
नई दिल्ली। विधानसभा चुनावों के बीच ही राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के प्रयासों को एक नया बल मिल गया है। प्रमुख वामपंथी दल माकपा ने कहा है कि उसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व को ले कर कोई एतराज नहीं। केरल में कांग्रेस से मुख्य मुकाबला होने के बावजूद पार्टी प्रमुख ने कहा है कि अगले चुनाव में पश्चिम बंगाल में इसके साथ तालमेल का विकल्प खुला है। साथ ही केंद्र में सरकार गठन में पार्टी अपनी सभी तरह की भूमिका पर विचार के लिए तैयार है। वामपंथ का उदारवादी चेहरा माने जाने वाले सीताराम येचुरी देश की सबसे बड़ी वामपंथी पार्टी माकपा के प्रमुख हैं। विपक्षी एकता के लिहाज से उनकी भूमिका काफी अहम मानी जा रही है। 10 दिसंबर को विपक्षी दलों की बैठक होनी है। पेश है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
आप विपक्षी एकता की बात करते हैं, पर उन सीटों पर भी लड़ रहे हैं जहां जीतने की उम्मीद बहुत कम।
सिर्फ जीत की बात नहीं। कई जगह पिछले दो-तीन साल के अंदर हम बड़े आंदोलनों में शामिल रहे। जैसे चंबल में दलितों पर अत्याचार के मामले में। इसलिए हम मुख्य रूप से उन्हीं सीटों पर लड़ रहे हैं जहां हमारा जनाधार रहा हो या फिर आंदोलन रहा हो। बाकी जगहों पर हमारी अपील है भाजपा को हराएं।
भाजपा को हटाना इतनी बड़ी प्राथमिकता हो जाती है कि भ्रष्टाचारियों को गले लगा लें?
इसलिए नहीं कि हमें भाजपा के नाम से कोई समस्या है। बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास के लिए यह जरूरी है। अपने धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक गणराज्य को बचाने के लिए और इसे बेहतर बनाने के लिए यह अनिवार्य है इन्होंने एक भी वादा पूरा नहीं किया। उल्टा लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर आर्थिक जुल्म बढ़ा दिए हैं। महंगाई को लीजिए। दुनिया में तेल के दाम गिर रहे हैं, यहां बढ़ रहे हैं। रसोई गैस के दाम हजार का आंकड़ा पार कर गए। आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। देश की दो तिहाई से ज्यादा आबादी नौजवानों की है। यह बेरोजगार है, जिनके पास था रोजगार वह छंटनी का शिकार हो रहा है। इन्होंने हर साल दो करोड़ रोजगार का वादा किया था, अब तक दस करोड़ नई नौकरी का सृजन होना चाहिए था। मगर हुआ ठीक उल्टा। देश के अन्नदाता यानी किसान के पास आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं बच रहा। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में माना है कि हर साल 20 हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं देश में।
सरकार तो कह रही है कि कृषि क्षेत्र में काफी सुधार किए हैं। फिर बदलाव में समय लगता है।
सरकार के कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट देखिए। जो फसल बीमा योजना इन्होंने शुरू की है, उससे बीमा कंपनियों का मुनाफा दस गुना बढ़ा लेकिन किसानों को कोई राहत नहीं मिली है। ये प्रचार के माध्यम से भारत का जो नक्सा बना रहे हैं वह असलियत से कोसों दूर है। लूट मची हुई है। बैंकों से 12 लाख करोड़ रुपये के कर्ज ले कर बड़े पूंजीपति देश से फरार हो गए। उन्हीं के लोग हैं, जिन्हें कर्ज मिला। रफाल में भ्रष्टाचार साफ दिख रहा है। अयोध्या के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर रहे हैं। गौरक्षा के नाम पर हो या एंटी रोमियो स्क्वैड के नाम पर, मॉब लिंचिंग का शिकार हो रहे हैं दलित और मुसलमान।
लेकिन रफाल जैसे मुद्दों पर तो सिर्फ राहुल ही बोलते दिखाई देते हैं। बाकी विपक्ष को चुप्पी साधे है।
राहुल को तो मीडिया उतना नहीं छुपा पाता है। हमारा बड़ा सम्मेलन हुआ। रफाल पर जेपीसी की मांग में हर जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। आर्थिक लूट, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, संवैधानिक संस्थाओं को ध्वस्त करना, मूल स्तंभों को कमजोर करना यही इनके लिए जरूरी है ताकि इस गणराज्य को बदल कर अपने हिंदू राष्ट्र की स्थापना कर सकें।
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के गठबंधन की तैयारी से तो आप पीछे हट गए?
जो भी देश की राजनीति को थोड़ा भी जानता है, उसे पता है कि जो भी गठबंधन सरकार बनीं चुनाव के बाद ही बनीं। जनता पार्टी, वीपी सिंह सरकार, देवगौड़ा सरकार सभी चुनाव बाद गठबंधन थे। 2004 में यूपीए बनी चुनाव के बाद लेकिन चुनाव से पहले राज्य स्तर पर तालमेल होगा। जैसे उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के इर्द-गिर्द, बिहार में राजद के इर्द-गिर्द गठबंधन बनेगा। सभी पार्टियों का अलग-अलग जगह पर प्रभाव है। डीएमके का बिहार में क्या मतलब है और राजद का तेलंगाना में क्या प्रयोजन?
