भाजपा के आक्रामक रुख को देखते हुए वामपंथियों ने केरल में नरम रुख का संकेत दिया है।
नई दिल्ली। देश के 21 राज्यों में कमल खिलाने के बाद केरल को फतह करना दक्षिणपंथियों का अगला लक्ष्य है। यही वजह है कि केरल में भाजपा के तेजी से विस्तार को देखते हुए केरल में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुरुआत के बाद अब सीपीआई (एम) के समर्थक भगवान श्रीराम की 'शरण' में पहुंचने की तैयारी में जुट गए हैं। ताकि भाजपा के प्रभाव में आने से अपने समर्थकों को रोका जा सके।
लालगढ़ को बचाने की तैयारी
आपको बता दें कि केरल में 17 जुलाई से पारंपरिक रूप से मलयालम महीना कारकीडकम मनाया जाता है। यह महीना 17 जुलाई से शुरू होता है। इस दौरान अधिकतर हिंदू घरों में भगवान राम की पौराणिक कथाएं सुनाई जाती हैं। केरल में ऐसी मान्यता है कि इससे गरीबी और भारी बारिश के चलते होने वाली बीमारियां दूर होती हैं। इसकी आड़ में सीपीआई (एम) ने इस पूरे महीने रामायण की व्याख्या और पाठ की योजना बनाई है। ताकि वामपंथियों द्वारा तैयार साम्यवादी विचारों के दीवार को चटकने से रोका जा सके। इस योजना के तहत वामपंथी पार्टियां 15 जुलाई से 15 अगस्त तक केरल के सभी 14 जिलों में संस्कृत संगम संस्था के सदस्य के जरिए रामायण पर सत्संग कराएंगे।
छवि सुधारने की कवायद
दरसअसल, 2014 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद पिछले चार वर्षों में भाजपा को तेजी से देश भर में विस्तार हुआ है। देश के 28 राज्यों में से 21 राज्यों में भाजपा का शासन है। आरएसएस और भाजपा का लक्ष्य केरल और पश्चिम बंगाल में भी कमल को खिलाना है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए संघ की रणनीति के तहत केरल में भी लगातार राजनीतिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर गतिविधियां जारी हैं। वर्ष 2017 में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जन यात्रा निकालकर लालगढ़ में पार्टी की पहुंच को सुनिश्चित करने का काम किया था। साथ ही भाजपा के समर्थक अब कम्युनिस्ओं को उन्हीं की भाषा में जवाब देने लगे हैं। उपचुनाव में भाजपा बड़ी संख्या में वोट हासिल करने में सफल रही। साथ ही प्रदेश के लोगों को पार्टी से जोड़ने का अभियान भी तेजी से जारी है। अन्य प्रदेशों की तरह केरल में भी बूथ स्तर तक भाजपा की पकड़ मजबूत करने के लिए प्रयास जारी हैं। इन्हीं सबका असर है कि वामपंथी पार्टियों ने नरम रुख का परिचय देते हुए हिंदुओं के अराध्य देव भगवान श्रीराम का महीना मनाने का निर्णय लिया है। ताकि कमजोर पड़ते जनाधार को थामा जा सके। वामपंथियों के इस प्रयास को लंबे अरसे बाद छवि सुधारने का प्रयास माना जा रहा है।