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विश्व में कॉर्पोरेट कल्चर के 83% कर्मचारी बर्नआउट के शिकार, क्या है यह बीमारी और भारत में कितना असर?

आज के दौर में कॉर्पोरेट जगत में काम करने वाले अधिकतर कर्मचारी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों से गुजर रहे हैं। ऐसे कर्मचारियों को वर्कप्लेस पर 'बर्नआउट' की समस्या अधिक होती है। आइए जानते हैं 'बर्नआउट' क्या होता है और भारत में इसका कितना असर हो रहा है?
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Aug 11, 2026
culture burnout
सांकेतिक फोटो (सोर्स-Chatgpt)

आधुनिक कॉर्पोरेट की दुनिया एक अनोखे विरोधाभास से गुजर रही है। एक तरफ काम का दबाव और 'हसल कल्चर' कर्मचारियों को झकझोर रहा है, तो दूसरी तरफ वही कंपनियां अब कर्मचारियों की मानसिक सेहत बचाने के लिए भारी-भरकम प्रीमियम वेलनेस प्रोग्राम्स पर निवेश कर रही हैं। सवाल यह है कि क्या यह असली बदलाव है या सिर्फ एक चमकदार 'बैंड-एड' है?

बर्नआउट कितना गंभीर संकट?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) बर्नआउट को एक व्यावसायिक परिघटना मानता है, जो लगातार कार्यस्थल तनाव को ठीक से प्रबंधित न कर पाने से उपजती है। यह स्थिति कर्मचारियों थकान, काम से भावनात्मक दूरी तथा घटती कार्यक्षमता के रूप में सामने आती है। हाल के आंकड़े इस संकट की गंभीरता बताते हैं। दुनिया भर में करीब 83 प्रतिशत व्हाइट-कॉलर कर्मचारी बर्नआउट महसूस कर रहे हैं।

गैलप की 'स्टेट ऑफ द ग्लोबल वर्कप्लेस 2026' रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक कर्मचारी जुड़ाव (एंगेजमेंट) गिरकर 2025 में सिर्फ 20 प्रतिशत रह गया, जो 2020 के बाद का सबसे निचला स्तर है। लगातार दूसरे साल हुई यह गिरावट गैलप ने पहले कभी दर्ज नहीं की थी। असंतुष्ट व अलग-थलग कर्मचारियों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 8.9 से 10 ट्रिलियन डॉलर की उत्पादकता का नुकसान झेलना पड़ता है, जो दुनिया की कुल GDP का करीब 9 प्रतिशत है।

मैकिन्जी के 'स्टेट ऑफ ऑर्गेनाइजेशन्स 2026' सर्वे के अनुसार, 43 प्रतिशत अधिकारी 2026 में उत्पादकता को अपनी शीर्ष प्राथमिकता मानते हैं और 61 प्रतिशत खुद पर परिणाम देने का भारी दबाव महसूस करते हैं। यही दबाव आगे कर्मचारियों तक पहुंचकर बर्नआउट को बढ़ाता है।

बर्नआउट से कैसे निपट रहीं कंपनियां?

2026 में कॉर्पोरेट वेलनेस अब सिर्फ फल की टोकरी या जिम मेंबरशिप तक सीमित नहीं रहा। अब कंपनियां समग्र दृष्टिकोण अपना रही हैं, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य कोचिंग, समर्पित 'मेंटल फिटनेस डे', बेहतर एम्प्लॉई असिस्टेंस प्रोग्राम (EAP), सब्सिडाइज्ड थेरेपी ऐप्स, नींद व रिकवरी ट्रेनिंग, फाइनेंशियल वेलनेस काउंसलिंग और लचीले वेलनेस स्टाइपेंड शामिल हैं। इन कार्यक्रमों से कर्मचारी खुद अपनी जरूरत के अनुसार योग, पिलाटेस या मसाज थेरेपी चुन सकते हैं।

ग्लोबल वेलनेस इंस्टीट्यूट के अनुसार 2026 में संगठन स्टैंडअलोन वेलनेस कार्यक्रमों से आगे बढ़कर वेलनेस को नेतृत्व व्यवहार, परफॉर्मेंस मैनेजमेंट और संगठन-ढांचे में ही शामिल कर रहे हैं। मैकिन्जी हेल्थ इंस्टीट्यूट के शोध के अनुसार जो कंपनियां वेलबीइंग को नेतृत्व प्रथाओं में एकीकृत करती हैं, वे 20 से 25 प्रतिशत अधिक उत्पादकता और बर्नआउट से जुड़ी लागत में मापने योग्य कमी दर्ज करती हैं। SHRM के हवाले से किए गए शोध के अनुसार वेलनेस कार्यक्रमों में हर एक डॉलर के निवेश पर औसतन 3.27 डॉलर की मेडिकल लागत बचत और 2.73 डॉलर की एब्सेंटीज्म लागत में कमी होती है।

किन देशों में बढ़ा ट्रेंड?

