राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा रात्रिभोज में शामिल नहीं हुए लेकिन साफ कर दिया कि बिहार में एनडीए एकजुट है और आगे रहेगा।
पटना। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में फूट पड़ने की आशंकाओं के बीच गुरुवार की रात पटना में आयोजित रात्रिभोज में बिहार के तमात सहयोगी दलों ने हिस्सा लिया। हालांकि इस रात्रि भोज में केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा शामिल नहीं हुए लेकिन साफ कर दिया कि बिहार में एनडीए एकजुट है और आगे रहेगा। बता दें कि गुरुवार की रात्रिभोज के बाद केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि रालोसपा के एनडीए से अलग होने की खबरें सिर्फ एक अफवाह है। उन्होंने इसका खंडन करते हुए कहा कि रालोसपा एनडीए के साथ है और आगे रहेगा।
बिहार में एनडीए एकजुट है: कुशवाहा
आपको बता दें कि उपेंद्र कुशवाहा ने स्वयं इस बात का खंडन करते हुए कहा कि 'व्यक्तिगत कारणों से मैं रात्रिभोज में शामिल नहीं हो सका, जबकि पार्टी के अन्य कई लोग भोज में शामिल हुए थे।’ बता दें कि रात्रि भोज में शामिल नहीं होने को लेकर हो रही राजनीति पर कुशवाहा ने राजगी जाहिर करते हुए कहा कि भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह भी भोज में शामिल नहीं हुए तो उनसे कोई भी सवाल नहीं पूछ रहा है। उन्होंने कहा कि इसे जानबूझ कर इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बिहार में एनडीए एकजुट है। मीडिया से बात करने के बाद कुशवाहा पटना हवाईअड्डे से सीधे रोहतास की ओर निकल गए।
भाजपा ने किया था मित्रता रात्रिभोज का आयोजन
गौरतलब है कि भाजपा ने गुरुवार की रात एनडीए में शामिल घटक दलों के लिए पटना में 'मित्रता रात्रिभोज’ का आयोजन किया था। इस रात्रिभोज में बिहार के मुख्यमंत्री और जद-यू के अध्यक्ष नीतीश कुमार, केंद्रीय मंत्री व लोकजनशक्ति पार्टी के प्रमुख रामविलास पासवान सहित रालोसपा और भाजपा के कई नेताओं ने शिरकत की थी लेकिन रालोसपा के प्रमुख कुशवाहा शामिल नहीं हुए। जिसके बाद से एनडीए के सहयोगी दलों के बीच फूट की अफवाहों को और बल मिल गया। बता दें कि इससे पहले गुरुवार को रालोसपा के नेता और पूर्व मंत्री नागमणि ने कुशवाहा के नेतृत्व में एनडीए को आगामी बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने की नसीहत देते हुए कहा था कि रालोसपा के पास भाजपा के बाद सबसे बड़ा जनाधार है। राजनीतिक गलियों में इन दिनों इस तरह की राजनीति को लोग प्रेशर पॉलिटिक्स कह रहे हैं।