
उत्तर प्रदेश में गंगा नदी में मिली हिल्सा मछलियां। (ChatGpt)
गंगा में हिल्सा मछलियों की वापसी एक उत्साहजनक संकेत है कि नदी का पारिस्थितिक स्वास्थ्य धीरे-धीरे सुधर रहा है। हाल ही में उत्तर प्रदेश में गंगा नदी में हिल्सा मछलियों के मिलने की खबर ने इस सुधार की दिशा में एक ठोस कदम के रूप में सबका ध्यान खींचा है।
केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (ICAR-CIFRI), बैरकपुर ने नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा में हिल्सा मछलियों की संख्या बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक रैंचिंग कार्यक्रम चलाया है। फरवरी 2026 में जारी प्रेस नोट के अनुसार, 3.82 लाख वयस्क हिल्सा मछलियों को फरक्का बैराज के ऊपर गंगा में छोड़ा गया, जिनमें से 6,031 मछलियों को टैग किया गया था। इसके अलावा, 54.91 लाख निषेचित हिल्सा अंडे और 8.06 लाख हिल्सा स्पॉन भी नदी में छोड़े गए।
इन प्रयासों का असर दिख रहा है। जनवरी 2026 में ICAR-CIFRI की एक रिपोर्ट में बताया गया कि टैग की गई हिल्सा मछलियों की रिकवरी दर 9 प्रतिशत रही, और इन्हें उत्तर प्रदेश के बलिया तक पाया गया, जो नदी में उनकी प्रवासी सीमा का विस्तार दर्शाता है। यह स्पष्ट संकेत है कि रैंचिंग कार्यक्रम से हिल्सा की प्राकृतिक प्रवास क्षमता में सुधार हुआ है।
हिल्सा का वैज्ञानिक नाम Tenualosa ilisha है। इसे बंगाल में ‘इलीश’ के नाम से जाना जाता है और स्वाद, पोषण तथा सांस्कृतिक महत्व के कारण यह दक्षिण एशिया की सबसे चर्चित मछलियों में शामिल है। यह मूलतः समुद्री-नदीय (anadromous) मछली है, लेकिन प्रजनन के लिए मीठे पानी की नदियों में ऊपर की ओर प्रवास करती है। इसी वजह से इसे प्रवासी या एनाड्रोमस मछली कहा जाता है। 1975 में फरक्का बैराज के निर्माण के बाद इसकी प्रवास बाधित हो गया, जिससे गंगा-यमुना में हिल्सा की संख्या लगभग समाप्त हो गई। विशेषज्ञों के अनुसार, 2010 के बाद यह मछलियां इन नदियों में दिखाई ही नहीं दीं।
एक समय गंगा में हिल्सा का सफर केवल बंगाल और बिहार तक सीमित नहीं था। यह नदी की धारा के विपरीत दिशा में तैरते हुए उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों तक पहुंचती थी। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि हिल्सा प्रयागराज, कानपुर और यहां तक कि यमुना के रास्ते आगरा तक भी पहुंचती थी।
अब, वैज्ञानिक रैंचिंग और संरक्षण प्रयासों के चलते हिल्सा की वापसी का सिलसिला शुरू हुआ है। टैगिंग और रैंचिंग से मिली सफलता ने यह स्पष्ट किया है कि नदी में हिल्सा का पुनरुद्धार संभव है।
हिल्सा मछली स्वाद और पोषण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें आयोडीन, जिंक, पोटैशियम और ओमेगा‑3 जैसे पोषक तत्व होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। इसके अलावा, यह मछली स्थानीय मछुआरों की आजीविका से जुड़ी है। जब हिल्सा गायब हुई, तो मछुआरों की आमदनी और जीवन-शैली पर असर पड़ा। अब जब हिल्सा लौट रही है, तो यह उनके लिए आर्थिक राहत और सांस्कृतिक जुड़ाव दोनों का संकेत है।
गंगा में मछलियों की विविधता में भी सुधार हुआ है। ICAR-CIFRI की रिपोर्ट बताती है कि पिछले 11 वर्षों में गंगा में मछलियों की विविधता में लगभग 61 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, और अब नदी में 230 प्रजातियां पाई गई हैं, जो पिछले पांच दशकों में सबसे अधिक है। यह सुधार व्यापक पारिस्थितिक स्वास्थ्य की ओर इशारा करता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि रैंचिंग और टैगिंग जैसे कदम हिल्सा की प्राकृतिक आबादी को फिर से मजबूत कर सकते हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह प्रक्रिया अभी जारी है और समय के साथ ही स्थायी परिणाम सामने आएंगे। नदी में प्रदूषण नियंत्रण, जल प्रवाह बनाए रखना, और मछली प्रवास के मार्गों को खुला रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अगर आप गंगा के किनारे रहते हैं या मछली पर निर्भर हैं, तो यह खबर आपके लिए उम्मीद की किरण है। इसका मतलब है कि नदी का पारिस्थितिक संतुलन लौट रहा है, जिससे मछुआरों की आजीविका सुधर सकती है और पोषक हिल्सा मछली फिर से बाजार में आ सकती है।
गंगा में हिल्सा की वापसी सिर्फ एक मछली का लौटना नहीं, बल्कि नदी की जीवनशक्ति की बहाली का संकेत है। यह हमें याद दिलाता है कि वैज्ञानिक प्रयास, जब सही दिशा में हों, तो प्रकृति को फिर से जीवंत किया जा सकता है।
Updated on:
08 Aug 2026 11:14 am
Published on:
08 Aug 2026 11:12 am
