
दुनिया में ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है - विशेषकर स्वच्छ ऊर्जा के लिए आवश्यक खनिजों की कमी और वैश्विक तेल आपूर्ति में व्यवधान के कारण। ऐसे समय में भारत को किस प्रकार की तैयारी करनी चाहिए, यह समझना अत्यंत आवश्यक है।
हाल ही में इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि लिथियम और तांबे जैसे खनिजों की मांग 2040 तक अत्यंत तेजी से बढ़ेगी, लेकिन आपूर्ति में कमी बनी रहेगी।
उदाहरण के लिए, तांबे की आपूर्ति में 2035 तक लगभग 25% की कमी रह सकती है, जबकि लिथियम की मांग तीन गुना से भी अधिक हो जाएगी। साथ ही, चीन ने बैटरी आपूर्ति शृंखला के कई हिस्सों पर निर्यात नियंत्रण लागू कर दिए हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति और अधिक अस्थिर हो गई है।
भारत की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण है। देश लिथियम, कोबाल्ट और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर है। हालांकि, सरकार ने आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं - जैसे आयात स्रोतों में विविधता लाना, विदेशी निवेश और घरेलू क्षमता बढ़ाना, बैटरी निर्माण और पुनर्चक्रण में निवेश करना।
इसी बीच, ऊर्जा सुरक्षा के दूसरे पहलू - तेल और गैस में भी भारत सक्रिय है। हाल के पश्चिम एशिया संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे मार्गों में व्यवधान से भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसके प्रत्युत्तर में, भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) बढ़ाने और विविध स्रोतों से तेल खरीदने की नीति अपनाई है।
साथ ही, सरकार ने घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए हैं - जैसे नई रिफाइनरी परियोजनाएं और खोज क्षेत्रों का विस्तार।
बैटरी और स्वच्छ ऊर्जा के लिए खनिजों की कमी को दूर करने में पुनर्चक्रण एक महत्वपूर्ण उपाय बनकर उभरा है। भारत में बैटरी और दुर्लभ खनिजों के पुनर्चक्रण पर तेजी से कार्य हो रहा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में अब तक 40% तांबे और एल्यूमीनियम की आवश्यकता स्क्रैप से पूरी होती है, और लिथियम, कोबाल्ट व निकेल में भी ऐसा लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस क्षेत्र में रोजगार और निवेश की संभावनाएं भी उज्ज्वल हैं।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, भारत को निम्नलिखित तैयारियां करनी चाहिए:
भारत को लिथियम, तांबा, कोबाल्ट जैसे खनिजों में चीन पर निर्भरता कम करनी होगी। इसके लिए आयात स्रोतों में विविधता लाना, विदेशी निवेश आकर्षित करना और घरेलू खनन व रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाना आवश्यक है। साथ ही, बैटरी निर्माण और पुनर्चक्रण में निवेश से आपूर्ति शृंखला मजबूत होगी।
तेल संकट से निपटने के लिए भारत को SPR की क्षमता बढ़ानी चाहिए और तेल आपूर्ति के लिए कई देशों से दीर्घकालिक अनुबंध करने चाहिए। इससे आपूर्ति में अचानक उत्पन्न होने वाले व्यवधान का प्रभाव कम होगा।
सौर, पवन और बैटरी भंडारण जैसी स्वच्छ तकनीकों में निवेश बढ़ाकर भारत अपनी ऊर्जा निर्भरता कम कर सकता है। बैटरी निर्माण और पुनर्चक्रण उद्योग को बढ़ावा देने से न केवल खनिज आपूर्ति सुरक्षित होगी, बल्कि रोजगार और आर्थिक विकास को भी बल मिलेगा।
सरकार को ऊर्जा सुरक्षा नीति को और अधिक स्पष्ट और दीर्घकालिक बनाना होगा। इसमें निजी क्षेत्र और विदेशी कंपनियों को शामिल करना, ऊर्जा संक्रमण को तेज करना और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना शामिल है।
ऊर्जा संकट से बचाव में आम लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जैसे कि ईंधन की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, और ऊर्जा-कुशल उपकरणों का इस्तेमाल। सरकार को भी ईंधन सब्सिडी से स्वच्छ विकल्पों की ओर सब्सिडी बढ़ानी चाहिए।
दुनिया में ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है - खनिजों की कमी, तेल आपूर्ति में व्यवधान और वैश्विक अस्थिरता इसके मुख्य कारण हैं। भारत ने इस चुनौती का सामना करने के लिए कई कदम उठाए हैं - जैसे आपूर्ति विविधीकरण, SPR विस्तार, स्वच्छ ऊर्जा में निवेश और पुनर्चक्रण। लेकिन अब समय है इन प्रयासों को और तेज करने का।
नीति सुधार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और घरेलू क्षमता निर्माण से ही भारत इस संकट को अवसर में बदल सकता है।
साथ ही आमजनों को ऊर्जा बचत को अपनी आदत बनाना और स्वच्छ विकल्पों को अपनाना - यह न केवल देश की सुरक्षा, बल्कि आपकी जेब और भविष्य के लिए भी लाभकारी होगा।