
भारत सरकार साल 2030 तक अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को रिकॉर्ड स्तर तक ले जाने के लक्ष्य पर तेजी से काम कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में सोलर और विंड परियोजनाओं पर सख्त सुरक्षा बंदिशें लगाकर एक नया रणनीतिक संतुलन साधने की कोशिश की है। यह कदम साफ दिखाता है कि ऊर्जा विस्तार की रफ्तार अब राष्ट्रीय सुरक्षा की कसौटी पर भी परखी जा रही है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिशा निर्देश जारी कर नियंत्रण रेखा (LoC), वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा से 1 किलोमीटर के दायरे में सौर, पवन और हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा की किसी भी नई परियोजना पर पूर्ण रोक लगा दी है। मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा प्रभाग द्वारा जारी इन दिशा निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन में भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों- विशेष रूप से पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन के इंजीनियरों, कर्मचारियों और श्रमिकों को केंद्र सरकार की अनुमति के बिना नियुक्त करने पर भी रोक रहेगी।
गृह मंत्रालय ने भारतीय सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे में किसी भी सोलर, पवन या हाइब्रिड प्रोजेक्ट के लिए रोक लगा दी है। अब ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट के लिए गृह मंत्रालय की मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब सीमावर्ती इलाके में प्रोजेक्टर लगाने से पहले आवेदन नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के पास जाएगा, वहां से फाइल गृह मंत्रालय पहुंचेगी। गृह मंत्रालय की अनुमति के बाद रक्षा मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) लेना अनिवार्य होगा। किसी भी आवेदन का निपटारा गृह मंत्रालय द्वारा 60 दिनों के भीतर किए जाने का प्रावधान रखा गया है।
रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर लगने वाले सोलर पैनल और विंड टर्बाइन कई तरह के सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकते हैं। इनसे सीमा पर निगरानी बाधित हो सकती है। बाहरी एजेंसियों या विदेशी कर्मियों की मौजूदगी से जासूसी और घुसपैठ का खतरा बढ़ सकता है।
संवेदनशील इलाकों की भौगोलिक बनावट में बदलाव सुरक्षा बलों की गश्त और निगरानी क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए देश की आंतरिक सुरक्षा और सीमाओं की संवेदनशीलता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए यह कदम उठाया गया है, ताकि रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों में संभावित सुरक्षा जोखिमों को प्रभावी ढंग से कम किया जा सके।
भारत का रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में भारत ने बड़े हाइड्रो को छोड़कर 13.3 गीगावॉट से अधिक रिन्यूएबल क्षमता जोड़ी, जिसमें अकेले सोलर सेक्टर का योगदान करीब 12 गीगावॉट रहा। राजस्थान और गुजरात बीते एक दशक से इस क्षेत्र में पहले और दूसरे स्थान पर बने हुए हैं।
गुजरात ने इस तिमाही में 4.4 गीगावॉट बिजली जोड़कर अपनी कुल क्षमता 51.5 गीगावॉट तक पहुंचाई, जबकि राजस्थान ने 2.5 गीगावॉट जोड़कर 49.5 गीगावॉट का आंकड़ा छुआ। यही दोनों राज्य पाकिस्तान सीमा से सटे इलाकों में बड़ी रिन्यूएबल परियोजनाओं के केंद्र भी हैं, जिससे नई पाबंदी का सीधा असर इन्हीं राज्यों की भविष्य की परियोजनाओं पर पड़ सकता है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा के क्षेत्र में सोलर-विंड प्रोजेक्ट्स पर पाबंदी लगने से सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ भारत 2030 तक तय किए गए महत्वाकांक्षी नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करना है, तो दूसरी तरफ सीमा सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पाबंदी से नई परियोजनाओं की योजना बनाने में समय और लागत दोनों बढ़ सकते हैं, खासकर उन डेवलपर्स के लिए जो पहले से सीमावर्ती इलाकों में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में हैं। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विश्लेषण में पहले भी बताया जा चुका है कि रिन्यूएबल एनर्जी विस्तार में भूमि अधिकारों को लेकर पहले से ही टकराव की स्थितियां रही हैं। अब सुरक्षा से जुड़ी नई शर्तें इस प्रक्रिया को और जटिल बना सकती हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, सरकार के पास अब दो विकल्प हैं। पहला विकल्प है कि सीमा से दूर के इलाकों में रिन्यूएबल परियोजनाओं को प्राथमिकता देकर लक्ष्य पूरे किए जाएं या फिर सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए एक अलग, सुरक्षा-अनुरूप हल्के पैमाने की परियोजना नीति बनाई जाए। मंजूरी प्रक्रिया में शामिल 3 मंत्रालय- नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा, गृह और रक्षा के बीच तालमेल ही इन चुनौतियों के लिए आगे की रणनीति तैयार करेंगे।