अगर संप्रग का गठबंधन बनता है तो उसमें आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी?
राज्यों के अंदर तालमेल होंगे। हमने चुनाव में तीन लक्ष्य रखें हैं- पहला, भाजपा को सत्ता से दूर रखना। दूसरा, संसद में वामपंथ की ताकत को बढ़ाना। तीसरा, वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष सरकार का गठन। इन तीन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हर प्रदेश में अलग-अलग तालमेल की कोशिश होगी। पश्चिम बंगाल में हमारा नारा है मोदी हटाओ देश बचाओ, तृणमूल की सरकार हटाओ बंगाल बचाओ।
यानी पश्चिम बंगाल में आप कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ेंगे?
वहां चुनाव नजदीक आ रहे हैं, देखते हैं किस तरह की परिस्थिति रहती है।
पर यह रास्ता तो खुला है ना?
हां हां। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस क्या करेगी, वह भी तो देखना है। याद रखिए कि यूपीए के गठन के समय 61 वामपंथी सांसदों में से 57 कांग्रेस को हरा कर आए थे। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए बनी और हमारा बाहर से समर्थन रहा। यह पक्की बात है कि प्रांतीय स्तर पर तालमेल होगा और उसके आधार पर चुनाव के बाद एक वैकल्पिक सरकार जरूर केंद्र में बनेगी।
जैसा कि चंद्रबाबू नायडू ने भी कहा राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ तो कांग्रेस ही विकल्प है, तो क्या आप उसके साथ सरकार बनाएंगे?
सरकार में साथ रहेंगे या बाहर से समर्थन देंगे यह सब चीजें तो उस समय तय होगी, लेकिन पक्की बात है कि वैकल्पिक सरकार बनेगी।
कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होंगे?
यह तो उस समय देखेंगे कि चुनाव के नतीजे किस तरह के आते हैं। 96 में सरकार बनी तो कांग्रेस बाहर रही और बाहर से समर्थन किया, 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनी। साथ मिल कर सरकार बनाने का विकल्प खुला है। क्योंकि 1996 के अनुभव के बाद हमारी पार्टी के अंदर तय हुआ था कि जब भी ऐसी परिस्थिति आएगी मारी तात्कालिक केंद्रीय समिति निर्णय लेगी।
विपक्षी एकता के लिए कामरेड सुरजीत ने बड़ी भूमिका निभाई थी। आपके भी मित्र सभी पार्टियों में हैं, क्या आप भी वैसी भूमिका निभा सकते हैं?
कामरेड सुरजीत से किसी की तुलना नहीं हो सकती। मगर कोशिश जरूर होगी। हमारे तीन मकसद में, भाजपा को सत्ता से दूर रखना अहम है। बिना उसको हटाए दूसरे दलों का कोई अस्तित्व नहीं रह जाएगा। लेकिन लोकसभा में तो आपकी पार्टी का लगातार पिछड़ रही है। 2004 में 43 सीटें थीं, 2009 में 16 हुई, पिछले चुनाव में सिर्फ 9 पर आ गई। राज्यों में भी सिर्फ केरल में आपकी सरकार बची। यह सही है कम्यूनिस्ट पार्टी के मापदंड में एक प्रमुख आधार चुनावी है, जिसमें गिरावट हुई है। यह सब मेरे महासचिव बनने से पहले हुआ। अब कोशिश है कि उल्टा चक्र शुरू हो। लेकिन दूसरा आधार जन संघर्ष का है, जो देश के एजेंडे को प्रभावित करता है। किसान, मजदूरों के आंदोलनों में अगर कोई है तो लाल झंडा ही है।
आप विपक्षी गठबंधन के संयोजक की भूमिका में आ सकते हैं?
जिस भूमिका की भी जरूरत होगी उसे निश्चित तौर पर निभाएंगे। यह ना सिर्फ हमारी ओर हमारी पार्टी के लिए जरूरी है, बल्कि देश के लिए भी जरूरी है।
विपक्ष की अगली बैठक का क्या एजेंड होगा?
हम देश के जरूरी मुद्दों की पहचान कर उन्हें आगे उठाएंगे। सुप्रीम कोर्ट, सीबीआइ, आरबीआइ जैसी संस्थाओं को बर्बाद किया जाना, रफेल और दूसरे भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और किसानों का आंदोलन इनमें प्रमुख हैं। 30 को दिल्ली में किसानों का मुंबई से भी कई गुना बड़ा प्रदर्शन होगा।
क्या आप राहुल के नेतृत्व को स्वीकार करते हैं?
हमारे यहां संसदीय प्रणाली है, राष्ट्रपति शैली नहीं। चुन कर आए सांसद ही तय करते हैं कि प्रधानमंत्री कौन होगा।
विपक्ष के कुछ नेताओं ने उनका नाम लिया है…
2004 में कौन सा नाम था? किसी ने सोचा था कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनेंगे।लेकिन बने और नेहरू के बाद दस साल तक इस पद पर लगातार रहने का श्रेय उनको जाता है।
कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही तब तो उनका प्रधानमंत्री बनेगा?
बिल्कुल यह तो स्वभाविक है।
केरल में आप कांग्रेस के खिलाफ जीतें और उसी के साथ सरकार बना लें, यह जनादेश का अपमान नहीं होगा?
विकल्प क्या है। हमारा मकसद है, वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष सरकार का गठन। यह तो चुनाव के आंकड़ों के आधार पर ही तय होगा।