
शोरूम से नया स्मार्टफोन खरीदकर लाने में काफी सुकून मिलता है। कई बार लोगों को शांति देने वाला यह पल अधिक समय तक नहीं टिकता है। कुछ ही महीनों में स्मार्टफोन में क्लाउड स्टोरेज फुल हो जाता है। AI फीचर्स के लिए सब्सक्रिप्शन मांगा जाने लगता है, फोन साथ आया चार्जर या तो बॉक्स में होता ही नहीं या अलग से खरीदना पड़ता है। इसके अलावा फोन में स्क्रीन-डैमेज इंश्योरेंस का प्रीमियम जैसे चार्ज भी जुड़ जाते हैं। फोन में यही छिपा हुआ खर्च है, जिसे अब तकनीक विशेषज्ञ 'इनविजिबल टैक्स' यानी अदृश्य टैक्स कहने लगे हैं। यह खर्च बिल में नहीं दिखता, लेकिन हर महीने चुपचाप जेब से निकलता रहता है।
एंड्रॉयड स्मार्टफोन पूरी तरह गूगल की सेवाओं पर निर्भर करता है। फोन बुक, फोटो-वीडियो, व्हाट्सऐप बैकअप और चैट हिस्ट्री, सब कुछ गूगल के क्लाउड स्टोरेज में जमा होता रहता है। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि पहले गूगल की तरफ से 15 GB तक मुफ्त स्टोरेज मिलता था, लेकिन अब यह मुफ्त सीमा घटाकर 5 GB की जा रही है।
इसका मतलब है कि अब सिर्फ मोबाइल डेटा रिचार्ज ही नहीं, फोटो-वीडियो स्टोरेज के लिए भी अलग से भुगतान करना पड़ सकता है। यह भी दावाा किया जा रहा है कि जो लोग नोटबुकएलएम जैसे आधुनिक AI टूल्स का इस्तेमाल करते हुए बड़े डेटासेट अपलोड करते हैं, उनका मुफ्त स्टोरेज बेहद तेजी से खत्म हो जाता है। ऐसे में भारत में एक बड़ा तबका अब भुगतान वाले क्लाउड स्टोरेज प्लान की ओर बढ़ने को मजबूर हो रहा है।
आज लगभग हर नया स्मार्टफोन खुद को 'AI स्मार्टफोन' के तौर पर पेश करता है। सैमसंग की आधिकारिक वेबसाइट पर कंपनी ने अपने बजट फोन गैलेक्सी A26 5G को भी 'ऑसम इंटेलिजेंस' नाम के एआई सूट के साथ लॉन्च किया है, जिसमें सर्कल टू सर्च, AI सेलेक्ट और ऑब्जेक्ट इरेज़र जैसे फीचर दिए गए हैं। लेकिन इनमें से कई एडवांस एआई फीचर पूरी क्षमता से इस्तेमाल करने के लिए ChatGPT Plus, Google AI Pro जैसे सशुल्क सब्सक्रिप्शन की जरूरत पड़ती है। यानी फोन की शुरुआती कीमत में तो AI का नाम जुड़ा होता है, लेकिन उसका पूरा फायदा उठाने के लिए ग्राहक को अलग से मासिक या सालाना शुल्क चुकाना पड़ता है।
AI की वैश्विक दौड़ के कारण गैजेट्स की कीमतों में हो रही बढ़ोतरी। रिपोर्ट के अनुसार जैसे-जैसे कंपनियां एडवांस्ड मेमोरी और AI चिप्स हासिल करने के लिए होड़ में लगी हैं। इन जरूरी पुर्जों की कीमत तेजी से बढ़ रही है और इसका सीधा असर आम ग्राहकों की जेब पर पड़ने की आशंका जताई गई है। हाई-परफॉर्मेंस मेमोरी चिप्स (DRAM) की वैश्विक कमी के चलते अगली पीढ़ी के फ्लैगशिप फोन की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ 200 डॉलर (करीब 19 हजार रुपये) तक की मेमोरी लागत बढ़ने पर किसी फोन की रिटेल कीमत में 26,000 रुपये तक का इजाफा हो सकता है। यानी बड़ी टेक कंपनियों द्वारा डेटा सेंटर और एआई मॉडल के लिए भारी मात्रा में मेमोरी खरीदे जाने का बोझ आखिरकार आम उपभोक्ता तक पहुंच रहा है।
पिछले कुछ वर्षों से ज्यादातर प्रीमियम स्मार्टफोन बॉक्स में चार्जर दिए बिना ही बेचे जा रहे हैं, जिसके चलते ग्राहकों को फास्ट-चार्जिंग सपोर्ट वाला चार्जर अलग से खरीदना पड़ता है। इसी तरह महंगे फोन खरीदने वाले ग्राहकों को स्क्रीन-डैमेज या एक्सीडेंटल डैमेज इंश्योरेंस भी अक्सर अतिरिक्त खर्च के तौर पर जोड़ा जाता है, जिसका सालाना प्रीमियम फोन की कुल कीमत में उल्लेखनीय इजाफा कर देता है।
आजकल भारतीय परिवार अपने खर्च की योजना बनाते समय सिर्फ मुख्य बीमा पॉलिसी पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि अतिरिक्त जरूरतों के लिए अलग से बचत करने लगे हैं, क्योंकि कई खर्च मुख्य पॉलिसी के दायरे में नहीं आते। तकनीक विश्लेषकों का भी मानना है कि गैजेट खरीदते समय उपभोक्ताओं को अब सिर्फ फोन की कीमत नहीं, बल्कि आने वाले एक-दो साल में लगने वाले क्लाउड स्टोरेज, सब्सक्रिप्शन, चार्जर और इंश्योरेंस जैसे 'कुल स्वामित्व खर्च' (टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप) को भी ध्यान में रखना चाहिए।