
उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों में खेती का पारंपरिक गणित तेजी से बदल रहा है। दशकों तक किसानों की आय का मुख्य आधार धान और गेहूं रहे, लेकिन अब बढ़ती लागत, पानी की कमी और बाजार की बदलती मांग ने किसानों को नई फसलों की ओर सोचने पर मजबूर कर दिया है। कई इलाकों में किसान अब अपनी पूरी जमीन पर धान-गेहूं लगाने के बजाय कुछ हिस्से में वैकल्पिक फसलें उगा रहे हैं, ताकि जोखिम कम हो और आमदनी बढ़ सके।
खेती के इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ी वजह लागत का बढ़ना है। धान और गेहूं की खेती में बीज, खाद, डीजल, सिंचाई और मजदूरी पर खर्च लगातार बढ़ रहा है, जबकि कई बार किसानों को उनकी उपज का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन और भूजल स्तर में गिरावट भी चिंता का विषय बन गई है। धान जैसी फसलें अधिक पानी मांगती हैं, इसलिए किसान कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
इसके अलावा बाजार की मांग भी बदल रही है। शहरों में फल, सब्जियां, मसाले, दालें, मखाना और औषधीय फसलों की खपत बढ़ी है। सरकार भी दलहन, तिलहन, बागवानी और मोटे अनाज (श्री अन्न) को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत सहायता और अनुदान दे रही है।
मक्का बना नया विकल्प : बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में मक्का का रकबा तेजी से बढ़ा है। एथेनॉल उद्योग, पशु आहार और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में बढ़ती मांग के कारण किसानों को मक्का में बेहतर अवसर दिखाई दे रहे हैं।
अरहर, मूंग, मसूर और चना जैसी दलहनी फसलें किसानों के लिए आकर्षक विकल्प बन रही हैं। ये फसलें मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करती हैं और इनकी लागत भी अपेक्षाकृत कम होती है। वहीं सरसों और सूरजमुखी जैसी तिलहनी फसलों को खाद्य तेलों की बढ़ती मांग का फायदा मिल रहा है।
टमाटर, मिर्च, भिंडी, गोभी और बैंगन जैसी सब्जियों की खेती ग्रामीण इलाकों में तेजी से बढ़ रही है। कम जमीन पर अधिक आमदनी की संभावना किसानों को इस ओर आकर्षित कर रही है। इसके साथ ही केला, अमरूद, पपीता और आम जैसी बागवानी फसलें भी लोकप्रिय हो रही हैं। हालांकि इन फसलों में मुनाफा ज्यादा हो सकता है, लेकिन कीमतों में उतार-चढ़ाव और भंडारण की कमी किसानों के लिए चुनौती भी है।
नकदी और औषधीय फसलें : मेंथा (पुदीना), लेमनग्रास, एलोवेरा और स्टीविया जैसी फसलों की खेती भी बढ़ रही है। प्रोसेसिंग उद्योगों और निर्यात बाजार से जुड़ने पर इन फसलों से अच्छी कमाई की संभावना रहती है।
श्री अन्न और बिहार का मखाना : बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज कम पानी में तैयार हो जाते हैं और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण इनकी मांग बढ़ रही है। वहीं बिहार में मखाना किसानों की आय का बड़ा स्रोत बनकर उभरा है। घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात में भी इसकी मांग बढ़ रही है।
धान और गेहूं की खेती निकट भविष्य में खत्म होने की संभावना नहीं है। देश की खाद्य सुरक्षा, सरकारी खरीद व्यवस्था और MSP जैसी नीतियों के कारण इन फसलों का महत्व बना रहेगा। हालांकि अब किसान जोखिम कम करने और आय बढ़ाने के लिए फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को अपना रहे हैं।
फसलों में विविधता बढ़ने के बावजूद कई समस्याएं बनी हुई हैं।