
चुनाव लड़ना अब करोड़ों का खेल हो गया है। आम आदमी चुनाव लड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता। चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह के हथकंडे तक अपनाए जाने लगे हैं। ऐसे में चुनाव के पुराने दिनों को याद करना अपने आप में एक अनूठा अनुभव है। आज आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि कोई नेता बिना प्रचार के जीत जाए या फिर किसी से पैसे मांगकर नामांकन भरे। चुनाव जीतने के लिए आज कुछ नेता किसी भी हद तक गिरने को तैयार हो जाते हैं। वहीं उस दौर के नेताओं की ईमानदारी आपको हैरान कर देने वाली है। पुराने चुनावी माहौल पर नजर डालें, तो ऐसे कई किस्से सामने आते हैं। उन्हीं में से कुछ पर एक नजर...
चंद्रशेखर : ईमानदारी की मिसाल
ईमानदारी की याद दिलाने वाला एक किस्सा पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से जुड़ा हुआ है। चंद्रशेखर वंशवाद से हमेशा दूर रहे। प्रधानमंत्री और जनता पार्टी के अध्यक्ष रहने के बावजूद परिवार को उन्होंने राजनीति से पूरी तरह दूर रखा। उनकी ईमानदारी का अंदाजा इसी वाकया से लगाया जा सकता है कि एक बार उनके बेटे ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई। जब उन्होंने इस बारे में पिता चंद्रशेखर से पूछा तो, उन्होंने जवाब दिया- "जनता से पूछो।'
केदारनाथ सिंह : प्रचार के दौरान रसोई में जाते
सत्तर के दशक में सुल्तानपुर से कांग्रेस के चिन्ह पर चुनाव लड़ने वाले केदारनाथ सिंह के बारे में कहा जाता है कि वे प्रचार के दौरान लोगों की रसोई तक चले जाते थे। सिंह के बेटे पूर्व मंत्री विनोद सिंह के अनुसार- उनके चुनाव प्रचार का तरीका बिलकुल अलग था। वह महज एक गाड़ी और एक व्यक्ति के साथ प्रचार किया करते थे और सीधा लोगों के घर जाते। पूछते थे कि खाना क्या बना है। कभी-कभी रसोई में उनके साथ बैठकर खाना तक खाते। एक और बात, जब कोई उन्हें मिलने आता, तो उससे पूछते कि क्या खाकर आए हो? विनोद सिंह बताते हैं- जब मैंने उनसे जानना चाहा किऐसा क्यों करते हैं, तो उन्होंने कहा- "इससे पता चलता है कि सामने वाला खुशहाल है या परेशान।' इसी अनुसार वो लोगों की मदद किया करते थे।
चौधरी चरण सिंह : मेरे दल के उम्मीदवार को न देना वोट
बात साल 1977 की है। चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए चौधरी चरण सिंह फैजाबाद सर्किट हाउस में विश्राम कर रहे थे। इसके बाद बीकापुर में आयोजित सभा में चौधरी ने मतदाताओं से कहा कि अगर उनकी पार्टी का प्रत्याशी चारित्रिक रूप से पतित हो, शराब पीता हो या किसानों-मजदूरों से धोखा करता हो तो वे उसे हराने में संकोच न करें।
उन दिनों फैजाबाद जिले की टांडा तहसील में चौधरी के समर्थक एक युवा नेता गोपीनाथ वर्मा विधानसभा के टिकट का निवेदन करने गए। गोपीनाथ ने बताया कि अध्यक्ष जी ने उनका नाम काट दिया है और उसकी जगह एक शराब व्यवसायी का नाम लिखा हुआ है। चौधरी ने तुरंत प्रदेश अध्यक्ष रामवचन यादव को तलब किया, तो उन्होंने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा- ‘मजबूरी है। कारोबारी ने पार्टी के लिए नौ लाख रुपए दिए हैं।’ इस पर चौधरी बिफर पड़े और कहने लगे- ‘मजबूरी आपकी होगी, पार्टी की नहीं है। उन्हाेंने व्यापारी के पैसे लौटाने को कहा और बोले- "हम किसी शराब व्यवसायी को प्रत्याशी नहीं बनाएंगे’ और गोपीनाथ का टिकट पक्का हो गया।
रामजीराम : पैसे मांगकर भरा नामांकन
