
मुंबई के प्रसिद्ध श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर में चढ़ावे की पारदर्शिता और दान प्रबंधन की व्यवस्था पर हालिया घटनाओं ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस लेख में हम समझेंगे कि सिद्धिविनायक विवाद नया विवाद क्या है? मंदिरों में दान प्रबंधन कैसे होता है, ट्रस्ट की जिम्मेदारियां क्या हैं, ऑडिट क्यों आवश्यक है और दान में गड़बड़ी कैसे हो सकती है।
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे के इस आरोप के बाद कि मुंबई के प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर से हर साल करीब 18 करोड़ रुपये के दान का गबन हो रहा है, महाराष्ट्र के विधि एवं न्याय विभाग ने सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट से विस्तृत वित्तीय रिपोर्ट मांगी है।
हालांकि, ट्रस्ट का कहना है कि विभाग की यह कार्रवाई राज ठाकरे के आरोपों के बाद नहीं, बल्कि मई में ट्रस्ट द्वारा कराए जाने वाले व्यापक ऑडिट के अनुरोध के आधार पर शुरू की गई थी। ट्रस्ट के अनुसार, उसने कथित वित्तीय अनियमितताओं की जानकारी पहले ही दी थी और विस्तृत ऑडिट की मांग भी आरोप सामने आने से कई महीने पहले कर दी गई थी।
मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में मार्च 2026 में एक कर्मचारी ने दानपेटी से लगभग ₹10,000 नकद चुरा लिए। उसने अपनी उंगलियों को कैंची की तरह इस्तेमाल कर दानपेटी के छेद से नोट निकाल लिए, जिसे सीसीटीवी फुटेज में रिकॉर्ड किया गया। आरोपी को गिरफ्तार किया गया और उसे तीन दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया। यह घटना मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी में मौजूद कमजोरियों को उजागर करती है।
सिद्धिविनायक मंदिर में दानपेटियों से एकत्रित राशि की गिनती प्रत्येक सप्ताह सीसीटीवी निगरानी में की जाती है। इस दौरान ट्रस्ट के अधिकारी, बैंक का प्रतिनिधि और अन्य अधिकृत कर्मचारी उपस्थित रहते हैं। सोना-चांदी जैसे कीमती चढ़ावे की नीलामी वर्ष में चार-पाँच बार होती है। इसके अतिरिक्त, मंदिर ट्रस्ट के खातों का ऑडिट एक पैनल द्वारा किया जाता है और उसकी वार्षिक रिपोर्ट राज्य विधानसभा में प्रस्तुत की जाती है। यह व्यवस्था पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
ट्रस्ट की मुख्य जिम्मेदारी है दान को सुरक्षित रखना, उसका सही हिसाब रखना और उसका उपयोग मंदिर तथा श्रद्धालुओं के हित में करना। इसमें शामिल हैं:
ऑडिट यह सुनिश्चित करता है कि दान का सही उपयोग हो रहा है और कोई गड़बड़ी नहीं हो रही। उदाहरण के लिए, बिहार धार्मिक न्यास परिषद ने अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के बाद अपने अधीन आने वाले मंदिरों का ऑडिट अब प्रत्येक तीन महीने में कराने का निर्णय लिया है, ताकि समय रहते किसी भी गड़बड़ी का पता चल सके। यह कदम पारदर्शिता बढ़ाने और श्रद्धालुओं का विश्वास बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
दान में गड़बड़ी कैसे हो सकती है?
सिद्धिविनायक मंदिर का दान प्रबंधन मॉडल अपेक्षाकृत मजबूत माना जाता है। इसमें सीसीटीवी निगरानी, बैंक प्रतिनिधि की उपस्थिति, नियमित ऑडिट और विधानसभा में रिपोर्टिंग शामिल है। फिर भी, चोरी जैसी घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश बनी हुई है।
सिद्धिविनायक मंदिर में चढ़ावे की पारदर्शिता की व्यवस्था काफी मजबूत है। सीसीटीवी, बैंकिंग, ऑडिट और रिपोर्टिंग जैसी व्यवस्थाएँ मौजूद हैं। फिर भी, चोरी जैसी घटनाएँ यह याद दिलाती हैं कि सुरक्षा और निगरानी में सतर्कता आवश्यक है। ट्रस्ट की जिम्मेदारी है कि वह दान का पूरा हिसाब रखे, नियमित ऑडिट कराए और किसी भी अनियमितता पर तुरंत कार्रवाई करे।
देश के प्रमुख मंदिरों में सबसे अधिक दान आंध्र प्रदेश के तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) को मिलता है। नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच मंदिर को 918 करोड़ रुपये का दान प्राप्त हुआ, जिसमें 579.38 करोड़ रुपये ऑनलाइन और 339.20 करोड़ रुपये ऑफलाइन माध्यमों से मिले। चढ़ावे के मामले में माता वैष्णो देवी मंदिर दूसरे स्थान पर है, जहां सालाना करीब 500 करोड़ रुपये का दान आता है। शिरडी साईं बाबा मंदिर को हर वर्ष लगभग 320–400 करोड़ रुपये और केरल के गुरुवायूर मंदिर को 250–400 करोड़ रुपये का चढ़ावा मिलता है।
पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर को सालाना 100–230 करोड़ रुपये का दान प्राप्त होता है। यह मंदिर अपनी रथ यात्रा और धार्मिक महत्व के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसके अलावा मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर करीब 125 करोड़ रुपये, काशी विश्वनाथ मंदिर लगभग 100 करोड़ रुपये, सोमनाथ मंदिर करीब 11 करोड़ रुपये और मीनाक्षी अम्मन मंदिर लगभग 6 करोड़ रुपये वार्षिक दान या आय प्राप्त करते हैं। वहीं, अयोध्या के राम मंदिर ने वर्ष 2025 के लिए अपने वार्षिक दान के आधिकारिक आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं किए हैं।
वे मंदिरों में दान देते समय देखें कि क्या सीसीटीवी निगरानी, गिनती की पारदर्शिता और बैंकिंग जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। साथ ही, ट्रस्ट से यह जानने का प्रयास करें कि ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक होती है या नहीं। इससे मंदिरों में पारदर्शिता बढ़ेगी और श्रद्धालुओं का विश्वास मजबूत होगा।
इस प्रकार, मंदिरों में चढ़ावे का हिसाब पारदर्शी बनाने के लिए सुरक्षा, निगरानी और ऑडिट की मजबूत व्यवस्था आवश्यक है और यह व्यवस्था तभी प्रभावी होगी जब उसे नियमित रूप से लागू और जांचा जाए।