
जब मानसून कमजोर होता है, तो खेतों में नमी की कमी, फसलों का कमजोर होना और आर्थिक जोखिम बढ़ जाना आम बात है। ऐसे समय में किसानों के लिए आवश्यक है कि वे समय रहते इसकी तैयारी करे लें। किसानों को फसल, जल-संग्रह और सिंचाई के विकल्पों पर ध्यान देने की जरूरत है। हाल ही में कृषि विशेषज्ञों और शोध संस्थानों ने कुछ व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं, जो इस कठिन समय में सहायक हो सकते हैं।
मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में कृषि सलाहकारों ने सुझाव दिया है कि जब मानसून कमजोर हो, तो धान जैसी अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलों पर निर्भरता कम करें। कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर रुख करें। उदाहरण के लिए, तिल (सेसम), उड़द, मूंग, मड़ुआ और मक्का को सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है।
तिल कम नमी में भी अच्छी वृद्धि करता है। इसकी अवधि लगभग 80–90 दिन होती है और उत्पादन 6–8 क्विंटल प्रति एकड़ तक हो सकता है। उड़द के लिए बीज मात्रा 8–10 किलो प्रति एकड़, उत्पादन 8–12 क्विंटल प्रति एकड़ और बुवाई का समय जून–जुलाई उपयुक्त बताया गया है। मूंग और मड़ुआ भी कम बारिश में अच्छी पैदावार देते हैं और इनकी लागत भी कम होती है। ये सलाह स्थानीय कृषि विशेषज्ञों द्वारा दी गई है और कई रिपोर्टों में दोहराई गई है।
धान की तैयारी में सावधानी
धान की नर्सरी तैयार करने वाले किसानों को सलाह दी गई है कि बारिश नहीं होने की स्थिति में रोपाई में जल्दबाजी न करें। सिंचाई की व्यवस्था जैसे ट्यूबवेल, तालाब या अन्य संसाधनों का उपयोग कर नर्सरी को बचाया जा सकता है। साथ ही, कम अवधि वाली धान की किस्में या हाइब्रिड किस्में चुनना बेहतर हो सकता है, क्योंकि ये कम समय में तैयार हो जाती हैं और कम पानी में भी अच्छा उत्पादन देती हैं।
बारिश के दौरान खेतों में बहने वाले पानी को रोककर फार्म पॉन्ड बनाना एक प्रभावी उपाय है। यह तालाब बारिश का अतिरिक्त पानी इकट्ठा कर लंबे समय तक सुरक्षित रखता है, जिसे बाद में रबी फसलों, सब्जियों या बागवानी में उपयोग किया जा सकता है। इससे सिंचाई की समस्या कम होती है। फसल की गुणवत्ता और उत्पादन बेहतर होता है, और किसानों की आय में वृद्धि होती है।
शोध से पता चला है कि राजस्थान के टोंक और करौली जिलों में फार्म पॉन्ड अपनाने से फसल चक्रता (cropping intensity) 120 प्रतिशत से बढ़कर 190 प्रतिशत तक पहुंच गई। लाभ-लागत अनुपात भी 1.9 से 2.3 और नेट प्रेजेंट वर्थ (NPV) सकारात्मक रहा है। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में एक अध्ययन में पाया गया कि एक हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 450 घन मीटर रनऑफ एकत्रित किया जा सकता है, जो 0.91 हेक्टेयर क्षेत्र में 5 सेंटीमीटर गहराई की सिंचाई के लिए पर्याप्त है। इससे सोयाबीन की पैदावार 22 प्रतिशत और चना की पैदावार 45 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
मौसम की अनिश्चितता में समय पर सिंचाई (प्रोटेक्टिव इरिगेशन) फसल को सूखे से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसानों और कृषि अधिकारियों को मिट्टी की नमी, फसल की जल-आवश्यकता और अल्पकालिक मौसम पूर्वानुमान को समझकर सिंचाई करनी चाहिए। यह रणनीति कृषि सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
इस वर्ष मानसून की शुरुआत देरी से हुई है और कई इलाकों में बारिश सामान्य से कम रही है। कृषि विश्वविद्यालयों ने किसानों को सलाह दी है कि वे बुवाई क्षेत्र कम करें, बीज मात्रा बढ़ाएं (लगभग 30 प्रतिशत तक), और अंतरफसली खेती (इंटरक्रॉपिंग) अपनाएं, ताकि जोखिम कम हो।सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, देश में बारिश में 36–42 प्रतिशत की कमी देखी गई है, जिससे कई किसान देरी से बुवाई कर रहे हैं और सिंचाई पर निर्भरता बढ़ रही है।
अब किसानों को स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क कर उपलब्ध किस्मों, तकनीकी सहायता और वित्तीय योजनाओं की जानकारी लेना चाहिए। साथ ही, सामूहिक रूप से फार्म पॉन्ड निर्माण या सिंचाई व्यवस्था साझा करने से लागत कम हो सकती है और लाभ बढ़ सकता है। इन उपायों से किसान न केवल कमजोर मानसून के प्रभाव को कम कर सकते हैं, बल्कि अपनी खेती को अधिक लचीला, सुरक्षित और लाभकारी बना सकते हैं।