
नई दिल्ली। केंद्रीय चुनाव आयोग ने देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही केंद्र की मौजूदा मोदी सरकार और विपक्षी दलों में भी गहमागहमी बढ़ गई है। जहां भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव के जरिये 2019 लोकसभा चुनाव की बिसात बिछाने की राह देख रही है, कांग्रेस समेत अन्य दल इस चुनाव को अपनी अग्नि-परीक्षा के रूप में ले रहे हैं और इसके लिए पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में होने वाले यह विधानसभा चुनाव कई मायनों में बिल्कुल अलग भी हैं। जानिए क्या है इनके अलग होने की प्रमुख वजहें।
राजस्थानः प्रमुख रूप से राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का दबदबा रहा है। प्रदेश की मौजूदा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भाजपा की हैं। राज्य में बीते तीन दशकों का राजनीतिक इतिहास देखें तो यहां बड़ी चौंकाने वाली बात सामने आती है। राज्य में 1988 में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके बाद 1990 में भाजपा ने कब्जा जमा लिया। इसके बाद साल भर (15 दिसंबर 1992 से 4 दिसंबर 1993 तक) के लिए राज्य में राष्ट्रपति शासन रहा और फिर 1993 में भाजपा की सरकार आई।
1998 में राज्य की राजनीति फिर से कांग्रेस के पाले में आ गई और 2003 तक अशोक गहलोत ने बतौर सीएम शआसन किया। फिर 2003 में ही भाजपा की वसुंधरा राजे के सिर पर ताज सजा और 2008 में इसे कांग्रेस के अशोक गलहोत ने छीन लिया। दिसंबर 2013 में वसुंधरा ने कांग्रेस से वापस अपना ताज छीन लिया। इस हिसाब से देखें तो राजस्थान में मौजूदा मुख्यमंत्री के सामने दोबारा सत्ता में आने की चुनौती है, तो बीता इतिहास साबित करता है कि कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता में आ सकती है।
मध्य प्रदेशः राज्य में यह चुनाव मौजूदा मुख्यमंत्री की साख को लेकर अलग है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी के नेता शिवराज सिंह चौहान हैं। चौहान लगातार तीसरी विधानसभा में राज्य के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। मध्य प्रदेश की मौजूदा 14वीं विधानसभा 13 दिसंबर 2013 से शुरू हुई थी और शिवराज सत्ता पर काबिज रहे।
इससे पहले 12 दिसंबर 2008 से लेकर 12 दिसंबर 2013 तक चली 13वीं विधानसभा में भी प्रदेश पर 'शिवराज' ही रहा। जबकि इससे पहले 29 नवंबर 2005 से लेकर 11 दिसंबर 2008 तक चली 12वीं विधानसभा में भी वो तीन साल तक सीएम रहे। अब तक वो मध्य प्रदेश में 12 साल 10 माह से ज्यादा वक्त तक लगातार मुख्यमंत्री बने हुए हैं जो राज्य में किसी भी सीएम का सर्वाधिक कार्यकाल है। हालांकि इस साल होने वाले चुनाव में क्या जनता उन्हें फिर से सत्ता सौंपती है यह देखना बड़ा सवाल होगा क्योंकि शिवराज के सामने चुनौती अपना नाम बचाने की है।
छत्तीसगढ़: सन 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होकर बने प्रदेश छत्तीसगढ़ में अब तक केवल दो पार्टियों के दो ही लोग मुख्यमंत्री रहे हैं। इनमें 9 नवंबर 2000 से लेकर 6 दिसंबर 2003 तक राज्य की सत्ता संभालने वाले पहले मुख्यमंत्री कांग्रेसी नेता अजीत जोगी रहे थे। जबकि इसके बाद राज्य में भाजपा का कमल खिला रहा और राज्य की दूसरी, तीसरी और चौथी विधानसभा में सत्ता भाजपा के पास ही रही।
7 दिसंबर 2003 से लेकर अब तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह ही हैं। मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान की ही तरह रमन सिंह के सामने भी इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती अपनी साख बचाने की है।
मिजोरमः पूर्वोत्तर में कांग्रेस के आखिरी गढ़ के रूप में मौजूद इस राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव पर सभी की नजर है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि देशभर को कांग्रेसमुक्त करने का सपना देख रही भारतीय जनता पार्टी यहां कब्जा जमाना चाहती हैं। जबकि कांग्रेस और मिजोरम नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) राज्य में सत्ता की बागडोर छोड़ने के मूड में नजर नहीं आते। कांग्रेस 2008 से मिजोरम की सत्ता में है और तब से ही मुख्यमंत्री लल थनहवला हैं, जिन्होंने 2008 और 2013 दोनों ही चुनाव जीते।
कांग्रेसी नेता 79 वर्षीय लल थनहवला पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। वहीं, 2014 में कांग्रेस ने यहां की इकलौती लोकसभा सीट भी जीती थी। ऐसे में भाजपा की यहां पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद क्या वो अपनी रणनीति में सफल होती है, देखने वाली बात है।
तेलंगानाः सन 2014 में देश के 29वें प्रदेश का दर्जा पाने वाले तेलंगाना में इस साल दूसरी विधानसभा का चुनाव होना है। 2 जून 2014 को तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) पार्टी के के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। बीते 6 सितंबर 2018 को पद से इस्तीफा देने के बाद फिलहाल वो कार्यवाहक मुख्यमंत्री हैं।
तेलंगाना राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से यह प्रदेश का पहला चुनाव होगा। इस चुनाव से प्रदेश की राजनीति की भी दिशा और दशा तय होगी। तेलंगाना राष्ट्र समिति नामक क्षेत्रीय पार्टी के अध्यक्ष केसीआर सिद्दिपेट जिले की गजवेल विधानसभा से आते हैं। क्या राज्य की जनता उन्हें अपना अगला नायक बनाती है और एक नई क्षेत्रीय पार्टी उभरती है, यह आगामी चुनाव तय करेंगे।