टोक्यो पैरालंपिक 2020 में उन्होंने रजत पदक भी जोड़ा। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है, और दिलचस्प बात यह है कि 2024 में वे चूरू से लोकसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार भी बने।

इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां यह दर्शाती हैं कि राजस्थान में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता केवल बेहतर अवसर, संसाधन और निरंतर सहयोग की है।

खिलाड़ियों को चाहिए सम्मान, केवल सराहना नहीं

राजस्थान के खिलाड़ियों की कहानियां केवल व्यक्तिगत संघर्ष की दास्तान नहीं हैं, बल्कि वे राज्य की खेल व्यवस्था का आईना भी हैं। एक ओर गांवों से निकल रहे युवा खिलाड़ी अपने सपनों को साकार करने के लिए हर दिन संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पदक विजेता खिलाड़ी वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए इंतजार करने को मजबूर हैं।

यदि राज्य सरकार की खेल नीति प्रभावी ढंग से लागू होती है, पुरस्कार राशि का समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जाता है और गांवों तक आधुनिक खेल सुविधाएं पहुंचती हैं, तो राजस्थान आने वाले वर्षों में देश के अग्रणी खेल राज्यों में शामिल हो सकता है।

राजस्थान की धरती ने हमेशा वीरों को जन्म दिया है। अब यही धरती खेलों के नए सितारे भी तैयार कर रही है। जरूरत केवल इतनी है कि इन खिलाड़ियों के संघर्ष को समझा जाए, उनकी मेहनत को उचित सम्मान मिले और उन्हें वह सहयोग दिया जाए जिसके वे वास्तविक हकदार हैं। तभी राजस्थान के गांवों से निकलने वाली यह प्रतिभा राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि विश्व खेल मंच पर भी अपनी अमिट पहचान बना सकेगी।

Updated on:
25 Jul 2026 04:50 pm
Published on:
25 Jul 2026 04:50 pm