बात1967 के लोकसभा चुनावों से जुड़ी हुई है। समाजवादी डाॅ. राममनोहर लोहिया की ओर से प्रवर्तित गैरकांग्रेसवाद का दौर चल रहा था। उस समय उनकी जन्मस्थली से जुड़ी अकबरपुर (सुरक्षित) सीट पर कांग्रेस नेता पन्नालाल का कब्जा था। गैरकांग्रेसवादियों ने उसे चुनौती देने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टांडा निवासी बीए पास दलित कार्यकर्ता रामजीराम को चुना। रामजीराम के हाथ उस समय एकदम खाली थे। जैसे-तैसे चंदा इकट्ठा करके उनके लिए नामांकन पत्र खरीदा गया। यहां तक कि नामांकन भरने के लिए दोस्तों और शुभचिंतकों ने कचहरी तक जाने के लिए किराया भी दिया।
हद तो तब हुई, जब कागजी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद कहा गया कि पर्चा भरने चलें तो वे बोले- ‘भूख के मारे मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा। क्या करूं, घर में खाने को कुछ था ही नहीं। इसलिए बिना खाए ही निकल पड़ा। ऐसे में वहां उपस्थित कुछ वकीलों ने उन्हें चाय-नाश्ता करवाया। उनका चुनाव प्रचार भी न के बराबर ही हुआ। मतदान हो गया। खुद रामजीराम को भी उम्मीद नहीं थी कि वे जीत जाएंगे। जब नतीजा आया, तो उन्होंने कांग्रेस के पन्नालाल को 3426 वोटों से हरा दिया था। बताते हैं, पैसे की तंगी के कारण जीतने के बाद सांसद के तौर पर उनका दिल्ली जाना भी मुश्किल था।
मौलाना अबुल कलाम आजाद : बिना प्रचार के जीते
बिना प्रचार के जीतने का एक देश के पहले शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के जीवन से जुड़ा हुआ है। बात 1952 के लोकसभा चुनाव की है। वे उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से उम्मीदवार थे। उनके खिलाफ हिंदू महासभा के बिशनचंद सेठ चुनाव लड़ रहे थे। उनका प्रचार जोरों पर चल रहा था। लेकिन पूरे देश में कांग्रेस के प्रचार की जिम्मेदारी होने के कारण मौलाना अपने क्षेत्र में प्रचार का समय नहीं निकाल पा रहे थे। जब वे अपने क्षेत्र में पहुंचे, तब तक घर-घर जाकर प्रचार करने का समय ही बचा था। पर इतने कम समय में कितने घरों में जा सकते थे। इसके बावजूद कार्यकर्ताओं की मेहनत रंग लाई। मौलाना 59.57 प्रतिशत वोट पाकर जीते थे।
जीतने वाले की भी जमानत जब्त!
यह बात कल्पना से परे लगती है, पर सच है। साल 1952 की बात है। उत्तर प्रदेश की जिस आजमगढ़ लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव इन दिनों भारतीय जनता पार्टी के निरहुआ से दो-दो हाथ कर रहे हैं, उसके साथ लगती पूर्वी विधानसभा सीट पर तेरह उम्मीदवारों के बीच मतों के बंटने से ऐसा हो गया था। उस समय विधानसभा क्षेत्र के कुल 83,378 मतदाताओं में से 32,378 ने वोट डाले। कांग्रेस के प्रत्याशी बलदेव उर्फ सत्यानंद ने 4969 मत लेकर अपने प्रतिद्वंद्वी निर्दलीय शम्भूनारायण को 621 वोटों से हराया था लेकिन बलदेव को कुल मतदान का 15.35 प्रतिशत ही प्राप्त हुआ था, इसलिए उनकी जमानत जब्त हो गई। नियमानुसार- प्रत्याशी को जमानत बचाने के लिए कुल वैध मतों का छठा भाग प्राप्त करना जरूरी है।
गोविंद बल्लभ पंत : ऐसा मुख्यमंत्री जो जेब से देता था चाय-नाश्ते के पैसे
वे उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री थे। एक बार पंत ने सरकारी बैठक की। उसमें चाय-नाश्ते का इंतजाम किया गया था। जब बिल आया, तो उन्होंने पास करने से मना कर दिया। कारण पूछा गया, तो बोले- "सरकारी बैठकों में सरकारी खर्चे से केवल चाय मंगवाने का नियम है। नाश्ते का नहीं। उस पैसे पर जनता का हक है, मंत्रियों का नहीं। तब नाश्ते के पैसे उन्होंने अपनी जेब से अदा किए।