
नई दिल्ली। महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बावजूद सरकार गठन को लेकर सियासी जंग चरम पर है। हालात यहां तक पहुंच गया कि बेटे आदित्य ठाकरे को सीएम बनाने के चक्कर में उद्धव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी के सियासी चक्रव्यूह में फंसकर रह गए हैं।
एनसीपी नेता शरद पवार ने तो शिवसेना को सत्ता गलियारे से निकालकर याचक की भूमिका में ला खड़ा कर दिया है। कहां विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी एनसीपी को महाराष्ट्र में खत्म होने की कगार पर पहुंचा दिया था। कहा था कि एनसीपी को दस सीटें आएंगी। मगर 80 साल के पवार ने सारे समीकरण पलटकर रख दिए। अब वह शिवसेना के साथ सख्त मोल-भाव में जुट गए हैं।
दूसरी तरफ शिवसेना अब उस कगार पर पहुंच गई है जहां वह मोल भाव करने की हालत में है नहीं। सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने की जिम्मेदारी एक तरह से पवार को ही सौंप दी है। इतना जरूर है कि कहा जा रहा है कि कांग्रेस और एनसीपी के पांच-पांच नेताओं की एक कमेटी बनाई गई है।
मामला यही तक होता तो भी ठीक था, लेकिन एनसीपी और कांग्रेस ने जो चक्रव्यूह शिवसेना के खिलाफ तैयार किया है उससे यही लगता है कि उद्धव पार्टी की पार्टी एनसीपी और कांग्रेस की इशारों पर चलने वाली पार्टी बनकर रह जाएगी।
अब एनसीपी और कांग्रेस शिवसेना पर यह दबाव बना रही है कि वह अपने हिंदुत्व के एजेंडे को फिलहाल पीछे छोड़ दे। ठीक उसी तरह जैसे अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन विवादित मुद्दे छोड़कर सबसे पहले गठबंधन की सरकार बनाई थी। एक और महत्वपूर्ण बात यह भी रखी जाने वाली है कि शिवसेना की अराजक वाली छवि, यानी किसी भी दफ्तर में घुसकर मारपीट करना, ऊधम मचाना, ये सब उसको छोड़ना होगा।
एनसीपी-कांग्रेस ने नई सरकार के कामों का रोड मैप भी तैयार कर लिया है। नई सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी किसानों का पूरा लोन माफ करना, मुस्लिम आरक्षण को बहाल करना, जिसे बीजेपी सरकार ने हटा दिया था। लेकिन यह शिव सेना के घोषणा पत्र में है। फसल बीमा स्कीम को सख्ती से लागू करना और न्यूनतम समर्थन मूल्य को न्यूनतम साक्षा कार्यक्रम का हिस्सा बनाना।
एनसीपी और कांग्रेस की इस रुख से साफ है कि शिवसेना का कोई नेता सीएम बन भी गया तो भी वो कुछ करने की स्थित में नहीं होगी।