अमेरिका और कनाडा में वेलनेस पर सबसे ज्यादा संस्थागत निवेश देखा जा रहा है, जहां Calm, Lyra Health, Spring Health और Virgin Pulse जैसी कंपनियां कॉर्पोरेट क्लाइंट्स को समग्र वेलनेस समाधान दे रही हैं। यूरोप में मानसिक स्वास्थ्य को कार्यस्थल जोखिम प्रबंधन ढांचे (जैसे ISO 45003 मानक) के तहत औपचारिक रूप दिया जा रहा है, जिससे मानसिक सेहत अब कंपनियों के लिए वैकल्पिक सुविधा नहीं, बल्कि प्रबंधन की जिम्मेदारी बनती जा रही है। चीन में एक कंपनी द्वारा शुरू की गई 'अनहैप्पी लीव' नीति खासी चर्चा में है। जिसके तहत कर्मचारी बिना मेडिकल सर्टिफिकेट के भी मानसिक अस्वस्थता के आधार पर छुट्टी ले सकते हैं।

भारत में भी चलाए जा रहे वेलनेस प्रोग्राम?

बदलते वक्त के साथ भारत में भी प्रीमियम वेलनेस कार्यक्रमों की शुरुआत हो चुकी है। खासकर IT और कॉर्पोरेट सेक्टर में, जहां लंबे ऑफिस घंटे, वर्क-फ्रॉम-होम में पर्सनल-प्रोफेशनल लाइफ के घुलमिल जाने और लगातार ऑनलाइन रहने की अपेक्षा ने कर्मचारियों को थका दिया है। चीन की अनहैप्पी लीव पॉलिसी के बाद भारत में भी मेंटल हेल्थ लीव को लेकर बहस तेज हुई है।

हालांकि कई कर्मचारी अभी भी नौकरी या छवि खराब होने के डर से ऐसी छुट्टी मांगने से हिचकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य ढांचा अब भी कमजोर है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति 2014 और मानसिक स्वास्थ्य सेवा अधिनियम 2017 के बावजूद कार्यान्वयन और संसाधन आवंटन में स्पष्टता की कमी बनी हुई है और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित हैं।

कॉर्पोरेट कल्चर बनाम कर्मचारी

विशेषज्ञ मानते हैं कि बर्नआउट रोकथाम बहुस्तरीय होनी चाहिए। सबसे पहले कार्यभार, भूमिका स्पष्टता, स्वायत्तता और मनोवैज्ञानिक रूप से सुरक्षित प्रबंधन जैसे मूल कारणों को दूर करना जरूरी है। तभी तनाव प्रबंधन कौशल और माइंडफुलनेस जैसे व्यक्तिगत उपाय असरदार साबित होते हैं। भारतीय विशेषज्ञों की राय है कि मानसिक स्वास्थ्य को नीतिगत प्राथमिकता बनाना होगा। जैसे कार्यालयों में फायर सेफ्टी ड्रिल अनिवार्य होती है, वैसे ही नियमित 'इमोशनल वेलनेस' सत्र भी अनिवार्य किए जाने चाहिए।

सबसे बड़ा बदलाव तब आएगा, जब नेतृत्व स्तर पर CEO और मैनेजर खुद मानसिक स्वास्थ्य की अहमियत स्वीकार करें। मीटिंग में केवल लक्ष्यों की नहीं, इंसानियत की भी बात की जाए। प्रीमियम वेलनेस कार्यक्रम राहत जरूर देते हैं। लेकिन जब तक अत्यधिक कार्यभार और दबाव को संबोधित नहीं किया जाता, तब तक ये कार्यक्रम मूल समस्या के स्थायी समाधान के बजाय एक ऊपरी उपचार ही बने रहेंगे।

Updated on:
11 Aug 2026 07:25 pm
Published on:
11 Aug 2026 07:25 pm